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घोषणा-पत्र में गौण हैं महिलाओं के मुद्दे

Posted On January - 10 - 2017

11001cd _punjab womenआशा अर्पित
पंजाब विधानसभा चुनाव का डंका बज चुका है। चुनावी कैनवस पर पारंपरिक पार्टियों के अलावा इस बार तीसरी पार्टी आप ने भी सत्ता के चुटीले अंदाज़ का रंग भर दिया है। पंजाब की आम जनता एक नये क्षितिज की तलाश में है। पहले की तरह इस बार भी चुनावी घोषणापत्र में घुमा-फिराकर उन्हीं मुद्दों को केंद्रित किया गया है जो अकसर रहते हैं। महिलाओं के मुद्दे अब भी इन चुनावी घोष्ाणापत्रों में गौण हैं। महिला सशक्तीकरण के नाम पर किसी-किसी महिला नेता की सभा में ये मुद्दा कभी-कभी छलक उठता है। बलात्कार, अपहरण, दहेज और नशे जैसी बुराइयों को दूर करने का संकल्प लेता किसी भी पार्टी का चुनावी घोषणापत्र इसकी हामी भरता दिखाई नहीं देता। व्यावहारिक शिक्षा और रोजगार आज भी पंजाब की महिलाओं की पहली मांग है खासतौर पर घरेलू महिलाओं की।
होशियारपुर के लघु सचिवालय में जिले के गांवों से रोजाना बहुत सी महिलाएं अपने काम करवाने आती हैं खासकर सुविधा सेंटरों में दिनभर इन्हें देखा जा सकता है। ज्यादातर घरेलू महिलाएं फार्म तक नहीं भर पातीं और दूसरों का सहारा लेती हैं। सरकारी सुविधाओं का ज्यादा पता नहीं, अगर पता है तो एप्रोच करने में पीछे रह जाती हैं। चुनावों के बारे में अगर उनकी राय पूछी जाए तो फट से अपनी मांगें गिनाना शुरू कर देती हैं। जब उनसे यह पूछा गया कि क्या कभी चुनावों में उनकी समस्याओं को केंद्रित किया गया है? हमारी कौन सोचता है…जी हां तकरीबन हर दूसरी महिला का यही जवाब था। शहर के साथ लगते गांवों की कई महिलाओं से जब बात की गई तो स्िथति यह थी जैसे किसी की दुखती रग पे हाथ रख दिया हो। हरखाेवाल की सुनीता रानी, कुलदीप कौर, मलकीत कौर घरेलू महिलाएं हैं। अनपढ़ और बेरोजगार। नीला कार्डधारक हैं। उनकी पहली आवाज यही है कि उन्हें पढ़ाया जाए और रोजगार मिले। सरकार ऐसी व्यवस्था करे ताकि वे घर बैठकर काम करके पैसा कमा सकें। बसी बाहियां की अजविंदर कौर, मनदीप कौर, सुनीता देवी, चंचल रानी की जिंदगी रोटी बनाते, बर्तन मांजते ही निकल गई। क्वालिटी लाइफ क्या होती है इनके शब्दकोश में नहीं। आदमवाल और अज्जोवाल की गुरविंदर, सुशीला, मनदीप और कैलाशो के पास न अपना घ्ार है न रोजगार। दिहाड़ी करके पेट पालती हैं। दो के पास न तो उनका पति है न पुत्र, न जमीन, केवल सरकारी पेंशन जो ढाई सौ से पांच सौ रुपये हुई, उसी से अपनी जरूरी खर्च करती हैं।
कक्कों गांव से थोड़ी पढ़ी-लिखी महिला से जब बात हुई तो उसने बताया कि अब भी ज्यादातर महिलाएं घ्ार तक ही सीमित हैं यहां तक िक गांवों में कई लोग औरतों को वोट तक डालने नहीं भेजते। इनके पति महिन्दर सिंह बताते हैं कि अगर कोई महिला सरपंच बनती है तो उसका ज्यादा काम उसका पति ही करता है, सलाह-मशविरा भी वही देता है।


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