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लघु कथाएं

Posted On December - 27 - 2016

जीवन-अजीवन

अशोक भाटिया
12712cd _24 july 4वह पैदा तो जरूर हुआ था। वह पला भी था और नहीं भी पला था। उसके मां-बाप ने उस पर ध्यान जरूर दिया था,लेकिन भुखमरी में वे उसे ढंग से पाल-पोस नहीं सके थे।
वह पढ़ा भी था और नहीं भी पढ़ा था। उसे स्कूल में पढ़ने डाला गया। पर भूखे पेट उसका पढ़ने में मन नहीं लगा था। किताबें न होने की वजह से स्कूल जाता भी कम था। सो कभी-न -कभी नाम कटना ही था।
उसने नौकरी की भी और नहीं भी की। कच्ची-पक्की मजदूरी मिलती रही और टूटती रही। यही उसकी नौकरी थी।
उसकी शादी हुई थी और नहीं भी हुई। मां-बाप ने उसकी शादी कर दी, पर घर में खाने-पहनने की गुंजाइश कम ही रहती, झगड़ा हरदम रहता। इसलिये लड़की अपने मायके चली गई।
हां, वह मरा ज़रूर था, हालांकि वह तो जन्म से ही मर रहा था।

निःस्वार्थ
ब्रजेश कानूनगो
जो ‘सहज’ थे उन्होंने अपना ‘स’ छोड़ा।
जो ‘महज’ वहां उपस्थित हो गए थे, उन्हें अपना ‘म’ छोड़ने को मजबूर कर दिया गया।
इस तरह ‘सम’ की आकांक्षा में सब मिले और हज के लिए निकल लिए।
दोनों तरह के लोग लगभग सौ चूहों को बलि पर चढ़ा चुके थे।


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