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हॉकी से बनी स्वावलंबन की राह, खिलाड़ी ने संभाली परिवार की जिम्मेदारी

Posted On December - 26 - 2016

पुरुषोत्तम शर्मा, सोनीपत

  अभ्यास करतीं हॉकी सनसनी नेहा गोयल।

अभ्यास करतीं हॉकी सनसनी नेहा गोयल।

सही कहते हैं कि प्रतिभा किसी से छिपी नहीं रह सकती। अगर इसको पहचान कर तराशने वाला मिल जाए, तो फिर इसके ऐसे पंख लगते हैं कि देखते ही बनता है। ऐसी ही कुछ दास्तां हैं हॉकी की सनसनी नेहा गोयल की। पहनने को जूते नहीं और पढ़ने को किताब नहीं। पारिवारिक हालात बदतर। कुछ समय पहले तक नेहा गोयल अति विपरीत स्थितियों से जूझ रही थी, किंतु आज उसने अपने घर-परिवार के अंधेरे को रोशनी की नयी किरण से दूर कर दिया है। हॉकी ने नेहा को स्वावलंबी बना दिया है, इससे उसने अपने नन्हे कंधों पर परिवार की जिम्मेदारी वहन कर ली है।
सोनीपत शहर के आर्य नगर में रहने वाली नेहा गोयल के परिवार की देखते ही देखते कायापलट हो गयी है। इसका श्रेय स्वयं नेहा को ही जाता है, जिसने अपनी हिम्मत, मेहनत, प्रतिभा के बल पर यह कारनामा किया है। कुछ वर्ष पहले आर्थिक तौर पर नेहा के परिवार की स्थिति दयनीय थी। आधुनिकता के इस दौर में शहर में रहते हुए भी घर में बिजली तक नहीं थी और पूरा परिवार तेल के दीये जलाकर गुजर-बसर करने को विवश था। पिता उमेश गोयल लेबल फैक्टरी में मजदूरी कर नाममात्र आय अर्जित कर पाते थे। माता सावित्री गृह कार्य तक सीमित थी। 3 बहनों में सबसे छोटी नेहा परिवार की इस नकारात्मक स्थिति से खूब परिचित थी। ऐसे में उसने खेलों की ओर कदम बढ़ाया, जिसके लिए उसकी प्रेरणास्त्रोत बनी पड़ोस की हॉकी खिलाड़ी व सहेली सीमा। समाचार पत्रों में हॉकी खिलाड़ियों की उपलब्धियों से भरी खबरें व फोटो देखकर उसे एक नयी प्रेरणा मिली। हॉकी की लड़कियों को खेलता देख उसने औद्योगिक क्षेत्र स्थित हॉकी मैदान में कदम रखा तो कोच प्रीतम सिवाच को नन्ही नेहा में छिपी प्रतिभा को आंकने में देर नहीं लगी। नेहा ने खेलने में रुचि दिखाई, तो अर्जुन अवार्डी पूर्व कप्तान प्रीतम सिवाच ने उसे हॉकी की स्टिक थमाते हुए तराशना शुरू किया। खेल में दम दिखाने के लिए नेहा को जरूरी सहायता भी उपलब्ध कराई। स्कूल-कॉलेज में फीस माफ कराने के सफल प्रयास किये तो नेहा ने भी फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। नेहा ने खूब कड़ी मेहनत करते हुए थोड़े से समय में ही अपनी खेल प्रतिभा व क्षमता का जलवा बिखेरा। बहुत कम समय में ही वह मैदान में प्रीतम की लाडली बन गयी। छोटी-सी आयु में ही उसने बड़े कारनामों को अंजाम दिया है।

  इनाम में मिली स्कूटी के साथ नेहा गोयल।

इनाम में मिली स्कूटी के साथ नेहा गोयल।

मां बोलीं – बेटे की कमी महसूस नहीं होती : इधर, आर्थिक तंगी के चलते नेहा की माता सावित्री देवी अपने कानों का उपचार नहीं करा सकी। इस कारण उन्हें अत्यधिक समस्याओं से जूझना पड़ रहा था। नेहा ने नौकरी मिलने पर हाल ही में अपनी माता को कानों की श्रवण मशीन लगाई है, इससे उन्हें सुनने में आ रही दिक्कतों से छुटकारा मिला है। सावित्री देवी कहती हैं कि उन्हें अब बेटे की कमी महसूस नहीं होती, क्योंकि नेहा ने एक पुत्र की भांति परिवार की जिम्मेदारी संभाल ली है। जिस घर में दीये से रोशनी होती थी आज उसमें बिजली है। अब नेहा ने घर में सभी जरूरी चीजें फ्रीज, कूलर, टीवी इत्यादि जुटा लिये हैं। नेहा गोयल कहती है कि हॉकी खेल महंगा है। खिलाड़ियों को पोषण भरी डाइट व अच्छी हॉकी स्टिक चाहिए, जिसके लिए सरकार को सुविधाएं देनी चाहिए। अगर सरकार खिलाड़ियों को बेहतरीन किट व डाइट देती है तो खिलाड़ी सफल परिणाम देंगी। उन्होंने हॉकी मैदान में भी सुविधाएं बढ़ाने की मांग की।
अत्यधिक विपरीत परिस्थितियों में भी बुलंद इरादों व प्रतिभा के दम पर सफलता की कहानी लिखने वाली नेहा गोयल इस समय मात्र 18 वर्ष की है किंतु लक्ष्य बड़ा है। नेहा कहती है कि वह देश के लिए ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतना चाहती है। इसके लिए दिन-रात कड़ा परिश्रम कर रही हैं। उन्होंने कहा कि हालातों में सुधार हुआ है जिससे अब वे और तीव्रता से आगे बढ़ रही हैं। उन्होंने कहा कि कोच प्रीतम सिवाच के निर्देशन में वे अवश्य ओलंपिक में खेलेंगी।
ये उपलब्धियां नेहा के नाम
जिला स्तर पर नेहा के खाते में उपलब्धियों की भरमार है। प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर पर भी झोली भरी हुई है। अंडर-14 में नेहा ने स्कूल स्टेट में रजत झटका तो स्कूल नेशनल में स्वर्ण पदक जीता। राइट-इन फॉरवर्ड पोजीशन की बेहतरीन खिलाड़ी नेहा ने दर्जनों स्कूल स्टेट व स्कूल नेशनल खेले हैं। मात्र 13 वर्ष की आयु में वर्ष 2011 में उसने राई में हुई सीनियर नेशनल हॉकी प्रतियोगिता में खेलते हुए रजत पदक जीता। इसी वर्ष अंडर-18 में एशिया कप के लिए नेहा का चयन हुआ। इसमें उन्होंने कांस्य पदक झटका। इसी वर्ष नेशनल गेम्स भी हुए, इसमें नेहा ने स्वर्ण पदक प्राप्त किया। इसी तरह लाल बहादुर शास्त्री अंतर्राष्ट्रीय हॉकी टूर्नामेंट में अंडर-21 आयु वर्ग में खेलते हुए नेहा को सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के खिताब से नवाजा गया। इसमें आस्ट्रेलिया, जर्मनी व न्यूजीलैंड की टीमें हिस्सा ले रही थीं। वर्ष 2014 में स्कॉटलैंड में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय चैंपियन चैलेंज टूर्नामेंट में नेहा ने 5 टेस्ट मैचों की सीरीज खेली।
इसके पहले नेहा ने 2013 में स्कॉटलैंड में हुई जूनियर टेस्ट सीरीज में स्वर्णिम प्रदर्शन किया। वर्ष 2014 में नेहा को जूनियर नेशनल हॉकी प्रतियोगिता में हरियाणा की कप्तानी मिली तो उसने राज्य को स्वर्ण पदक दिलाया। वर्ष 2015 में छत्तीसगढ़ में हुए जूनियर नेशनल में और बाद में नेशनल गेम में उन्होंने स्वर्ण पदक झटके। नेहा के लगातार दमदार प्रदर्शन के चलते वर्ष 2015 में रेलवे ने उन्हें क्लर्क के रूप में भर्ती किया। इसी वर्ष 2016 में कुछ माह पहले हुई सीनियर नेशनल हॉकी प्रतियोगिता में रेलवे की ओर से खेलते हुए नेहा को सर्वश्रेष्ठ डिफेंडर खिलाड़ी का खिताब मिला। इससे उन्हें इनाम के तौर पर एक स्कूटी मिली। कुछ समय पूर्व आयोजित साउथ एशियन गेम्स में उन्हें स्वर्ण पदक मिला। किंतु बदकिस्मती रही कि उन्हें रियो ओलंपिक-2016 में टीम में जगह नहीं मिली, इसके लिए जूनियर नेशनल में उनकी प्रतिभागिता को कारण बताया गया। कोच प्रीतम सिवाच कहती हैं कि नेहा को ओलंपिक टीम का हिस्सा बनाना चाहिए था।


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