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वे कभी रिटायर क्यों नहीं होते?…

Posted On December - 11 - 2016

काॅफी पर गपशप
हरीश खरे
10 dec 3aकुछ द नि पूर्व, एक बेहद असामान्य घटना घटी। एक प्रधानमंत्री ने यूं ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इस हफ्ते के शुरू की यह घटना न्यूजीलैंड की है, जहां प्रधानमंत्री जाॅन की ने बड़े ही सादगी भरे अंदाज में अपने देश-वािसयों को कहा कि ‘अाठ साल तक इस देश की बड़े प्यार से भरसक सेवा करने के बाद’ वह इसलिए इस्तीफा दे रहे हैं क्योंकि वह अपने परिवार के साथ ज्यादा समय बिताना चाहते हैं।
प्रधानमंत्री के तौर पर जाॅन की को किसी तरह की चुनौती दरपेश नहीं थी। उन्होंने अपनी मर्जी से कुछ एेसे कारणों के चलते इस्तीफा दिया जो अध किांश भारतीय राजनीतिज्ञों को नागवार गुजरते। जाॅन की के ठीक विपरीत ज नि्होंने परिवार के साथ ज्यादा समय गुजारना पसंद किया, हमारे यहां एेसे राजनेता भी हैं जो अविवाहित होने के चलते यह जतलाते हैं कि पूरा देश ही उनका ‘परिवार’ है।
हमारे यहां भारत में, कोई भी राजनेता रिटायरमेंट की नहीं सोचता। जो एक बार ‘नेता’ बन गया, वह हमेशा के लिए ‘नेता’ बना रहता है। क्योंकि भारत में हम नेता हों या जनता, इस मिथ्याभिमान के वशीभूत हो चुके हैं कि सार्वजन कि जीवन का मतलब है ‘सेवा’ अौर ‘त्याग’। ‘सेवा’ अौर ‘त्याग’ दो एेसे गुण हैं ज निकी मियाद कभी खत्म नहीं होती इसलिए नेता ‘अपनी अंतिम सांस तक’ सेवा करते रहने को तत्पर रहता है। जब सुश्री मायावती पर अखिलेश यादव जैसा कोई नेता बनिस्बत कम उम्र में मुख्यमंत्री बन जाता है तो हम सोचते हैं कि भगवान की दया से शासन की बागडोर ‘युवा नेता’ के हाथों में अा गयी है। काफी बाद में जाकर समझ में अाता है कि अब तो ताउम्र उसे झेलना पड़ेगा।
शायद, हमारी समस्या यह है कि अाज नेतृत्व का अभिप्राय किसी राजनीत कि संगठन पर नियंत्रण तक सीमित होकर रह गया है। क्योंकि ‘समुदाय’ या ‘जाति’ के नाम पर यह नियंत्रण कायम किया जाता है इसलिए यदि मतदाता किसी राजनीत कि दल या उसके नेता को खारिज भी कर देता है तो भी नेतृत्व पर अध किार बदस्तूर बना रहता है।
भारत में हम, एेसा कोई प्रोटोकाल भी ईजाद नहीं कर पाये हैं कि ‘पराजित’ अथवा ‘रिटायर’ राजनेताअों से कैसे पेश अाया जाये। हमें उन्हें अकेला छोड़ना नहीं अाता। हमारी प्रतिशोधी राजनीति एक हारे हुए राजनेता को इस बात के लिए विवश कर देती है कि वह सियासी अखाड़े में बना रहे अौर अपना बचाव करता रहे। उदाहरण के लिए, विधानसभा चुनावों के बाद यदि सुखबीर बादल ‘बेरोजगार’ हो जाते हैं तो अपने विशाल कारोबारी साम्राज्य की देखभाल करते हुए वे अकेले नहीं पड़ेंगे। उनके विरोधी पहले ही वादा कर चुके हैं कि वे उन्हें सलाखों के पीछे धकेलेंगे।
हमारे यहां, ज्यादातर राजनेता कोई उपयोगी कार्य करने में सक्षम नहीं हैं। कुछ मुट‍्ठी भर वकील हैं जो फिर से वकालत का पेशा शुरू कर अच्छी कमाई कर सकते हैं।
ज्यादातर राजनेता किसी तरह की गैर-राजनीत कि भूम किा निभा पाने में सक्षम नहीं लगते। मुझे यकीन नहीं है कि कोई बड़ी निजी संस्था किसी ‘रिटायर’ राजनेता को अपने यहां काम देने की सोचेगी। ‘लाॅबीस्ट’ के तौर पर सेवाएं लेना अलग बात है।
हमारे यहां अब ‘सुरक्षा’ नामक एक नयी परंपरा चल पड़ी है। एक बार अाप सत्ता में अा गये तो यह मान लिया जाता है कि अापकी सुरक्षा को खतरा है। भले ही अापका अतीत कितना भी संदिग्ध रहा है। सुरक्षा का यह अाकलन पेशेवर समझे जाने वाले सुरक्षा संस्थान द्वारा किया जाता है जिसकी जिम्मेदारी मुख्य तौर पर यह मानी जाती है कि वह अाम जनता को उन खतरनाक ‘अातंकियों’ से बचायें। कोई भी सार्वजन कि अखाड़े को इस डर से नहीं छोड़ना चाहता/चाहती कि कहीं उनका ‘सुरक्षा कवर’ वापस न ले लिया जाये।
इसलिए, हम दशकों तक नेताअों की घिसीपिटी टोली से जुड़े रह जाते हैं।

 चित्रांकन :   संदीप जोशी

चित्रांकन : संदीप जोशी

ह हफ्ता जयललिता के बारे में चर्चा करने का है। अम्मा एेसी सर्वाध कि बुद्धिमान राजनेता थीं, ज निसे मैं कभी मिला हूं। यहां ‘बुद्धिमान’ से मेरा तात्पर्य ‘बुद्धिजीवी’ से नहीं अपितु राजनीत कि रूप से कुशाग्र, चतुर व तर्कसंगत होने से है। वे अात्म-विश्वासी अौर शांतचित थीं।
मेरी उनसे एकमात्र लम्बी बातचीत अप्रैल, 1999 में हुई, ज नि द निों प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को विश्वास-मत हासिल करना था। थोड़ा पृष्ठभूमि में जाते हैं— 1998 के लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने जयललिता की एअाईएडीएमके तथा अन्य छोटी-छोटी द्रविड़ पार्टियों के साथ गठबंधन किया था। राजग तमिलनाडू में 30 लोकसभा सीटें जीतने में सफल रहा अौर इसकी बदौलत वाजपेयी प्रधानमंत्री बन पाये। अाडवाणी ने तब ‘दक्षिणी रणनीति’ की खूब शेखी बघारी थी। परन्तु 9 माह के भीतर यह सारी व्यवस्था गड़बड़ा गयी। सुब्रहमण्यम स्वामी के कहने पर जयललिता सोनिया गांधी की कांग्रेस से हाथ मिलाने को राजी हो गयीं ताकि लोकसभा में वाजपेयी सरकार को अल्पमत में लाया जा सके। एेसे में राष्ट्रपति के.अार. नारायणन के पास इसके सिवा अौर कोई व किल्प नहीं बचा था कि प्रधानमंत्री को लोकसभा में बहुमत साबित करने को कहें।
इसके बाद, एक हफ्ते तक राजनीत कि साजिश अौर जोड़-तोड़ का सिलसिला चलता रहा। हर तरफ हलचल थी, हर एक घंटे में हालात बदलते रहते थे। काफी कुछ दांव पर लगा हुअा था अौर कई शक्तियां अपने हित साधने की जुगत भिड़ा रही थीं। यह हफ्ता राजनीत कि संवाददाताअों के लिए अहम था। सुश्री जयललिता दिल्ली अा चुकी थीं अौर एक पांच-सितारा होटल में डेरा डाले हुए थीं। होटल का एक पूरा फ्लोर उनके अौर उनके सुरक्षा अमले के लिए उपलब्ध था।
उन्होंने बातचीत के लिए मुझे होटल में बुलाया था। अन्य संवाददाताओं के मुकाबले मुझे थोड़ा-बहुत फायदा यह हुआ कि मैं ‘घर’ का था। मैं ‘द हिंदू’ के लिए काम करता था।
जब मैं उनके कमरे में पहुंचा तो उन्होंने मुझे भीतर बुला लिया और यह कहते हुए चुप्पी साधने को कहा कि मुरासोली मारन बोलने ही वाले हैं। वाजपेयी सरकार के प्रबंधक डीएमके को युनाइटेड फ्रंट से नाता तोड़कर वाजपेयी सरकार को समर्थन देने के लिए मनाने में सफल हो गये थे। यद्यपि डीएमके सांसद नुकसान की भरपाई नहीं कर सकते थे  क्योंकि उनका संख्या बल एआईएडीएमके से कम था।
होटल जाते हुए, मुझे किसी विश्वस्त सूत्र से यह पता चला था कि बसपा के चार वोट एनडीए प्रबंधकों द्वारा बहला-फुसलाकर अपने पक्ष में किये जा सकते हैं। जब यह जानकारी मैंने सुश्री जयललिता के साथ सांझा की तो उन्हें आश्चर्य हुआ और वे इस बात पर जोर देने लगीं कि मैं अपने सूत्र का खुलासा करूं। मैंने मना कर दिया। परन्तु वे सतर्क हो गयी थीं और मुझे बाद में पता चला कि वे इसकी कोई काट न किालना चाहती थीं। बसपा के वे चार मत बेहद महत्वपूर्ण थे। उस बातचीत के दौरान एआईएडीएमके नेता मुझसे बार-बार यह पूछती रहीं कि श्रीमती सोनिया गांधी संख्या बल को अपनी तरफ खींचने के लिए आगे क्यों नहीं आ रहीं। मुझे लगता है, शायद वही समय था, जब तमिलनाडु की नेता को श्रीमती गांधी के महत्व का अहसास हुआ। उन्हाेंने फिर कभी भी कांग्रेस अथवा श्रीमती गांधी पर दांव नहीं लगाया।

10 dec 4‘थैंक यू फॉर बीइंग लेट’ थामस एल. फ्राइडमैन की ताजा पुस्तक का आकर्षक शीर्षक है। फ्राइडमैन दो दशक से भी ज्यादा समय से एक सशक्त आवाज रहे हैं और विश्वभर में उनके पाठक और अनुयायी मौजूद हैं। इस पुस्तक में उन्होंने पाठक को यह बोध कराने की कोिशश की है कि किस तरह दुनिया तेजी से बदल रही है। पुस्तक के उप-शीर्षक में वे इसे ‘तेजी से बदलाव के युग में फलने-फूलने के लिए एक आशावादी की मार्गदर्शक गाइड’ का नाम देते हैं। उनका तर्क यह है कि हमारे ग्रह को तीन ताकतों ने जकड़ रखा है। ये ताकतें हैं — टेक्नालाेजी, ग्लोबलाइजेशन और क्लाइमेट चेंज। ये तीनों ताकतें एक साथ गतिमान हैं। वे कहते हैं, इस समस्या का कोई व्यक्तिगत निवारण नहीं हैं अपितु मिलकर ही कोई समाधान न किल सकता है।
पुस्तक में फ्राइडमैन ‘बीइंग लेट’ (विलम्ब से पहुंचने) से संबंधित एक घटना का ज कि्र करते हुए इसके फायदे बताते हैं। वे कहते हैं कि कैसे एक वार्ताकार उनसे मिलने के तय समय से देरी से पहुंचा। उस व्यक्ति को लगा कि उसे अपनी गति धीमी करनी होगी और अहंकार के भाव के साथ तल्लीन न रहने में शर्म वाली कोई बात नहीं है। दिल्ली में शासन चला रहे हर वरिष्ठ व्यक्ति को यह पुस्तक इसलिए पढ़नी चाहिए क्योंकि यह समझने को अभी ज्यादा देर नहीं हुई है कि एक ऐसी भी दुनिया है जिसे हम अपनी मरजी और सनक के अनुरूप बदल नहीं सकते।
स्तंभकार अथवा ब्लाॅगर बनने की इच्छा संजोने वाले हर पत्रकार को भी यह पुस्तक पढ़नी चाहिए। पुस्तक के प्राक्कथन में फ्राइडमैन वाशिंगटन डीसी के एक पार्किंग स्थल में एक सहायक के साथ बने रूढ़िमुक्त रिश्ते की कहानी बयां करते हैं। यह सहायक इथियोपिया से आया एक शिक्षित प्रवासी है। वह ब्लॉगर है। वह चुनौतीपूर्ण लहजे में फ्राइडमैन को बताता है कि वह भी एक स्तंभकार है। फ्राइडमैन इस बात पर गौर करते हैं।
अगले कुछ पृष्ठों में स्तंभकार का आत्म-विश्लेषण और व्यवसाय का परिचय दिया गया है। पुस्तक में किसी राय के पीछे निहित अर्थबोध को रेखांकित किया गया है ताकि पाठक परिवेश को समझ सके। वे कहते हैं, मूल्यों, प्राथम किताओं आकांक्षाओं के तीन तत्वों को मिलाकर ही गुण-धर्म तय होता है।
आइये, कॉफी साथ-साथ पीते हैं।
kaffeeklatsch@tribuneindia.com


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