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एकदा

Posted On January - 9 - 2017

इनसानियत का फर्ज

वर्ष 1942 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल सरकार में वित्त मंत्री थे। उन्होंने देखा कि अंग्रेज सरकार ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के खिलाफ दमन नीति अपना रही है। उन्होंने तुरंत वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो को पत्र लिखकर दमन नीति बंद करने का आग्रह किया। कुछ दिनों बाद मिदनापुर में भयंकर तूफान आया। राहत कार्यों के प्रति अंग्रेजों ने उपेक्षा का रुख दिखाया। उन्होंने तुरंत मंत्रिमंडल से अपना त्यागपत्र दे दिया। एक दिन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो बंगाल के दुर्भिक्ष ग्रस्त इलाके का दौरा कर रहे थे। उन्होंने देखा कि एक गांव में डॉ.मुखर्जी अपने युवा साथियों के साथ पीड़ितों को अपने हाथों से भोजन करा रहे हैं। बीमार व्यक्तियों को अस्पताल भिजवा रहे हैं। यह देखकर लॉर्ड लिनलिथगो एक अंग्रेज से बोले, ‘आज पता चला कि डॉ. मुखर्जी ने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र क्यों दिया था? वास्तव में कोई भी सच्चा जनसेवक अपने देश के संकटग्रस्त लोगों को भाग्य के भरोसे नहीं छोड़ सकता।’ लॉर्ड लिनलिथगो को देखकर डॉ.मुखर्जी उनके पास आए और बोले, ‘चाहे व्यक्ति कोई भी हो पर इनसानियत तभी जिंदा रहती है जब एक इनसान इनसानियत के नज़रिए से काम करता है।’ डॉ. लिनलिथगो वहां से बिना कुछ बोले चले आए।

प्रस्तुति : रेनू सैनी


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