अन्न पैदा करने वाला मर रहा कर्ज के बोझ तले !    वेंकैया ने की कसरत !    गोदाम में आग, 4 युवक झुलसे !    अवैध निर्माण तोड़ने को हूडा विभाग में अलग दस्ता !    दोस्त के साथ मिलकर पत्नी को मार डाला !    पूर्व एमएलए जौली के खिलाफ रेप केस !    अपनी जमीन खाली करा पौधे लगाएगा वन विभाग !    विकास के मुद्दे पर भड़के सरपंच, सीएम तक पहुंचे !    डिपोधारकों का सामूहिक छुट्टी पर जाने का अल्टीमेटम !    'निजी बस चालक नहीं मानते बस पास' !    

असली मुद‍्दा है क्रियान्वयन

Posted On January - 9 - 2017

राजनीतिक शुचिता मुहिम

10901CD _RELIGIONअनूप भटनागर
पंजाब और उत्तर प्रदेश सरीखे राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील राज्यों सहित पांच राज्य विधानसभाओं के चुनावों से ठीक पहले देश की सर्वोच्च अदालत ने चुनाव में जाति, धर्म, भाषा और समुदाय आदि के नाम पर वोट मांगने की बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने का प्रयास किया है। न्यायालय ने चुनाव के दौरान ऐसी किसी भी गतिविधि के साथ धार्मिक नेताओं द्वारा भी किसी उम्मीदवार विशेष के पक्ष या विरोध में धर्म के नाम पर वोट देने अथवा नहीं देने जैसी अपील को भी भ्रष्ट आचरण के दायरे में शामिल किया है।
जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 (3) के अनुसार किसी प्रत्याशी या उसके चुनाव एजेन्ट या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उम्मीदवार की रजामंदी से धर्म, जाति, संप्रदाय या भाषा के आधार पर वोट देने अथवा नहीं देने की अपील भ्रष्ट आचरण के दायरे में आती है। लेकिन इस प्रावधान के तहत ऐसे साक्ष्य की जरूरत होगी ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि क्या इस प्रावधान का उल्लंघन करते हुए कोई अपील की गयी थी। आरोप सिद्ध होने पर प्रत्याशी को अयोग्य घोषित किया जा सकता है। इसके लिये चुनाव याचिका दायर करना जरूरी होगा। लेकिन लगातार यह सवाल उठ रहा है कि राजनीति में इनके और विशेषकर धर्म के इस्तेमाल को कैसे रोका जा सकता है।
अब चूंकि प्रधान न्यायाधीश (सेवानिवृत्त) न्यायमूर्ति तीरथ सिंह ठाकुर की अध्यक्षता वाली सात सदस्यीय संविधान पीठ की इस व्यवस्था ने भी अपनी व्याख्या के साथ इस प्रावधान पर अपनी मुहर लगा दी है, इसलिये क्या यह समझ लिया जाये कि चुनावों में जाति, धर्म, संप्रदाय और भाषा के नाम पर राजनीतिक गतिविधियों पर अंकुश लग जायेगा। कहना मुश्किल है। राजनीति को इस तरह की भ्रष्ट गतिविधियों से मुक्त कराने के लिये कानूनी प्रावधानों और न्यायिक व्यवस्थाओं की सराहना तो की जा सकती है लेकिन वास्तव में इन पर प्रभावी तरीके से अमल एक टेढ़ी खीर है। इस तरह की प्रतिबंधित गतिविधि में शामिल होने के आरोप साबित करने में काफी वक्त लग सकता है और फिलहाल चुनाव याचिकाओं के निपटारे के लिये किसी भी समय सीमा का प्रावधान नहीं है। कई बार ऐसा भी होता है कि विजयी उम्मीदवार का कार्यकाल पूरा हो जाता है परतु चुनाव याचिका का निपटारा ही नहीं हो पाता है।
वैसे भी जब हमारे देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होने के लिये धार्मिक, जातीय अथवा संप्रदाय का स्पष्ट संकेत देने वाले नामों से राजनीतिक दलों का निर्वाचन आयोग में पंजीकरण होता है तो फिर धर्म, जाति और संप्रदाय के आधार पर राजनीतिक गतिविधियों को इससे अलग कैसे किया जा सकता है? अगर वास्तव में हम धर्म, जाति, भाषा और संप्रदाय को राजनीति से अलग करना चाहते हैं तो हमें इन आधारों पर राजनीतिक दलों के पंजीकरण पर प्रतिबंध लगाने के बारे में गंभीरता से विचार करना होगा। धार्मिक और संप्रदाय के आधार पर राजनीति करने वाले कुछ दलों के नेता हालांकि इससे सहमत नजर नहीं आते। उन्होंने इस संबंध में हिन्दुत्व और हिन्दुवाद जैसे शब्दों के प्रयोग को इसके दायरे से बाहर रखे जाने पर भी सवाल उठाये।
ऐसा करने वाले नेताओं को यह ध्यान रखना होगा कि ‘हिन्दुत्व’ और ‘हिन्दुवाद’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल के बारे में 1995 में ही देश की सर्वोच्च अदालत व्यवस्था दे चुकी है कि हिन्दुत्व तो जीवन पद्धति है और हमें यह देखना होगा कि हिन्दुत्व तथा हिन्दुवाद जैसे शब्दों का प्रयोग किस संदर्भ में किया गया है। सात सदस्यीय संविधान पीठ के पास जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 के प्रावधान के तहत विचार और सुविचिारित व्यवस्था के लिये भेजे गये दो सवालों में हिन्दुत्व या हिन्दुवाद शामिल नहीं था। संविधान पीठ के समक्ष विचारार्थ पहला सवाल था-क्या धर्म, जाति, संप्रदाय या भाषा के आधार पर वोट देने की अपील को प्रत्याशी के धर्म, जाति, संप्रदाय या भाषा के संदर्भ में निर्धारित किया जा सकता है और दूसरा सवाल था, यदि कोई तीसरा पक्ष इस तरह की अपील करता है तो संबंधित प्रत्याशी को चुनाव में भ्रष्ट आचरण का दोषी ठहराते हुए अयोग्य घोषित करने से पहले क्या तीसरे पक्ष से पूछताछ की जरूरत है?
लगता है कि नयी व्यवस्था के बाद भी हम पहले वाली ही स्थिति में हैं क्योंकि इस फैसले के तुरंत बाद एक दल ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा करते हुए संप्रदाय और जातीय गणित के बारे में विस्तार से अपने विचार पेश किये।  लेकिन प्रश्न फिर भी वही है कि धारा 123 (3) के प्रावधान का विस्तार किये जाने के बावजूद राजनीति में इनके और विशेषकर धर्म के इस्तेमाल को कैसे रोका जा सकता है। यदि हम वास्तव में गंभीर हैं तो सभी राजनीतिक दलों को संयुक्त प्रयास करके आम सहमति बनानी होगी। सरकार को भी चाहिए कि यदि कोई चुनाव याचिका दायर होती है तो एक निश्चित समय के भीतर उसका निपटारा हो।


Comments Off on असली मुद‍्दा है क्रियान्वयन
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

समाचार में हाल लोकप्रिय

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.