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मदारी

Posted On December - 27 - 2016
सभी चित्रांकन : संदीप जोशी

सभी चित्रांकन : संदीप जोशी

सुभाष तराण

डुगडुगी की गड़गड़ाहट हवा में बुलंद हुई तो बाजार की सडक पर गुज़रते राहगीरों का ध्यान अनायास ही उस ओर खिंचता चला गया। डुगडुगी की गड़गड़ाहट का स्रोत एक उम्रदराज़ मदारी था, जो एक आठ साला बच्चे तथा दो और मरियल से दिखने वाले युवकों के साथ सड़क किनारे की पटरी पर खड़ा होकर दिखाए जाने वाले तमाशे की भूमिका बांध रहा था। मदारी फिलहाल उस आठ साला बच्चे से, जिसे वह जमूरा कह कर संबोधित कर रहा था, डुगडुगी से लय ताल मिलाते हुए सवाल-जवाब कर रहा था। जहां डुगडुगी की गड़गड़ाहट मदारी और जमूरे की आवाज के उतार-चढ़ाव के साथ क़दमताल कर रही थी वहीं मदारी के बाकी दो साथी सामने पटरी पर, जहां सड़क की हद ख़त्म हो रही थी, चादर के ऊपर कांच के मर्तबानों को क़रीने से सजाने में मशगूल थे। मदारी ने जमूरे से संवाद जारी रखते हुए अपनी झोली से महाकाली के रौद्र रूप वाली एक तस्वीर निकाली और उसे बगल में विद्यमान एक दरख्त के तने पर चस्पा कर दिया। सवाल-जवाब की इस फेरहिस्त में मदारी का हाथ जब अगली बार उस बगल में लटकी झोली से बाहर निकला तो उसके हाथ में मानव मस्तिष्क का एक कंकाल मय दो बिलाथ भर लंबी हड्डियों के साथ था। उसने उन हड्डियों को काली की तस्वीर, जो दरख्त के तने पर चस्पा थी, के ठीक नीचे क़रीने से सज़ा दिया।
बाजार में घूमते लोग मदारी, जमूरे के संवाद और डुगडुगी की जुगलबन्दी के चलते जैसे ही उनके इर्द गिर्द बेतरतीब घेरा बनाने लगे, मदारी ने अपनी झोली में एक बार फिर हाथ डाला और इस बार हड्डी और लकड़ी की जुगलबन्दी से बनी छड़ी निकाल कर, इर्दगिर्द भीड़ की शक्ल में तबदील होते लोगों को पीछे धकियाते हुए, उससे अपने बाकी तीनों सहयोगियों के चारों ओर एक लकीर खींच कर एक गोल घेरा बना लिया। इस दौरान इधर-उधर टहलते जमूरे का पैर अचानक उस ताजा खींची लकीर को छू गया। जमूरे का पैर लकीर पर पड़ते ही महाकाली की तस्वीर के नीचे क़रीने से सज़ा कर रखी गयी इनसानी खोपड़ी और हड्डियों के पास एक मंद विस्फोट हुआ। अचानक हुए इस मामूली धमाके का ज़ाहिर अंजाम तो मामूली सी चिंगारियां और एक पस्त धुएं का ग़ुब्बार था लेकिन ये विस्फोट जेहनी तौर पर भीड़ को भयभीत कर गया। मदारी ने जमूरे को जान के जोखिम की चेतावनी देते हुए उसे खेल ख़त्म होने तक इस लकीर को न लांघने की चेतावनी के साथ आइंदा से सावधान रहने का फ़रमान सुना दिया। भीड़ ने, जो थोडी देर पहले लकीर पार करने को आतुर प्रतीत हो रही थी, धमाके, धुएं और चिंगारियों के बाद उस लकीर से एक सम्मान जनक दूरी बनाकर शान्ति के साथ खड़ी हो गयी। तमाशाई भीड़ भले ही ख़ड़े होने भर की जगह के लिए एक-दूसरे के साथ धक्का मुक्की कर रही थी लेकिन मदारी के कब्जे में इतनी जगह आ चुकी थी कि वे चारों लोग अपने सामान सहित सहूलियत के साथ बेहिचक इधर उधर टहल सकते थे। मरियल से दिखने वाले दोनों युवक अब अपने काम से फ़ारिग़ मालूम पड़ रहे थे। उनके द्वारा पोटली से निकली अन्तिम वस्तुएं एक गंडासा और एक इमाम दस्ता थी। वे  चुपचाप उस गोल घेरे के अन्दर जाकर बैठ गए।
जहां अभी थोड़ी देर पहले मदारी और जमूरा अपने सवालों-जवाबों में दुनियादारी के तमाम फ़लसफ़ों का ज़िक्र कर रहे थे वहीं अब मदारी जमूरे से सवाल-जवाब छोड़ सामने खड़ी भीड़ से मुखातिब हो गया। मदारी की जो बात दुनियादारी के विषयों से शुरू हुई थी वो अब कांच के मर्तबानों में रखी जड़ी-बूटियों की ख़ूबियों और ख़ासियतों पर आ गयी। मदारी के मुताबिक हिमालय के दुरूह पहाड़ों से हासिल की गयी इन जड़ी-बूटियों में बड़े से बड़े असाध्य रोगों को जड़ से ख़त्म करने की ताकत थी। इनमें खोई हुई ताकत हासिल करने की भी ताकत थी। एक हकीम की तरह मदारी ने जरा सी देर में इमाम दस्ते में बूटियों को कूट उनकी बहुत सी पुड़िया बना डालीं।
मदारी द्वारा जड़ी -बूटियों की ख़ूबियों और ख़ासियतों की प्रभावशाली प्रस्तुति और उसकी कम कीमत के चलते भीड़ ने जड़ी-बूटी के इस मिश्रण को हाथोंहाथ लिया। दवा की पुड़िया की एवज में एक माकूल कीमत वसूलते हुए मदारी भीड़ को लगे दुआएं दे भी रहा था। जड़ी-बूटियों से फ़ारिग़ होते ही मदारी ने ताली बजायी तो लकीर के अन्दर कोने में बैठे दोनों लड़कों ने कांच के मर्तबान समेटकर पोटली में रखने शुरू कर दिए।
मदारी एक बार फिर भीड़ को दवा के मसले से आगे दुनियादारी के फ़लसफे की बताने लगा। वह बात कर ही रहा था कि तभी पेड़ के तने पर चस्पा महाकाली की तस्वीर के नीचे रखी खोपड़ी और हड्डियों के बीच एक और विस्फोट हुआ। यह विस्फोट पिछली बार के मुक़ाबले थोड़ा तेज़ था। अचानक हुए विस्फोट से मदारी के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। वो तेज़ी से उस ओर पलटा और जमीन पर पडे गंडासे को उठाकर अपनी हथेली में पेवस्त कर दिया। मुट्ठी के अन्दर दबे गंडासे की मूठ से खून की धार बहने लगी। मदारी चेहरे पर दर्दनाक भाव भंगिमाएं ओढ़ते हुए तस्वीर की ओर बढ़ा और हथेली से निकलते लहू को उन हड्डियों पर टपका दिया।
लेकिन यह क्या! धुआं उगलती हड्डियों पर खून की बूंदें टपकते ही उससे आग की लपटें उठने लगीं। मदारी ने बिलबिलाते हुए जमूरे का आह्वान किया। खून टपकने पर लपटें उगलती हड्डियों को देखकर भीड़ के बीच सन्नाटा पसर गया। मदारी रुंधी आवाज में भीड़ को सुनाते हुए जमूरे से कहने लगा कि तमाशाई भीड़ के बीच किसी व्यक्ति ने महाकाली के प्रसाद में विघ्न डाल दिया है, लिहाज़ा इस पृथ्वी पर कभी भी प्रलय आ सकती है।
जमूरे ने जब इस प्रलय रोकने का उपाय जानना चाहा तो मदारी ने कहा कि अभी के अभी महाकाली के सामने एक इनसानी बलि चढ़ानी होगी। मदारी एक बार फ़िर जमूरे से मुखातिब हुआ और कहने लगा कि क्या वह इस ब्रह्मांड को बचाने के लिए खुद की क़ुर्बानी दे सकता है। किसी प्रशिक्षित पालतू की तरह जमूरे ने हां कह दी। मदारी ने बिना देर किए गंडासा उठाया और उसे जमूरे की गर्दन पर रख कर खींच दिया। जमूरा जमीन पर गिरकर छटपटाने लगा और उसके गर्दन के आस पास ख़ून उबलने लगा।
हड्डियों से उठती लपटें अब शान्त होने लगीं। भीड़ के बीच में बहुत से लोगों के मुंह से घुटी हुई चीख़ें फूट पड़ीं। छटपटाते जमूरे को अपनी आड़ में लेकर अचानक मदारी जोर से चिल्लाया-सब लोग अपनी-अपनी मुट्ठियां ख़ोल दें, बच्चा आपके लिए तकलीफ़ उठा रहा है। भीड़ ने तत्काल मदारी के हुक्म की तामील की।  मदारी एक बार फ़िर दहाड़ा-क्या आप लोगों की हथेलियों में पसीना आ रहा है? भीड़ ने सामूहिक रूप से हां में सिर हिला दिया।
मदारी ने माकूल जवाब की एवज में भीड़ के बीच एक ओर जुमला छोड़ा-हमे इस निरीह बालक की जान बचाने की कोशिश करनी चाहिए कि नहीं करनी चाहिए। भीड़ ने कुछ इस तरह से दर्दमन्द आवाज में हामी भरी मानो गंडासा उनकी गर्दन में धंसा हुआ हो।
मदारी ने भीड़ के समक्ष एक चेतावनी के साथ इस जानलेवा समस्या का समाधान परोस दिया-बच्चे की जान बचाई जा सकती है, बशर्ते आप लोगों की जेब में जो कुछ हो, उसे सामने पड़ी चादर पर डाल दिया जाए, वरना इस मासूम बच्चे की हत्या आप लोगों के सर होगी।
दोनों युवक, जो अब तक एक कोने में ख़ड़े थे, बिना किसी आदेश के चादर फैला कर सहमी हुई भीड़ के सम्मुख़ हो लिए। मदारी एक बार फ़िर गरजा-बच्चे की जान का सवाल है, हम रहमदिल मुल्क के बाशिन्दे हैं। मुझे उम्मीद है आप बच्चे की जान बचाने के लिए ईमानदारी दिखाएंगे।
पूरी तरह से मदारी के काबू में डरी सहमी भीड़ दत्त चित होकर दवा ख़रीदने के बाद ख़ीसे में पड़ा बचा हुआ पैसा चादर पर डालने लगी।
यह दौर ख़त्म होने को ही था कि अचानक भीड़ के बीच एक आदमी मुंह से ख़ून उलटता हुआ मदारी की ओर लड़ख़ड़ाते हुए बढ़ने लगा। मदारी ने इशारे से उसे वहीं रुकने का हुक्म दिया। उस आदमी ने अपनी जेब में हाथ ड़ाला और एक दस का नोट मदारी की तरफ़ उछाल दिया और वहीं धराशायी हो गया।
मदारी के चेहरे पर कुटिल मुस्कान फ़ैल गयी। मदारी भीड़ को चेतावनी स्वरूप जमीन पर पड़े आदमी की ओर इशारा करते हुए भीड़ को संबोधित करने लगा-देख लिए आपने बेईमानी के नतीजे। यह पहली चेतावनी है। जिसकी जेब में जो कुछ है वो चुपचाप उसे चादर पर डाल दें। दस मिनट का समय दे रहा हूं। अगर किसी नें कोताही बरती तो उसका हश्र बिलकुल ऐसा ही होगा जैसा इस सामने पड़े आदमी का हुआ है।
मरियल से दिखने वाले उन युवकों ने एक बार फ़िर भीड़ के सामने चादर फैला दी। मन्त्रमुग्ध भीड़ के बीच से चादर पर सिक्कों और नोटों की बरसात होने लगी।
चादरमय उस पर पड़े रुपयों के एक पोटली की शक्ल में मदारी के हाथ में आ गयी। मदारी ने ख़ेल ख़त्म होने की घोषणा कर दी। जमूरा जो थोड़ी देर पहले जमीन पर पड़ा छटपटा रहा था, उठ कर ख़ड़ा हो गया। जमीन पर ख़ून की उल्टियां करते हुए गिरा आदमी उठ कर भीड़ में घुस कर गायब हो गया। सारा बिखरा सामान लपेटने के बाद मदारी, जमूरा और उसके दोनों मरियल से साथी आरक्षित जगह पर भीड़ के सामने पंक्तिबद्ध होकर ख़ड़े हो गए और भीड़ से मुखातिब होते हुए एक नारा लगाया।
‘महाकाली की जय’
सहमी हुई भीड़ ने डर और व्याकुलता के बीच अपना बचा ख़ुचा जोश इकट्ठा करते हुए एक सामूहिक उद्घोष किया।
‘महाकाली की जय।’


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