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आधी हकीकत

Posted On January - 10 - 2017

पूरा सच बयां नहीं करते जीडीपी आंकड़े

सकल घरेलू उत्पाद का हालिया आंकड़ा बेशक गिरावट की ओर ही इंगित करता है तथापि 7.1 फीसदी की यह ताजा दर सरकार के लिए ज्यादा फायदे का सौदा साबित होनी चाहिए क्योंकि एक तो यह राज्यों के चुनावों से पूर्व आयी है और दूसरा, देश की अर्थव्यवस्था को नोटबंदी के कारण पहुंचा भारी नुकसान इस नए आंकड़े में शामिल नहीं है। सरकार ने चूंकि बजट की तारीख पहली फरवरी कर दी है, नोटबंदी के कारण प्रभावित सकल घरेलू उत्पाद डाटा 28 फरवरी को आएगा। इसीलिए वित्त मंत्री अरुण जेटली का बजट अर्थव्यवस्था की हूबहू तस्वीर पेश नहीं कर पाएगा क्योंकि इसमें नोटबंदी के कारण हुए नुकसानों की फेहरिस्त शामिल नहीं होगी। फिर उस नगदी वाले अनफॉर्मल सेक्टर की कौन बात करेगा जिसकी नोटबंदी ने कमर तोड़ कर रख दी है। फॉर्मल और इनफॉर्मल सेक्टर की तमाम प्राप्तियों का आकलन कार्पोरेट घरानों के राजस्व तथा बिक्रीकर की कलेक्शन आने पर तय होता है। तत्पश्चात ही सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़े तैयार होते हैं। सकल घरेलू उत्पाद के वर्तमान आंकड़े इनफॉर्मल सेक्टर के वर्ष 2011 के सर्वेक्षण पर आधारित हैं। इसीलिए तीसरी व चौथी तिमाही के तमाम उत्पादन तथा नौकरी के क्षेत्र में हुए नुकसान को आगामी वित्तीय वर्ष के बजट में शामिल नहीं किया जाएगा।
प्राइवेट सेक्टर के किसी अर्थशास्त्री ने सही कहा है कि हम सब गड्डमड्ड डाटा को आधार मानकर कार्य कर रहे हैं। हालांकि सरकार नोटबंदी के बाद के प्रभावों को अल्पावधि की पीड़ा करार देती है मगर पीड़ा का यह सिलसिला अभी एक साल तक खिंचेगा। वे सकल उत्पादन के सरकारी आंकड़ों को खारिज करते हैं। अत्यंत धीमी चाल से चल रहे उत्पादन की कड़वी सच्चाई को स्वीकार करने की बजाय केंद्र सरकार के प्रवक्ता भविष्य के सुनहले सपनों की तस्वीर पेंट कर रहे हैं। दरअसल उत्पादन, निर्माण तथा सर्विस क्षेत्र कुछ और ही कहानी बयान करता है। कार्पोरेट कमाई भी निराशाजनक है। प्राइवेट निवेश की गैर-मौजूदगी में सारा बोझ सरकारी कंधों पर आना लाज़िमी है। मांग तभी बढ़ेगी जब सरकार जनता के हाथों में नकदी का प्रवाह बढ़ाएगी तथा रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कमी लाएगा। अर्थव्यवस्था तभी सुधरेगी जब कार्पोरेट इंडिया तथा मध्य वर्ग खर्च करना शुरू करेगा।


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