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ज़रा संभल कर

Posted On January - 8 - 2017

Senior Man & Worried Sonफीचर टीम

किसी दिव्यांग व्यक्ति से बातचीत का सलीका अगर आपको नहीं आता, तब आप कितने भी सभ्य क्यों न हों, नहीं माने जाएंगे। दिव्यांगों से बर्ताव के दौरान आपका सलीका संवेदनपूर्ण मगर गरिमामय होना चाहिए ताकि सामने वाला खुद को कमतर महसूस न करे। जहां तक हो, उनसे मुस्कुरा कर बात करें। यह आपके चेहरे की मुस्कुराहट और सकारात्मक सोच ही है, जो उन्हें खुद को आपके जैसा सोचने को बाध्य कर डालेगी। उनका उत्साहपूर्ण व्यवहार इस बात की गवाही देगा कि आपकी संगत में वे कंफर्टेबल महसूस कर रहे हैं। इसके उलट व्यंग्यात्मक वाणी या असभ्य लहज़ा मुसीबतों का जनक है। दिव्यांगों से बातचीत में लहज़े का ध्यान रखें। कभी भी उन पर व्यंग्यात्मक फिकरे न कसें, बदजुबानी न करें।
दिव्यांगों को अगर मदद या सहयोग की जरूरत है, तभी अपना हाथ आगे बढ़ाएं। याद रखें कि दिव्यांग लोग बेहद खुद्दार होते हैं। वैसे भी वह अपनी अयोग्यता के साथ जीने के आदी हो चुके होते हैं, या फिर उनके पास इससे निपटने का उपाय होता है। ऐसी स्थिति में हो सकता है कि उन्हें आपकी मदद चाहिए ही न हो। इसलिए पूछ कर ही सहयोग का हाथ आगे बढ़ाएं। अगर कोई व्यक्ति दृष्टिहीन है तो कमरे में प्रवेश के साथ ही उसका अभिवादन जोर से कर अपनी उपस्थिति से उसे अवगत कराएं। कमरे से बाहर जाने का भी यही नियम है, दृष्टिहीन को बताकर जाना। दिव्यांगों के लिए बनी पार्किंग में कभी भी अपना वाहन पार्क न करें। तीसरे व्यक्ति से हाथ मिलाने के लिए कभी भी उनकी व्हीलचेयर पर से हाथ न आगे बढ़ाएं। कभी भी उनकी व्हीलचेयर पर न झुकें। ये छोटी-छोटी बातें ही आपको दिव्यांगों का हमदर्द, हमसफर और दोस्त बना देंगी।
MCDHOTO EC082अब बात परिवार में किसी सदस्य के दिव्यांग होने की। यह भी हो सकता है कि आपके घर में कोई दिव्यांग बच्चा या इंसान हो। आपका उसके प्रति व्यवहार कैसा है? परिवार के सदस्यों के व्यवहार का अध्ययन करते हुए एक सर्वे में इस संबंधी खुलासा किया गया कि कई परिवार अपने दिव्यांग बच्चे को अपने या उस के पूर्वजन्म के पापों का नतीजा मानते हैं। बचपन में टांग गंवा चुकी श्रद्धा को अपने परिवार से भरपूर स्नेह और सहयोग तो मिलता है, लेकिन कभी वह अपनी दादी के मुंह से यह सुन कर उदास हो जाती है कि उस की यह अपंगता उस के पूर्वजन्म के किए पापों का नतीजा है। जबकि यह वैज्ञानिक सत्य है कि विकलांगता बच्चे को किसी बीमारी या दुर्घटना की वजह से होती है, न कि पूर्वजन्म के पापों के कारण। विकलांगता पूर्वजन्म के पापों को फल है, ऐसी धारणा दिव्यांगों को न सिर्फ हतोत्साहित करती है, बल्कि कभी-कभी उन्हें आत्मघाती कदम उठाने के लिए विवश भी करती है।
कुदरत की मार झेल रहे दिव्यांगों को समाज जब कभी बेचारा कह कर दया दिखाता है तो स्वाभिमानी दिव्यांगों के लिए इस से बढ़ कर और कोई गाली नहीं होती। उन्हें समाज का सहयोग चाहिए न कि दया। अगर आप किसी दृष्टिहीन को रास्ता पार कराते हैं या किसी अपाहिज को सहारा दे कर उस को मंजिल तक पहुंचाते हैं तो यह न सोचें कि आप किसी पर दया या उपकार कर रहे हैं बल्कि यह सोचें कि आप इंसान हैं और एक इंसान के प्रति अपना मानवीय फर्ज अदा कर रहे हैं।


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