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आश्रम के मैनेजर का उबाऊ रवैया

Posted On January - 1 - 2017

यशपाल
YES copyगरीबी हटाने के उपाय पर यशपाल के मित्र बोले-‘उपाय तो सीधा है, मशीनों के अधिक उपयोग से पैदावार को खूब बढ़ाया जाए। मशीन को हटाकर पैदावार का काम हाथ से कराने से काम करने वालों की संख्या बढ़ जाएगी परंतु पैदावार नहीं बढ़ेगी। इससे प्रति व्यक्ति की आर्थिक व्यवस्था सुधरेगी नहीं बल्कि और गिर जाएगी। पैदावार के साधनों अर्थात कल-कारखानों और जमीन को कुछ पूंजीपति व्यक्तियों की संपत्ति न रहने देकर परिश्रम करने वाली आम जनता या समाज की संपत्ति बना दिया जाए।’
सिर हिलाते हुए मैनेजर साहब ने अस्वीकार किया – ‘नहीं, इस तरीके में हिंसा है।’
‘तो फिर आप ही कोई उपाय बताइए।’
‘इसका उपाय है पूंजीपतियों और जमींदारों को समझाना कि जनता के हित के लिए त्याग करें।’ मैनेजर साहब ने उत्तर दिया।
‘परंतु आप तो समझाने का उपाय या कोई दूसरा उपाय, जिससे पैदावार के साधन जनता के हाथ में आ जाएं, व्यवहार में न लाकर केवल मशीन का विरोध कर रहे हैं। इससे तो समाज का कल्याण हो नहीं सकता। पिछले बीस वर्ष से अहिंसा के प्रचार द्वारा आप कितने लोगों को शोषण न करने के लिए समझा  पाए हैं?’
‘हम लोग आहिस्ता-आहिस्ता समझाने का यत्न कर रहे हैं परंतु हिंसा के मार्ग को हम स्वीकार नहीं कर सकते।’ मैनेजर साहब ने उत्तर दिया।
मैनेजर साहब की न समझने की प्रतिज्ञा से श्री पी.वाई. देशपांडे कुछ ऊब गए। इस व्यर्थ की बहस के बजाय उन्होंने सिगरेट पीना ही बेहतर समझा। जेब से सिगरेट केस निकालते हुए उन्होंने मैनेजर साहब की कुटिया को धुएं से पवित्र करने की आज्ञा चाही।
मैनेजर साहब ने क्लाॅक के पैंडुलम की तरह अपना सिर हिलाते हुए आज्ञा देने से इनकार कर दिया। उनके निस्तेज चेहरे पर विजय की मुस्कान भी एक क्षण के लिए दिखाई दी, मानो एक बात में तो उन्होंने हम लोगों को निरुत्तर कर दिया। उनकी इस आत्मतुष्टि को देखकर श्री देशपांडे के लिए हंसी रोकना कठिन हो गया। मैं पतलून पहने था। जमीन पर बैठने में मुझे आराम नहीं मालूम पड़ रहा था इसलिए उठकर घूमना ही चाहा। उस चिलचिलाती धूप में हमारे आश्रम पहुंचने पर भी मैनेजर साहब ने हमें जल वगैरह के लिए पूछना आवश्यक नहीं समझा।
देशपांडे साहब को समय काटना मुश्किल हो रहा था। मैनेजर साहब को संबोधन कर उन्होंने पूछा – ‘शायद एक गिलास जल तो आप पिला ही सकते है!’
मैनेजर ने स्वीकार किया कि ऐसा वे कर सकते हैं और उन्होंने करके दिखा भी दिया। अतिथि के प्रति इस व्यवहार को गांधीवादियों का साधारण नियम नहीं कहा जा सकता। वर्धा में गांधी आश्रम के मंत्री और गांधी जी के स्टाफ के मेंबर श्री किशोरीलाल मशरूवाला के यहां जाने पर उन्होंने जल और भोजन दोनों के लिए हमें पूछा था। संभवतः अतिथियों के प्रति उपेक्षा करना आश्रम का ही रिवाज है। इसके लिए आश्रमवासियों को दोष भी नहीं दिया जा सकता। हो सकता है, आश्रम देखने आने वालों की संख्या इतनी अधिक हो कि सबको जल पिला देना भी आसान काम न हो। चिड़ियाघर में जाने वाले दर्शकों को भी चिड़ियाघर के निवासी विशेष स्वागत की दृष्टि से नहीं देखते। अलबत्ता चने या मूंगफली के रूप में कुछ भेंट लेकर जाएं तो बात दूसरी हो सकती है।

अगले अंक में पढ़ें : गांधी की कुटिया की सादगी
(हिंदी समय डॉट कॉम से साभार)


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