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चुनावी अर्थशास्त्र

Posted On January - 10 - 2017

घोषणापत्र पर अमल आसान नहीं

Edit-1लोकलुभावनी चुनावी घोषणाओं की कतार में अब कांग्रेस भी शामिल हो गई है। दिल्ली में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मौजूदगी में घोषित घोषणापत्र में उल्लेखित वायदों के क्रियान्वयन में राज्य की बेदम आर्थिक सेहत का ध्यान नहीं रखा गया। पहले से ही 1.38 लाख करोड़ रुपये के कर्ज के बोझ तले दबे पंजाब पर इन घोषणाओं से प्रति वर्ष दस हजार करोड़ का बोझ पड़ेगा। राज्य में वोट के लिए मुफ्त बांटने के लोकलुभावन वायदों का जो सिलसिला शुरू हुआ है, उसने राज्य की अर्थव्यवस्था काे चौपट ही किया है। कभी चमकती अर्थव्यवस्था माने जाने वाले पंजाब की हालत आज खस्ता है। घोषणापत्र में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने जिन नौ सूत्रों पर ध्यान केंद्रित किया है, उन पर वर्ष 2014 में मोदी सरकार की घोषणाओं की छाप नजर आती है। मसलन हर घर को रोजगार, कमजोर वर्गों के लिये घर, कारोबार की आजादी, किसान को  आर्थिक, सामाजिक सुरक्षा व लड़कियों की शिक्षा आदि। इसी तरह पांच रुपये में गरीबों को खाना देने की योजना के क्रियान्वयन पर सवाल उठने स्वाभाविक हैं। जिस राज्य में वेतन-पेंशन पर बजट का 32 फीसदी खर्च हो जाता है, वहां लाखों बेरोजगार युवाओं को ढाई हजार का मासिक भत्ता देना कैसे संभव होगा?
घोषित योजनाएं सतही तौर पर तो अच्छी लगती हैं मगर सवाल यह है कि धन कहां से आयेगा? सरकार या तो नये टैक्स लगायेगी या फिर ऋण लेगी। दोनों ही कदम लोकतांत्रिक मान्यताओं और आर्थिक सेहत के हिसाब से उचित नहीं कहे जा सकते। सवाल यह भी है कि सरकारी खर्चे में कमी, मंत्रियों विधायकों के विदेशी दौरे, मंत्रियों व जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा का भारी-भरकम खर्च, हेलीकॉप्टर व हवाई यात्राओं में कटौती को क्या पार्टी नेता तैयार हैं? ऐसे में हर घर से सरकारी नौकरी के वायदे को अमलीजामा पहनाने से क्या अर्थव्यवस्था पर दबाव नहीं बढ़ेगा? राज्य की कृषि व उद्योग में निवेश की स्थिति अच्छी नहीं है। शिक्षा व चिकित्सा निजी क्षेत्र के निवेश के सहारे आगे बढ़ रही है। ऐसे में तमाम रियायतों की घोषणा क्या राज्य की आर्थिक सेहत के अनुकूल होगी? कमोबेश ऐसे तमाम प्रयास आर्थिक असमानता को बढ़ावा देने वाले ही हैं। पार्टी का चार सप्ताह में नशा माफिया के खात्मे का दावा गले नहीं उतरता। वह भी तब जब इस कारोबार के कुछ दागी पार्टी की ओर उन्मुख हुए हैं। सवाल उठाये जा रहे हैं कि पार्टी ने जो लोकलुभावन वायदे पंजाब में किये हैं, उनका क्रियान्वयन कांग्रेस शासित राज्यों में क्यों नहीं किया गया। बहरहाल घोषणापत्र में उल्लेखित वायदों को  अमलीजामा पहनाना दूर की कौड़ी नजर आता है।


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