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अच्छे-बुरे की समझ विकसित करें

Posted On January - 3 - 2017

वंदना सिंह
10301CD _RAJENDRA KUMARहिंदी में कुछ ही लेखक ऐसे हैं जो साहित्यिक कोलाहल और दंद-फंद से दूर रहकर साहित्य सृजन में लगे रहते हैं। ऐसे ही लेखक हैं वरिष्ठ कवि, कहानीकार और आलोचक राजेन्द्र कुमार। साहित्यिक नगरी इलाहाबाद में रहकर सृजनात्मकता को साध रहे राजेन्द्र कुमार की कई कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। ऋण गुणा ऋण उनका कविता संग्रह है। उनकी अन्य कृतियां हैं–कहानी संग्रह अनंतर और अन्य कहानियां, आलोचनात्मक कृति साहित्य में सृजन के आयाम और विज्ञानवादी दृष्टि।
अभी हाल में उनकी कुछ किताबें प्रकाशित हुई हैं, जिनमें प्रतिबद्धता के बावजूद, शब्दघड़ी में समय, कथार्थ और यथार्थ और कविता का समय असमय शामिल है। उन्होंने कई किताबों का संपादन भी किया है, जिनमें साही के बहाने समकालीन रचनाशीलता पर एक बहस, स्वाधीनता की अवधारणा और निराला, आलोचना का विवेक आदि प्रमुख हैं। वे साहित्यिक पत्रिका अभिप्राय का 1981 से संपादन कर रहे हैं। उनको मीरा स्मृति पुरस्कार और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का सम्मान भी मिल चुका है।
साहित्य की मौजूदा स्थिति को लेकर वे बहुत संतुष्ट नहीं नजर आते। उनके मुताबिक इस वक्त रचनात्मक शक्तियां थोड़ी कमजोर हो गई हैं। वे ये भी मानते हैं कि अच्छा लिखा जा रहा है लेकिन वो पाठकों तक पहुंच नहीं पा रहा है। अच्छे और बुरे के बीच का फर्क खत्म सा होता जा रहा है। उनको लगता है कि जो भी साहित्य लिखा जा रहा है वो प्रबुद्ध पाठकों तक ही पहुंच पाता है। अगर आप लिटरेचर फेस्टिवल या पुस्तक मेलों में देखे तो प्रबुद्ध पाठक ही वहां पहुंच पाते हैं। जरूरत इस बात की है कि सामान्य पाठकों को साहित्य से जोड़ा जाए। मौजूदा दौर का लेखन सामान्य पाठकों तक नहीं पहुंच पाने को वो साहित्य के लिए गंभीर संकट मानते हैं।
वे कहते हैं कि इस वक्त रचनात्मकता के अनुकूल समय नहीं है। अखबारों और टेलीविजन के दौर में साहित्य की जगह सिकुड़ती जा रही है। साहित्य के पाठक हैं लेकिन उनको अच्छा साहित्य मिलता नहीं है और खराब पढ़कर वो निराश हो जाते हैं। दूसरे पुस्तकों के दाम इतने ज्यादा होते हैं कि वो आम पाठकों की पहुंच से बाहर होने लगे हैं। जरूरत इस बात की है कि सृजनात्मक साहित्य का ऐसा मूल्यांकन हो जो आम जनता तक पहुंच सके और उनकी एक समझ विकसित हो सके। उनका मानना है कि ये काम हिंदी विभागों के शिक्षकों को करना चाहिए और वे ही इसको बेहतर कर सकते हैं। वे इस बात से क्षुब्ध नजर आते हैं कि हिंदी विभागों के शिक्षक इस काम को कर नहीं पा रहे हैं। शिक्षक अच्छी और बुरी रचना के बीच फर्क की समझ विकसित कर सकते हैं।
राजेन्द्र कुमार का मानना है कि कविता भी बहुत लिखी जा रही है लेकिन पढ़ी कम जा रही है। उनका मानना है कि कविता का एक अनुशासन होता था जिसमें छंद, अलंकार, लय आदि होते थे लेकिन जब से ये अनुशासन खत्म हुआ है और कविता और गद्य का फर्क मिट गया है तब से कविता को आम पाठकों को समझने में दिक्कत होने लगी है और वो इससे दूर होने लगा है। वे ये मानते हैं कि गद्यात्मक कविता में भी लय होती है जिसको मुक्तिबोध की कविताओं में देखा जा सकता है।


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