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अंतर्विरोधों के भंवर में जीएसटी

Posted On January - 9 - 2017

10901CD _GSTगुड्स एंड सर्विस टैक्स को लागू करने पर केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों में ठनी हुई है। विवाद है कि जीएसटी की वसूली केन्द्र सरकार के अधिकारियों द्वारा की जायेगी अथवा राज्य सरकार के अधिकारियों द्वारा। जैसे दो परिवारों में सहमति बन चुकी है कि नल से 5-5 बाल्टी पानी दोनों परिवारों को मिलेगा। लेकिन जंग इस बात को लेकर छिड़ी हुई है कि नल के इस पानी को घर तक कौन पहुंचायेगा। दोनों परिवार कह रहे हैं कि नल से दस बाल्टी पानी लेकर दोनों घरों को मैं 5-5 बाल्टी पहुंचाऊंगा। यदि दोनों लोग सच्चे हैं तो चाहेंगे कि नल से पानी लेकर घर से पहुंचाने का काम दूसरे को दे दें। इस काम को अनायास ही अपने ऊपर क्यों लिया जाये। परन्तु दोनों में इस काम को करने को लेकर ठनी हुई है, चूंकि पानी पहुंचाने के काम में घपलेबाजी करने का अवसर मिल जाता है।
इसी प्रकार केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच विवाद बना हुआ है कि जीएसटी की वसूली कौन करेगा, चूंकि दोनों को घूस वसूलने के अवसर चाहिये। टैक्स वसूल करने का कार्य पूरी तरह केन्द्र सरकार को दे दिया जाये तो राज्य सरकारों को बचत होगी। सेल टैक्स अधिकारियों को दूसरे कार्यों में लगाया जा सकेगा। परन्तु राज्य सरकार के अधिकारियों और मंत्रियों को घूस वसूल करने के अवसर समाप्त हो जायेंगे। यही बात केन्द्र सरकार पर भी लागू होती है। दोनों घूस को नहीं छोड़ना चाहते, इसलिये जीएसटी पर अवरोध बना हुआ है।
इस मुद्दे पर अड़ कर राज्य सरकारें अपने मूल हितों की अनदेखी कर रही हैं। प्रस्तावित जीएसटी व्यवस्था पूरी तरह केन्द्र सरकार के अधीन है। राज्य सरकारों को मूकदर्शक बना दिया गया है। व्यवस्था है कि जीएसटी काउंसिल में किसी प्रस्ताव को पारित करने के लिये 75 प्रतिशत मत जरूरी होंगे। साथ-साथ कहा गया कि 33 प्रतिशत मत केन्द्र सरकार के पास होंगे। अतः सब राज्य एकजुट हों तब भी किसी प्रस्ताव को पारित नहीं करा सकते, चूंकि उनके पास कुल 67 प्रतिशत वोट होंगे जो कि जरूरी 75 प्रतिशत से कम होंगे।
वर्तमान प्रस्ताव में राज्य सरकार को एक वोट दिया गया है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड को एक-एक वोट दिया गया है जबकि उत्तर प्रदेश की जनसंख्या लगभग 20 गुना है। इससे केन्द्र सरकार के लिये मनचाहे नियमों को राज्यों की इच्छा के विपरीत लागू करना आसान हो जायेगा। मान लीजिये केन्द्र सरकार चाहती है कि साइकिल तथा मर्सीडीज कार पर बराबर 18 प्रतिशत से जीएसटी वसूल की जाये। इसके विपरीत राज्य सरकारें चाहती हैं कि साइकिल पर पांच प्रतिशत तथा मर्सीडीज कार पर 40 प्रतिशत से जीएसटी वसूल की जाये। केन्द्र को अपना प्रस्ताव पारित करने के लिये 75 प्रतिशत वोट चाहिये। 33 प्रतिशत केन्द्र के पास अपने स्वयं के वोट हैं। यदि 42 प्रतिशत और वोट पक्ष में आ जायें तो प्रस्ताव पारित हो जायेगा।
30 राज्यों में यदि 19 छोटे राज्य केन्द्र के पक्ष में खड़े हो जायें तो इनके पास 42 प्रतिशत वोट होंगे और वह प्रस्ताव पारित हो जायेगा। लेकिन देश के 19 छोटे राज्यों के पास देश की केवल 23 प्रतिशत आबादी है जबकि 11 बड़े राज्यों के पास 77 प्रतिशत। अतः 23 प्रतिशत आबादी वाले 19 छोटे राज्य केन्द्र के साथ खड़े हो जायें तो 11 बड़े राज्यों की 77 प्रतिशत आबादी के विपरीत प्रस्ताव पारित किया जायेगा। इस बात को तमिलनाडु ने कई बार उठाया है। परन्तु केन्द्र सरकार एक राज्य-एक वोट के अन्यायपूर्ण फार्मूले को लागू करने पर अड़ी हुई है।
इस प्रकार केन्द्र और राज्य सरकार के बीच गतिरोध के दो आयाम सामने आते हैं। एक आयाम घूस वसूलने का है। दूसरा आयाम जीएसटी काउंसिल में केन्द्र के वीटो का है। दुर्भाग्य है कि राज्य सरकारें घूस वसूलने के अधिकार को लेकर अड़ी हुई हैं और केन्द्र सरकार के वीटो के अन्याय को चुपचाप स्वीकार कर रही हैं। राज्य सरकारों को चाहिये कि घूस वसूल करने का अधिकार केन्द्र को दे दें। अपने टैक्स अधिकारियों को केन्द्र के अधिकारियों द्वारा वसूल की गई घूस की धरपकड़ करने पर लगायें। दो बन्दरों की लड़ाई में चतुर बिल्ली ने रोटी हड़प ली थी। इसी प्रकार केन्द्र तथा राज्य सरकार के बीच की लड़ाई से जनता को कुछ राहत मिल सकती है। राज्यों को केन्द्र के वीटो का विरोध करना चाहिये जो कि उन्हें पूरी तरह मूकदर्शी बना देती है।
बहरहाल जीएसटी लागू करने को केन्द्र तथा राज्यों के बीच सहमति बन चुकी है। परन्तु कभी-कभी किसी छोटी बात को लेकर बड़े कदमों से पीछे हटना पड़ जाता है। जैसे खटिया में खटमल हो तो बारात वापस चली जाती है। जीएसटी में राज्यों को हुई राजस्व की हानि की भरपाई केन्द्र सरकार द्वारा 5 साल तक की जायेगी। मान लीजिये किसी राज्य की जीएसटी से आय आधी रह जाती है। 5 साल तक केन्द्र इस कमी की पूर्ति कर देगा। लेकिन 5 साल के बाद क्या होगा? उस राज्य की जीएसटी की दरों को बढ़ाया नहीं जा सकेगा चूंकि इनका निर्धारण जीएसटी काउंसिल द्वारा किया जा रहा होगा। फलस्वरूप ऐसे राज्य के पास एकमात्र विकल्प अपने खर्चों में कटौती करना होगा।
जीएसटी व्यवस्था की दूसरी कमी राज्यों द्वारा प्रयोग पर ब्रेक लगाने की है। मान लीजिये जीएसटी काउंसिल ने निर्णय लिया कि साइकिल तथा मर्सीडीज कार पर 18 प्रतिशत की एक दर से ही जीएसटी वसूल की जायेगी। लेकिन किसी राज्य के मुख्यमंत्री चाहते हैं कि साइकिल पर 5 प्रतिशत तथा मर्सीडीज पर 40 प्रतिशत से जीएसटी वसूल की जाये। वे ऐसा नहीं कर सकेंगे।

भरत झुनझुनवाला

भरत झुनझुनवाला

जीएसटी का लाभ है कि पूरे देश में व्यापार सरल हो जायेगा। सब राज्यों द्वारा सभी वस्तुओं का एक सामान्य श्रेणी में वर्गीकरण किया जायेगा और एक ही दर से जीएसटी वसूल की जायेगी। इनमें सामान्य वर्गीकरण का लाभ ज्यादा है। हर राज्य द्वारा अलग-अलग वर्गीकरण करने से बार्डर पर तमाम विवाद उत्पन्न हो जाते हैं। विकल्प है कि जीएसटी के अंतर्गत पूरे देश में सामान्य वर्गीकरण मात्र को लागू किया जाये जबकि हर राज्य को अलग दर से जीएसटी आरोपित करने का अधिकार दिया जाये।
ऐसा करने से राज्यों की स्वायत्तता बनी रहेगी और मुख्यतः अन्तर्राज्यीय व्यापार भी सरल हो जायेगा। ध्यान दें कि डब्ल्यूटीओ के ट्रेड फेसीलिटेशन के समझौते में ऐसी ही व्यवस्था है। पूरे विश्व में माल का वर्गीकरण एक प्रकार से होगा, यद्यपि हर देश अपने विवेकानुसार आयात कर वसूल कर सकेगा। उस प्रक्रिया को अपनायें तो अंतर्राज्यीय व्यापार की सरलता तथा राज्यों की स्वायत्तता दोनों हासिल हो जायेगी।


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