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एकदा

Posted On January - 10 - 2017

कला की गरिमा

एक बार राजा जनक के दरबार में एक बहुरूपिया पहुंचा। उसने अपना परिचय दे राजा से पांच मुद्राओं की याचना की। राजा ने कहा-अगर तुम बहुरूपिए हो तो पहले अपनी कला दिखाओ। राजा की बात सुन बहुरूपिया चला गया। अगले दिन सुबह राज्य के लोगों को सीमा पर एक साधु बैठा दिखा। ढोर चराने आए चरवाहों ने उसका वंदन किया। चरवाहों ने यह बात गांव वालों को बता दी। दूसरे दिन राज्य के कई लोग साधु के दर्शन करने पहुंचे। वे अपने साथ दान में देने के लिए कीमती चीजें भी लाए थे। पर साधु ने चीजों को छुआ तक नहीं। खबर सुन राजा भी धन-धान्य लेकर साधु के दर्शन को आ पहुंचे। साधु ने कुछ नहीं लिया। किसी अनिष्ट की आशंका से राजा ने अगले दिन अपने दरबारियों को बुलवाया। पर सुबह-सुबह ही वह बहुरूपिया उनके सामने आ गया। वह राजा से बोला-मैं ही वह साधु था, जिसे कल तुम मिले थे। मैंने अपनी कला दिखा दी, तुम मुझे पहचान न सके। अब लाओ मुझे पांच मुद्राएं दान में दो। राजा ने विस्मय से पूछा-कल तुम्हारे सामने धन का ढेर लगा था, तुमने तब क्यों नहीं लिया। वह बोला-महाराज, कल मैं साधु था, अगर मैं दान स्वीकार कर लेता तो मेरी कला की गरिमा खो जाती। मुझे पांच मुद्राओं की जरूरत थी, उतना धन लेकर मैं क्या करता?              प्रस्तुति : रोहित शर्मा


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