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राष्ट्रीय सुरक्षा सबका सरोकार…

Posted On December - 4 - 2016

काॅफी पर गपशप
हरीश खरे

 िचत्रांकन :   संदीप जोशी

चित्रांकन : संदीप जोशी

द ट्रिब्यून ने दो दिन पूर्व एक तरह की नयी शुरुआत की। हमने ट्रिब्यून नेशनल सिक्योरिटी फोरम के तत्वावधान में पहली वार्षिक व्याख्यान शृंखला का आयोजन किया। द ट्रिब्यून के दूरदर्शी संस्थापक सरदार दयाल सिंह मजीठिया ने द ट्रिब्यून प्रबंधन की भावी पीढ़ियों को सूचना, ज्ञान और शिक्षा का प्रचार-प्रसार सुनिश्चित करने का जिम्मा सौंपा था। उनका विश्वास था कि पर्याप्त जानकारी रखने वाला समाज एक सशक्त समाज होता है, जो कि मौजूदा दौर के बड़े मुद‍्दों पर तर्क के साथ यथोचित चर्चा करने में सक्षम होता है; और यह ज्ञान समाज को उसकी सामूहिक दुविधाओं के समाधान में मददगार साबित होगा।
वार्षिक व्याख्यान शृंखला संस्थापक के जनादेश को आगे ले जाने के लिए एक विनम्र प्रयास है। आज यह बात तेजी से महसूस की जाने लगी है कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे बेहद गंभीर मसले को केवल राजनेताओं और जनरलों के ऊपर ही नहीं छोड़ा जा सकता। और फिर, राष्ट्रीय सुरक्षा खाई के आर-पार आमने-सामने खड़ी सेनाओं की ही जिम्मेदारी नहीं; बल्िक राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीय रक्षा आज पूरी तरह समावेशी समस्याएं हैं। सोशल मीडिया के नये हथियारों ने आम नागरिक को सशक्त बना दिया है। इसीलिए, हमने आम नागरिकों—और पाठकों—को इसमें शामिल किया ताकि वे भारत की प्रतिरक्षा को समझ सकें।
और इस एेतिहासिक पहल के लिए पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक से बेहतर मुख्य वक्ता कोई और नहीं हो सकता था। उन्होंने बहुत शानदार काम किया। उनकी बेहद प्रभावी बौद्धिक क्षमता, इतिहास और भूगोल की उनकी गहरी समझ तथा युद्ध और शांति के समय में नेतृत्व के उनके अनुभव साफ नजर आ रहे थे और, असल में, वह एक उत्कृष्ट वक्ता हैं। जाने-माने प्रोफेसर एसएस जौहल ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। उनकी उपस्थिति ने उस शाम गैर-फौजी नज़रिया पेश किया।
एक संतोषजनक शाम। मिशन की भावना ताजा हो गई और समाज सेवा का एक फर्ज पूरा हो गया।

3 dec 2अब बात शिवशंकर मेनन की। शंकर खानदानी राजनयिक हैं। उनका संबंध भारतीय विदेश सेवा से संबंधित पुरुषों और महिलाओं की विशेष जमात से है और इस जमात ने पूरी उत्कृष्टता, रुतबे, समर्पण, प्रतिबद्धता और काबिलियत के साथ भारत की सेवा की है। उनके दादा (दिग्गज केपीएस मेनन, वरिष्ठ) अौर उनके पिता पीएन मेनन, दोनों ही सरकारी नौकरशाही के उस वर्ग से संबद्ध रहे, जिसने उस शुरुआती दौर में भारत की विदेश नीति का संचालन िकया जब नया स्वतंत्र भारत अनिश्चय की दुनिया में अपना स्थान तलाश रहा था। और इसे करीबी पारिवारिक मामला बनाने के लिए शंकर ने बड़ी होशियारी के साथ एक विदेश सचिव की बेटी के साथ शादी कर ली। इस्राइल, श्रीलंका, चीन और पाकिस्तान में भारत के राजदूत के रूप में सेवा करने के चलते उन्हें देर-सवेर विदेश सचिव बनना और अंतत: राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद तक पहुंचना ही था।
उस रात मैं एक डिनर में शामिल था जब मुझे पता चला कि शिवशंकर मेनन को अगला विदेश सचिव नामित किया गया है। मैंने खाने की टेबल पर सामने बैठे एक साथी अतिथि—प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव टीके नायर—पर व्यंग्यपूर्वक टिप्पणी करते हुए ‘मल्लू माफिया’ द्वारा एक बड़ा पद झटक लेने की बात कही। मुझे बाद में यह पता चला कि शिवशंकर मलयालम की बजाय हिंदुस्तानी में अिधक सहज रहते थे। प्रधानमंत्री कार्यालय में एक सहयोगी के तौर पर मैंने उन्हें अत्यधिक महानगरीय और असाधारण ज्ञान वाला विदेश सेवा अधिकारी पाया।
एेसे में जब उन्होंने भारतीय विदेश नीति पर पतली-सी पुस्तक लिखी तो मैं इसे पढ़ने के लिए बहुत उत्सुक था। और मैं कबूल करता हूं कि चाॅयसिस—इनसाइड द मेकिंग आॅफ इंडियाज फाॅरेन पाॅलिसी नामक यह पुस्तक हमें कतई निराश नहीं करती है। भारत को बाहरी दुनिया, एक एेसी दुनिया जो कि आपसे उम्मीद की अपेक्षा करती है, तुनकमिजाज है और जो कि हमारी आत्म-प्रशंसा से बिल्कुल भी प्रभावित नहीं है, भारत उससे कैसे निपटे, के बारे में एक आत्मविश्वासी व्यक्ति की परिष्कृत अंतर्दृष्टि और व्याख्या इस पुस्तक की पहचान है।
शंकर ने एक चतुर प्रारूप चुना है। उन्होंने हमारी हालिया विदेश नीति को परिभाषित करने वाले पांच क्षणों पर ध्यान केंद्रित किया है; उनका तर्क है कि उन्होंने इनका चयन इसलिए किया है क्योंकि इन महत्वपूर्ण क्षणों से उनका वास्ता रहा है और इसी वजह से वह व्यक्तिगत ज्ञान और अधिकार के साथ इस बारे में बात कर सकते हैं। एकदम सही। हम उन्हें अपने विकल्प चुनने की छूट देते हैं।
3 dec 4लेकिन जिस बात ने मुझे अत्यधिक प्रभावित किया, वह थी प्रत्येक चैप्टर से पहले नौवीं शताब्दी के बगदाद वजीर से लेकर फैज़ अहमद फैज़, गांधी और महात्मा बुद्ध तक की दो या तीन सूक्तियां। ये सूक्तियां किताब में वर्णित-विदेश नीति के संकटों और इनके निदान पर लिखे लेखों के बारे में सजग प्राक्कथन हैं। बहुत पांडित्यपूर्ण पुस्तक।
विदेश नीति हमेशा ही प्रधानमंत्री की पहल और कार्रवाई का मसला रही है। प्रधानमंत्री का व्यक्तित्व बहुत मायने रखता है। शंकर लिखते हैं : ‘व्यक्ितत्व मायने रखता है। विभिन्न प्रकार के लोगों के इस पद पर आसीन होने के चलते ही संभवत: भारत की विदेश नीति में बदलाव आते रहे हैं। वास्तव में, यदि भविष्य में भारत को एेसा ही विकल्प चुनने के लिए बाध्य किया जाता है, तो मुझे यकीन है कि इसका जवाब अलग तरह का होगा।’
शंकर बड़ी बारीकी और सभ्य तरीके से हमारी इस मौजूदा धुन को  सही नहीं ठहराते हैं कि एक मजबूत प्रधानमंत्री देश तथा विदेश में हमारी सभी समस्याओं के हल के लिए रामबाण हो सकते हैं। इसके उलट उनका तर्क है कि ‘नीति निर्धारण में प्रधानमंत्री की केंद्रीय भूमिका के कारण विदेश नीति कारगर तरीके से क्रियान्वित नहीं हो पायेगी। विदेश नीति तय करने वाला संस्थान अगर कमजोर पड़ता है तो इसका सीधा असर नीति लागू करने पर पड़ता है।’ सरल। एकदम सटीक। मोदी की स्तुति में लाखों ट‍्वीट के बावजूद इसमें फर्क नहीं पड़ना चाहिए।
उनकी पुस्तक के अाखिरी पन्नों में एक बेहद सटीक टिप्पणी की गई है। वह कहते हैं : ‘भारत को एक बड़ी ताकत क्यों बनना चाहिए?’ हां, हमें इसलिए एक बड़ी ताकत बनना चाहिए क्योंकि हम दूसरी किसी ताकत के दुमछल्ले बने नहीं रह सकते। लेकिन बड़ी ताकत के दर्जे की यह चाहत महत्वाकांक्षा की पूर्ति का प्रयास नहीं होना चाहिए : ‘नतीजे निकालने अौर उन्हें बनाये रखने की काबिलियत ही ताकत है। हम वजनदार भी हैं, हमारा प्रभाव भी बढ़ रहा है, लेकिन हमारी ताकत बढ़नी अभी शेष है। अौर इस ताकत का प्रयोग सबसे पहले घर में अामूलचूल परिवर्तन के लिए किया जाना चाहिए।’

फिदेल कास्त्रो का 26 नवंबर को निधन होने के बाद उनके बारे मे बहुत लिखा जा चुका है। इनमें से कुछ बातें दयालु अौर कृपालु थीं, लेकिन ज्यादातर टीकाकारों ने साम्यवाद के विफल माॅडल के साथ उनकी संबद्धता पर ही ध्यान केन्िद्रत किया।
लेकिन, मुझे लगता है कि दुनियाभर में भावी पीढ़ियों के लिए उनकी अाकर्षक अपील का महत्व इसलिए अधिक था क्योंकि उन्होंने अमेरिका के सामने खड़े होने की हिम्मत की थी। इस अवज्ञा में उन्हें दो नेताअों का ही साथ मिला था—वियतनाम के हो ची मिन्ह तथा ईरान के अयातुल्ला खुमैनी का। उन्होंने युद्ध के बाद अमेरिका के अाधिपत्य अौर इस अाधिपत्य के चलते मित्र अौर शत्रु राष्ट्रों से समान रूप से की गई अपेक्षाअों के अागे नतमस्तक होने से इनकार कर दिया था। हो ची मिन्ह अौर अयातुल्ला खुमैनी बड़े देशों के क्रांतिकारी नेता होने के चलते अमेरिका की अवहेलना कर पाये लेकिन कास्त्रो का क्यूबा तो बेहद छोटा-सा द्वीप है, बेहद कमजोर अौर हमेशा अमेरिका की पहुंच में। इसी ने कास्त्रो की अवज्ञा को खतरनाक अौर अाकर्षक बना दिया।
कास्त्रो की सुंदरता अौर युवावस्था ने अमेरिका की अवज्ञा के उनके करिश्मे में इजाफा ही किया अौर वह अंकल सैम के विरोध के पर्याय बन गये। वह अंतिम सांस तक झुके नहीं। अौर यही बात कास्त्रो के जादुई करिश्मे की विशेषता रहेगी।

नाभा जेल-ब्रेक कांड की घटना ने हमारा ध्यान खींचा। यह खबर राष्ट्रीय सुर्खी बनी क्योंकि जेल से भागने वालों में एक कुख्यात खालिस्तानी भी था। केएलएफ का यह तथाकथित प्रमुख जल्द ही पुलिस के हत्थे चढ़ गया अौर फिर  इस खबर में देश की रुचि  कम हो गई।
कानून को मानने वाले नागरिक के तौर पर हालांकि हम सबको किसी के भी जेल से भागने की दृढ़ता के साथ निंदा करनी चाहिए, लेकिन हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि जेलब्रेक की घटना को अंजाम देने के लिए व्यापक योजना अौर रणनीति की ज़रूरत होती है। इसके लिए हिम्मत, संसाधन अौर अदम्य दिमाग चाहिए।
अाखिर, जेल में जेलर अौर उनके स्टाफ तथा कैदियों के बीच बुद्धिमता अौर सरलता, क्रोध अौर छल का अामना-सामना रोज की बात है। वे अपनी कैद का विरोध करते हैं। इससे पार पाने के लिए हिंसा अौर घूस का सहारा लिया जाता है अौर एेसे मामलों में हमेशा पुलिस की जीत भी नहीं होती है।
पंजाब में मामला पूरी तरह गड़बड़ लगता है। कई कुख्यात कैदियों को राजनेताअों का संरक्षण प्राप्त है अौर उन्हें जेल में मनमानी की खुली छूट रहती है। दूसरी अोर पुलिस बेहद अयोग्य है, उसका मनोबल गिरा हुअा है अौर नैतिक पतन हो चुका है। नाभा जेलब्रेक कांड के कई व्यापक अायाम हैं। यह राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधकों के लिए बड़ी चेतावनी है कि सजायाफ्ता अलगाववादी, अपराधी अौर गैंगस्टर बड़े अाराम से जेल से बाहर, यहां तक कि सीमा पार के अपने मित्रों अौर संरक्षकों के संपर्क में रहते हैं।
हालांकि ये जेल में लगभग हर चीज हासिल कर लेते हैं, लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि  उन्हें अच्छी काॅफी नहीं मिल सकती। अौर न ही उन्हें मैं कभी एक कप काॅफी पर बुलाऊंगा। इन्हें छोड़कर अौर कौन काॅफी पीना चाहेगा।

kaffeeklatsch@tribuneindia.com


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