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गांधी की उंगली पर बंधी चिंदी

Posted On January - 8 - 2017

यशपाल
Yashpal copyघड़ी में तीन ही बज पाए थे और गांधी जी से मुलाकात का समय चार बजे था। आश्रम में शायद कोई ऐसा छाया का स्थान न था, जहां हमें बैठा दिया जाता इसलिए धूप में ही घूमना पड़ा। परेशान होकर सेक्रेटरी साहब की तलाश की। इस समय श्री मशरूवाला वर्धा से आश्रम में आ गए थे। देशपांडे साहब ने उनसे प्रार्थना की कि मुलाकात करा सकते हैं तो कराइए, वरना यों धूप में प्रतीक्षा करते रहना कठिन है। उन्हें इतना कह कर हम लोग आश्रम के बाहर एक वृक्ष के नीचे सड़क पर खड़ी गाड़ी में बैठ सिगरेट जलाकर प्रतीक्षा करने लगे। कुछ मिनट में श्री मशरूवाला सिर पर तौलिया रखे आते हुए दिखाई दिए और सूचना दी कि मुलाकात अभी हो सकती है।
गांधी जी की कुटिया खूब ठंडी थी। दीवारें ईंट की न होकर मिट्टी की हैं, इससे धूप में तपती नहीं। छत भी फूस की खूब मोटी और भारी है। गरम हवा को रोकने के लिए टट्टियां भी लगी हुई थीं परंतु खस की नहीं। श्री मशरूवाला से पूछा – ‘आश्रम के समीप ही वर्धा नदी होने से शायद खस का मूल्य अधिक नहीं देना पड़ेगा फिर खस के स्थान पर फूस क्यों?’
उत्तर मिला – ‘खर्च का कोई सवाल नहीं है। प्रश्न भावना का है। खस की सुगंध के साथ नजाकत और अमीरी की भावना जुड़ी हुई है। वह गांधी जी के विचारों के अनुकूल नहीं।’
मशरूवाला साहब का उत्तर उनके दृष्टिकोण से सही है परंतु यदि समान परिश्रम और व्यय से मनुष्य के जीवन को अधिक सुखमय बनाया जा सकता है तो इससे मनुष्य के पतन की संभावना नहीं दिखाई देती। जब अकारण ही विश्राम और सौंदर्य को दूर रखकर गरीबी और कुरूपता को अपनाया जाए तो इसे त्याग के प्रदर्शन के सिवा और क्या कहा जाएगा? साधारणतः यह सादगी नहीं, सादगी का प्रदर्शन ही कहा जाएगा।
कुटिया में फर्श पर एक ओर बिस्तर लगा था। बिस्तर पर गांधी जी लेटे हुए थे। दूसरी ओर दर्शनार्थ आने वाले सज्जन बैठे थे। गांधी जी के सिरहाने एक डेस्क सामने रखे श्री मशरूवाला और उनके समीप श्री कृपलानी बैठे थे। गांधी जी के चरणों के समीप बैठी एक ‘बेन’ (बहिन) छत से लगे हल्के पंखे को जल्दी-जल्दी खींच रही थीं। पंखा केवल गांधी जी के बिस्तर पर था। गांधी जी के चरणों की ओर, उनकी दृष्टि के सामने हम लोग भी जा बैठे। एक भीगा कपड़ा गांधी जी के सिर पर, दूसरा पेट पर और एक चिंदी उनकी पांव की उंगली पर बंधी हुई थी। वे चित्त निढाल से लेटे हुए थे। हमारे आदरपूर्ण नमस्कार का उत्तर गांधी जी ने हाथ जोड़कर दिया।

अगले अंक में पढ़ें : पट्टी के बारे में खुलासा

हिंदी समय डॉट कॉम से साभार


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