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अनुभव और एहसास की शायरी

Posted On January - 10 - 2017

कालजयी रचना

11001cd _image (170)11001cd __TH11_GULZAR_फूलचंद मानव
नहीं, आसान नहीं होता लोकप्रियता और श्रेष्ठता के संतुलन को बनाए रखना। जी हां, गुलज़ार ने यह कर दिखाया है। शायरी, फिल्मी गीत, कविताएं, कुछ भी हो, विचारों की बुलंदी और अंदाज़े-बयां के साथ गुलज़ार का मुकाम आज महत्वपूर्ण है और उल्लेखनीय भी। उर्दू या हिंदी अथवा पंजाबी भाषा की दीवारों के पार हिंदुस्तानी लहज़े में किसी शायर की पहचान और ख्याति के चलते आधुनिक भारतीय शायरी का पर्याय है गुलज़ार।
‘मेरा कुछ सामान…’ में अनुभव और एहसास की शायरी है। देखना, सहना, कहना और साथ ही एहसास भी करवाते जाना, गुलज़ार के हिस्से आया है। एक दौर था जब फिल्मी लेखन को सतही, सामान्य या फिर उपेक्षित साहित्य की श्रेणी में गिना जाता था। आज इसी को शोध-खोज का विषय बनाकर ऐसे स्तरीय साहित्य पर पीएचडी की उपाधियां दी जाती हैं। जिस्म और रूह, मन और तन, पात्र शब्द नहीं रूपाकृतियां हैं जिन्हें गुलज़ार ने मूर्त रूप देकर हमें जगाया है। अपनी बेटी बोसकी के नाम ही गुलज़ार ने लिखा था—‘बिट्टूरानी बोसकी। बूंद गिरी ओस की।’ मेघना गुलज़ार के नाम समर्पित मेरा कुछ सामान की शायरी मानो महज बोसकी की ही नहीं, हम सबके लिए सौगात है।
‘आ-थई’ से लेकर ‘ता-थई’ तक सवा सौ से ऊपर ये गीत, मेरा कुछ सामान ही नहीं, भारतीय सौंदर्य और शास्त्रीय अर्थों की थाती है, जहां मोतियों की तरह शब्द चमकते हैं, छूते हैं और अंदर उतरते चले जाते हैं। विपल राय और सचिन-दा के निर्देशन में, गुलज़ार मानते हैं, ‘मैं सुर-ताल से बहरा भौचक्का-सा दोनों को देखता रहा, जो चाहा, मैं अपने बोल नूतन (कल्याणी) को ‘बंदनी’ के लिए अर्पित करूं—धुन की लहर हाथ आई तो रचना हुई, मैं पिया को देख आऊं, जरा मुंह फिराई ले चंदा, तोहे राह लागे वैरी, मुस्काए जो जलाई के, कहां ले चला है मनेवा, मोहे बावरी बनाई के। मेरा गोरा रंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे।’
एक गहरी रागात्मकता के साथ जब अनुभूतियां आकार लेती हैं तो कभी चित्र बनाती है, उनमें रंग भरती हैं, या बने हुए चित्रों अथवा रंगों में नए-नए चित्र और नए रंग चढ़ते-उतरते देखती है। प्रकृति और जीवन के बीच बहुत-सा ऐसा बचा रहता है, जिसे समझने की कोशिश की जाए तो उस बच जाने में भी बहुत भरा-पूरापन जीवंत हो आता है। मेरे सरहाने जलाओ सपने, मुझे जरा-सी तो नींद आए। गुलज़ार की कविता के औजार यही हैं—रोटी, तवा, धुआं, पत्ती, कोहरा या पानी-एक बूंद अथवा रोजमर्रा का ऐसा ही सबकुछ, मेरा कुछ सामान…। यशवंत व्यास का चयन ठीक है, ‘खामोशी’ से। हवाओं में लिख दो।
‘चुलबुला यह पानी अपनी राह भुलकर
लेटे-लेटे आईना चमका रहा है फूल पर।’
गीत हैं, कविताएं या नग़में, गुलज़ार की रचनात्मकता का प्रमाण सामने रख रहे हैं। ‘एक अकेला इस शहर में’, दिल खाली-खाली बर्तन है और रात है जैसे अंधा कुआं। इन सूनी अंधेरी रातों में, आंसू की जगह आता है धुआं। (घरौंदा)
प्रकृति, पर्व, पहाड़, बिजली, उल्लास, गम या उदासी, मौसम और माहौल स्थापित करने में गुलज़ार ने पहल की है। ‘एक राह रुक गई तो और जुड़ गई, मैं मुड़ा तो साथ-साथ राह मुड़ गई, हवा के पैरों पर मेरा आशियाना। मुसाफिर हूं यारो…’ (परिचय)। फिर यह गुलज़ार नहीं, पात्र है, भूमिका निभाता कलाकार, सिचुएशन को चरितार्थ करता हुआ। ‘खुशबू’ का ‘ओ माझी रे, अपना किनारा, नदिया की धारा है। साहिलों पे बहने वाले कभी सुना तो होगा कहीं, कागजों की कश्तियों का कोई किनारा होता नहीं। कोई किनारे जो किनारे से मिले तो वह अपना किनारा है।’
कालजयी शब्द हैं या अर्थ? गीत के बोल होते हैं या मंजर जो अंदर की तस्वीर बदल जाते हैं। तस्वीर बदल जाते हैं ‘मेरा कुछ सामान…’ यहां गुलज़ार का संसार भी है, आधार भी, व्यवहार भी है तो सरोकार भी। यही अंतर गीतकारों की भीड़ से पंजाब के गुलज़ार को भिन्न और ऊपर दिखा रहा है।
किताब, गोलमाल, कशिश, किनारा, सन्नाटा, देवता, देवदास, थोड़ी-सी बेवफाई, गहराई, मौसम, नमकीन, आंधी से लेकर आनंद, ख्वाहिश, सितारा, सीमा, माचिस, आस्था जैसी फिल्मों में आ-थई प्रभावित हैं तो ता-थई में घर, पलकों की छांव में, मेरे अपने, दो दूनी चार, गृहप्रवेश, इजाजत तक जो समां बंधा है, सर्जन और सृजन के संसार में गुलज़ार का स्थापित्य और एकाधिपत्य है। मध्य वर्गीय जीवन का आईना, घर-परिवार, समाज का वास्तव, क्या है जिसे शायर गुलज़ार की कलम नहीं छू रही। आप इन्हें फिल्मी कहकर छोड़ सकेंगे। तो नेचर और वे तेवर जो मात्र गुलज़ार की पंक्तियों में ही कबूतरों की तरह गुटर-गूं कर रहे हैं, जिन पर पाठक, दर्शक, श्रोता भी मोहित हो रहे हैं।
जिस फिल्म के लिए भी गुलज़ार लिखते हैं, कोई सवाल कोई सोच छोड़ रहे हैं। कथा, पटकथा, लेखन, संवाद, निर्देशन से आगे गीतकार गुलज़ार के पास जो भाषा की सागदी का आकर्षण है, उसे कोई दूसरा रचनाकार अभी तक भुना भी नहीं पाया। नकल, प्रतिस्पर्धा, टीस या होड़ के सारे नाम, यूं ही तिरोहित हो जाते हैं। क्लासिक गीत नहीं, उसके बोल भी नहीं, मेरा कुछ सामान… है जिसमें करोड़ों अरमान हैं, गाते हुए गुनगुनाते हुए।


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