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कविताएं

Posted On January - 10 - 2017

एक टुकड़ा आकाश

कतरा–कतरा पल बीते
गुज़र गए कितने ही साल
छूट गए सब गुड़िया–झूले
आ बैठी प्रीतम के द्वार।
कल्पनाएं कितनी बिखर गयीं
फर्श के पोंछे के साथ
सपने सारे अटक गए
छत के कोनों के जालों में।
मिट्टी–गाराÊगोबर थाप
सहलाती रही अपने हाथ
हर शाम दीया जलाया
क्योंकर जल गए मेरे हाथ।
प्रार्थनाओं का फल मीठा ही है
यही रहा सदा एहसास
ईंट सिरहानाÊ धरती बिछौना
बने रहे मेरे साथ।
अब तो इनसे निकल जाऊंगी
नए साल पर वर मांगूंगी
अपनी लली को दिलाऊंगी
एक टुकड़ा धरती का
और एक टुकड़ा आकाश।
                                     – विकेश निझावन

अमर प्रेम

उसने प्रेम किया
उसने प्रेम पत्र लिखे
उसने प्रेम कविता लिखी
और
उसने प्रेम को सब कुछ माना
यह किसे भी पसंद नहीं आया
फिर वह मिट्टी में मिल गई
और—
प्रेम उसका अमर हो गया…।

                                        – पुरुषोत्तम व्यास


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