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ओबामा की चिंताएं

Posted On January - 11 - 2017

बची रहे अमेरिका की मूल पहचान
Edit-1हालांकि 20 जनवरी से अमेरिका की बागडोर नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप संभालने जा रहे हैं, लेकिन निवर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने विदाई भाषण में जिन मूल्यों-मुद्दों को रेखांकित किया है, उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए कि कोई भी समाज और व्यवस्था मूल्यों की ही नीव पर टिकी होती है और उसी से मजबूती भी प्राप्त करती है। लगातार दो कार्यकाल राष्ट्रपति रहे ओबामा अमेरिकी लोकतंत्र की उदारता और परिपक्वता का प्रतीक भी माने जाते हैं। इसके बावजूद उनकी पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन को हरा कर उद्योगपति से राजनेता बने डोनाल्ड ट्रंप ने जिस तरह अमेरिका ही नहीं, पूरी दुनिया को चौंका दिया है, उससे अमेरिकी समाज की सोच में बदलाव पर नये सिरे से बहस चल पड़ी है। अमेरिकी समाज की धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक समरसता की मिसाल दी जाती रही है, लेकिन पिछले दिनों हुए राष्ट्रपति चुनाव में समाज में न सिर्फ आर्थिक असमानता, बल्कि नस्लभेदी विभाजन भी साफ महसूस किया गया। अपनी विवादास्पद पृष्ठभूमि के बावजूद ट्रंप की जीत के मूल में यही माना जा रहा है कि मूल अमेरिकी गोरे खुद को अपने ही देश में उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। बेशक इसके कारण आर्थिक ज्यादा हैं। वैश्वीकरण के चलते बढ़ी प्रतिस्पर्धा में वे पिछड़ रहे हैं। कारोबार-रोजगार की स्पर्धा में पिछड़ने के परिणामस्वरूप आर्थिक असमानता भी बढ़ रही है।
इस सबसे मूल अमेरिकियों में संकीर्ण सोच का विस्तार हो रहा है। ध्यान रहे कि ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार में उनकी इसी सेाच को उभारा और फिर उसका भावनात्मक दोहन किया। प्रवासियों, खासकर मुस्लिमों के विरुद्ध तो उनके आक्रामक प्रचार की काफी आलोचना भी हुई, लेकिन जीत ने नयी आशंकाओं को जन्म दिया है। वे ही आशंकाएं ओबामा के शिकागो में दिये विदाई भाषण में भी मुखर हुईं। बेशक आर्थिक असमानता किसी भी समाज-देश के लिए शुभ नहीं है, लेकिन इसका समाधान संकीर्णता में हरगिज नहीं है। आज अगर अमेरिका को विश्व समुदाय का अगुअा माना जाता है तो निश्चय ही इसका श्रेय उसके परिपक्व लोकतंत्र के साथ ही उदार समाज को भी जाता है जो नस्ल या धर्म-जाति के भेदभाव बिना सभी को ससम्मान अपनाता रहा है। जैसा कि ओबामा ने याद भी दिलाया है, नस्लभेद को लेकर अमेरिका में अब पहले जैसा भेदभाव नहीं है, लेकिन सब कुछ पूरी तरह सहज भी नहीं है।  निश्चय ही समाज और देश का बनना-संवरना एक सतत प्रक्रिया है। इसलिए ओबामा सत्ता परिवर्तन के समय जिन मूल्यों की ओर इशारा कर रहे हैं, उनकी रक्षा बेहद महत्वपूर्ण है। बेशक परिवर्तन प्रकृति का भी नियम है, पर वह स्वाभाविक गति से और सकारात्मक दिशा में हो, तभी सार्थक होता है।


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