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कड़ाके की ठंड में नोटबंदी, कर्जा माफी मुद्दे भी पड़े ठंडे

Posted On January - 11 - 2017

विधानसभा चुनाव

रुचिका एम. खन्ना/ट्रिन्यू
10501cd _punjab vidhan sabhaचंडीगढ़। पंजाब में विधानसभा चुनाव अब केवल 24 दिन दूर हैं। आसमान में बादलों में सूरज की अांख-मिचौनी के बीच हम यहां के मतदाताओं का मूड भांपने के लिये निकले। जैसे ही हमारी कार मोहाली की कंक्रीट की सड़कों में दौड़ने लगी, आसपास शानदार इमारतें देख कर सत्ताधारी सरकार के दावे सच लगने लगे मगर जैसे ही सोहाना अस्पताल से आगे निकले, यह भ्रम टूटता दिखाई दिया। संकरी सड़कों में सभी तरह का सामान बेचने वालों ने सड़क पर कब्जा जमाया हुआ था, चाहे वे मार्बल बेचने वाले हों या फल-जूस बेचने वाले या फिर मैैकेनिक। इस मंज़र ने फिर से हमें विकास योजनाओं में कमियों की याद दिलवा दी जहां बड़े-बड़े फ्लाईओवर के नीचे शहरीकरण का दूसरा पहलू सबके सामने मौजूद है मगर हाईवे पर हाई स्पीड में दौड़ती गाड़ियों से वे दिखाई नहीं देता।
10501cd _punjabखरड़-लांडरां क्राॅसिंग में जब ट्रैफिक धीरे हुई तो अचानक एक फल बेचने वाले ने हमारी कार का शीशा खटखटाया। हमने शीशा नीचे किया और फल खरीदते हुए पूछा,‘फेर वोटां दा की लगदा है? उसने तुरंत पूछा-तुसी किस पार्टी दे हो? हमारे यह बताने पर कि हम पत्रकार हैं,उसने कहा,‘कौन जितुगा एेह ता पता नीं पर इतना है कि हुण लोक फेर पार्टियां नाल जुड़न लग पये ने। जिस वी पार्टी दी विचारधार रखदे सी, ओह फेर उसी पार्टी नाल जुड़ रहे लगदे ने।’ जैसे ही ट्रैफिक आगे बढ़ने लगी हम फतेहगढ़ साहिब चल पड़े। रास्ते में खेतों की हरियाली पर इस बार कई रंग थे। कहीं नीला-पीला (अकाली दल), तो कहीं सफेद अौर हरा (कांग्रेस) रंग ट‍्यूबवैल की दीवारों पर था। इसके अलावा वहां फार्महाउसों की दीवारों पर ‘केजरीवाल’ की उपस्थिति भी दिखाई दे रही थी।
चुन्नी से थोड़ा आगे जाने पर गुड़ बनता दिखाई दिया तो रुकने का मन कर गया। वहां गुड़-शक्कर बेच रहे जसपाल सिंह से बात शुरु हुई। जसपाल ने निडर हो कर बात की। इसने कहा,‘वादे तां सारे इक्को जेहे करदे नें, लोकां नूं बेवकूफ समझदे नंे। सारे कहदें नेें कि किसानां दा कर्ज माफ करांगे। सानू वी पता है एह नहीं हो सकदा। इस इशू ते वोटां नीं पैणियां हुण।’ उनसे जब नोटबंदी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि हालांकि कई कीमती घंटे बैंकों की लाइनों में लगना पड़ा। अगर नोटबंदी देश की भलाई के लिये है तो यह बहुत छोटी कुर्बानी है। अब पैसे की सप्लाई ठीक हो गयी है। यह अब क्यों चुनावी मुद‍्दा बनेगा?
सिंगल रोड से हम फिर मंडी गोबिंदगढ़ जाने वाले जीटी रोड पर आ गये। वहां बंद पड़ी एक स्टील फैक्टरी के बाहर खड़े गार्ड ने बताया कि कैसे टोहरा गांव में 4 एकड़ ज़मीन होते हुए भी उसे गार्ड का काम करना पड़ा। उसने बताया कि इन 30 वर्षों में गांव कितना समृद्ध था और कैसे एसजीपीसी के अध्यक्ष गुरचरण सिंह टोहरा ने गांववालों का आर्थिक विकास करते हुए लोगों को नौकरियां दिलवायीं। उन्होंने हमें चाय का कप देते हुए कहा,‘लोक इन्ने साल दी वफादारी ते आपसी मेलजोल (पार्टी और उम्मीदवार से) किद्दां छड सकते ने? पैलां लोकी कर्जमाफी नाल प्रभावित थे पर हुण सब नूं पता है कि कर्ज माफ कोई वी पार्टी नहीं कर सकदी।
लोहा नगरी के अंदर पहुंच कर हमने वहां के सबसे बड़े उद्योगपतियों में शामिल हस्ती से बात की। नाम न बताने की शर्त पर उन्होंने कहा कि उन्हें चुनाव स्पांसरशिप की कई फोन काॅल आ रही हैं। उन्होंने कहा,‘नोटबंदी की परेशानी खत्म हुई तो अब यह चुनावी परेशानी सामने आ गयी है। प्रत्याशी को मिलने वाले समर्थन का अंदाज़ा इससे लगाया जाता है कि किसका डोनर सबसे पहले लंच या डिनर रखता है। मैंने पहले ही अमलोह और खन्ना विधानसभा के उम्मीदवार के लिये 5-5 लाख रुपये अलग से रखे हैं। हमारे पास कोई चारा नहीं है। नोटबंदी का यह फायदा रहा कि हमें उतना स्पांसर नहीं करना पड़ेगा जितना वर्ष 2014 के चुनाव में करना पड़ा।’
वहां लुधियाना से आये उनके बिल्डर दोस्त ने भी बताया कि लुधियाना में कैसे उद्योगपति 3 से 5 विधानसभा क्षेत्रों के लिये कम से कम 2 उम्मीदवारों के लिये पैसा जुटाने को मजबूर हैं।
परंतु यह कहानी किसी और दिन के लिये!


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