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रचनात्मक प्रसार का नया जरिया

Posted On December - 27 - 2016

वंदना सिंह
12712CD _OMNISHCHAL 11सुपरिचित कवि-गीतकार आलोचक ओम निश्चल बैंक की नौकरी करते हुए अपनी सृजनात्मकता से समकालीन साहित्यिक परिदृश्य में सार्थक हस्तक्षेप कर रहे हैं। संस्कृतनिष्ठ तत्सम हिंदी लिखने वाले हिंदी के चंद लोगों में उनका भी नाम शुमार है। उनका कविता संग्रह ‘शब्द सक्रिय हैं’ के अलावा ‘शब्दों से गपशप’ उनकी चर्चित कृति है। भाषा और कारोबार संबंधी पांच खंडों की बैंकिंग वाड्.मय सीरीज का भी उन्होंने लेखन किया है। अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, अशोक वाजपेयी की प्रेम कविताओं के चयन और मलय तथा लीलाधर मंडलोई की प्रतिनिधि रचनाओं का संपादन भी ओम निश्चल ने किया है। उनको हिंदी अकादमी के नवोदित लेखक पुरस्कार एवं उनकी आलोचनात्मक कृति शब्दों से गपशप के लिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया है।
उनके मुताबिक साहित्य का वर्तमान परिदृश्य बहुत विराट है और विधाओं का उत्तरोत्तर विस्तार हो रहा है। कल तक जो विधाएं हाशिए पर मानी जाती थीं, उनमें पाठकों की दिलचस्पी बढ़ रही है। जैसे डायरी, संस्मरण, आत्मकथा। कविता-कहानी उपन्यास जैसी पारंपरिक विधाओं में आज भी प्रभूत लेखन हो रहा है पर इन सबका जो सामूहिक प्रतिबिम्ब हमारे समय और समाज पर पड़ना चाहिए था, वह नहीं पड़ रहा है। वे कहते हैं कि लोगों को किताबें पढ़ने की फुर्सत नहीं है, लिहाजा 100-200 संस्करणों में किताबें छप रही हैं।
हिंदी में थोक के भाव से लिखी जा रही कविताओं के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि कविता हमारी आदि विधा है। इसी विधा में हमारी आख्यायिकाएं लिखी गयीं। रामायण लिखी गयी। महाभारत लिखा गया। छंद में जैसे सारा जीवन उपनिबद्ध था, आख्यायन के लिए कविता और छंद की विधा अपनाई हमारे आर्ष कवियों और गाथाकारों ने। इसलिए आज सात-आठ पीढि़यां कविता में सक्रिय हैं तो यह स्वाभाविक ही है। भारतीय समाज में कविता की जगह इसीलिए है कि बात-बात पर लोग तुलसी को, सूर को, कबीर को, नानक को, रैदास को व मीरा को उद्धृत करते हैं। वे कहते हैं कि आखिर कविता में यह बात कोई कुंवर नारायण ही कह सकता है-कोई दुख मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं। वही हारा जो लड़ा नहीं। आज हिंदी में सैकड़ों कवि हैं। सरस्वती के मंदिर में सब धूप, दीप लेकर खड़े हैं। साधनारत हैं। यह अच्छा परिदृश्य है।
सोशल मीडिया को वे संप्रेषण का एक महत्वयपूर्ण माध्यम मानते हैं। वे कहते हैं कि कभी मुक्तिबोध ने कहा था-अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे। मायकोव्की ने भी कहा था-कवियों के पास हवाई जहाज होना चाहिए ताकि वे अपनी रचनाएं विश्व भर में बिखेर सकें। काश आज वे होते तो रचनात्मकता के प्रसार के लिए सोशल मीडिया के इस विस्तार को देखकर बेहद खुश होते। यदि हम एक विवेकी नागरिक हैं तो हम सोशल मीडिया का बेहतर उपयोग कर सकते हैं। सोशल मीडिया के मंच पर आज देश के कोने-कोने में लिख रही महिलाओं की आवाज बुलंद हो रही है। यह सोशल मीडिया ही है जिस पर किसी की भी सहायता के लिए लिखी गयी एक टिप्पणी से लाखों मददगार हाथ सामने आ सकते हैं।  हजारों वेेबसाइट‍्स और ब्लाग आज इन्हीं माध्यमों की बदौलत साहित्य को पूरे विश्व भर में संप्रेषित कर पा रहे हैं।


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