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जि़ंदगी रंगने वाला पेंटर

Posted On January - 1 - 2017

‘द लास्ट लीफ’/कहानी

ओ हेनरी 
1370201440-source copyअमेरिकी लेखक ओ हेनरी अपनी संवेदनशील कहानियों के लिए जाने जाते हैं। आज से करीब 150 साल पहले उन्होंने ऐसी कालजयी कहानियां लिखीं कि आज भी वह तरोताजा लगती हैं। इन्हीं कहानियों में से एक है ‘द लास्ट लीफ’ (आखिरी पत्ता)। कहानी के कई किरदारों में एक खास किरदार है बुजुर्ग चित्रकार। इसकी एंट्री काफी देर बाद होती है और जल्दी ही भूमिका खत्म भी हो जाती है। इस चित्रकार के कहानी में बहुत संवाद भी नहीं हैं। लेकिन इसकी भूमिका है बहुत सशक्त। असल में उसे वाशिंगटन में चित्रकारों की एक बस्ती सस्ती और अच्छी लगी। इसीलिए उसने यहां अपना डेरा जमा लिया। इसी बस्ती की एक गली के तीन मंजिले मकान की ऊपर वाली बरसाती में सू और जोम्सी का स्टूडियो है। ये दोनों रहने वालीं तो अलग-अलग जगहों की हैं, लेकिन एक समान रुचियों ने इन्हें करीब ला दिया। दोनों ने एक स्टूडियो खोल लिया। जैसे ही सर्दियों की शुरुआत होती है, बस्ती के कई लोगों को निमोनिया हो जाता है। कम उम्र की जौन्सी भी इसकी चपेट में आ जाती है। जौन्सी पलंग पर पड़ी रहती और खिड़की के बड़े कांच से सामने वाले मकान को ताकती रहती है। एक दिन डाक्टर आता है और उसकी सहेली से कहता है कि जौन्सी की इच्छाशक्ति ही उसे बचा पाएगी। डॉक्टर पूछता है कि क्या उसे कोई निराशा सता रही है।’ डॉक्टर यह जानना चाहता है कि कहीं कोई इश्क-मुश्क का चक्कर तो नहीं। सबकुछ जानने के बाद डॉक्टर जौन्सी की सहेली से कहता है कि चलो, तुम इसमें इच्छाशक्ति पैदा करो, मैं दवा शुरू करता हूं।’ डॉक्टर के जाने के बाद जौन्सी की सहेली देखती है कि वह खिड़की के बाहर टकटकी लगाए कुछ गिन रही है। बारह, 11 और फिर दस। असल में जौन्सी एक लगभग खत्म हो चुकी बेल की कुछ बचीं पत्तियों को गिन रही थी। सहेली के पूछने पर जौन्सी कहती है, ‘देखो पत्तियां लगातार कम होती जा रही हैं।’
पत्तियों के कम होने और बीमार जौन्सी के इनके गिनने और अपनी सहेली से बातचीत के इस दौर को लेखक ने बड़े दार्शनिक अंदाज में बयां किया है। जौन्सी को लगता है कि शायद इन पत्तियों के साथ-साथ उसके जीवन की सांसें चल रही हैं। पत्ते खत्म और उसकी सांसें खत्म। जौन्सी की सहेली उसे बहुत समझाती है, तभी एक और पत्ती गिर जाती है। इन्हीं के नीचे वाले मकान में बुजुर्ग पेंटर बैरम भी रहते हैं। लंबी दाढ़ी वाला असफल, जिंदगी से हारा चित्रकार। चालीस साल ब्रश चलाने के बाद भी वह कोई खास कामयाबी हासिल नहीं कर पाया था। ख्वाहिश थी हमेशा से एक मास्टरपीस पेंट बनाने की। परेशान जौन्सी की सहेली तभी उसके पास जाती है। उसने जौन्सी के मन में चल रहे वहम के बारे में उसे सब बता दिया। पूरी बात सुनकर वह बुजुर्ग पेंटर कहता है, ‘कैसे-कैसे बेवकूफ लोग हैं इस दुनिया में, जो इसलिए मरना चाहते हैं, क्योंकि किसी सूखी बेल की पत्तियां झड़ रही हैं?’ फिर वह पूछता है, ‘मैं क्या कर सकता हूं।’ बुजुर्ग पेंटर जौन्सी की सहेली के साथ उसके घर में जाते हैं। सभी बैठे होते हैं। तभी जौन्सी खिड़की का पर्दा उठाती है और जोर से चिल्लाने लगती है। ‘यह आखिरी पत्ता है। बस चंद दिन ही बचे हैं मेरे जीवन के।’ जौन्सी की सहेली रोने लगती है। वह कहती है कि उसके बिना मैं कैसे जीऊंगी। बुजुर्ग पेंटर वहां से चला जाता है। अगले दिन वह आता है और जौन्सी और उसकी सहेली से कहता है कि जौन्सी ठीक हो जाएगी। उस रात फिर भयानक तूफान आता है। बर्फीला तूफान। जौन्सी को तो लगता है कि अब वह आखिरी पत्ता भी गिर जाएगा और वह नहीं बचेगी। उसकी सहेली भी डरी-डरी रहती है। दो-तीन दिन मौसम बेहद खराब रहता है। इस बीच जौन्सी उस पत्ते को देख नहीं पाती। जब मौसम साफ होता है तो खिड़की खोलकर दोनों देखते हैं। वह पत्ता तरोताजा वहीं पर मुस्तैद था। जौन्सी को लगता है कि शायद अब उसे कुछ नहीं होगा। वह अपनी सहेली से कुछ खाने-पीने का सामान लाने को कहती है। जौन्सी की सहेली सबकुछ देकर उस पेंटर से मिलना चाहती है, जिसने तीन दिन पहले ही कह दिया था कि वह ठीक हो जाएगी। तभी पता चलता है कि बैरम का तो अस्पताल में निमोनिया से देहांत हो गया। वह एक ही दिन बीमार पड़ा। मकान के चौकीदार ने उस सुबह बैरम को उसकी कोठरी में तकलीफ से तड़पते देखा। बैरम के कपड़े और जूते एकदम गीले थे और बर्फ की तरह ठंडे थे। किसी को कुछ पता नहीं कि वह उस तूफानी रात में कहां गया था। फिर उन्हें एक लालटेन मिली, जो तब भी जल रही थी। वहां एक सीढ़ी भी मिली। उन्हें पेंट करने के कुछ ब्रश भी इधर-उधर बिखरे मिले और एक प्लेट भी मिली, जिसमें हरा और पीला रंग मिला था। अचानक जौन्सी की सहेली उस पत्ते के पास जाती है। सारा माजरा समझ में आ जाता है। असल में तूफानी रात में उस बुजुर्ग ने झड़ चुके आखिरी पत्ते की जगह अपनी कूची से वैसा ही पत्ता बना दिया था। वह चुपचाप सुबकती है, पर अपनी सहेली को कुछ नहीं बताती। सहेली धीरे-धीरे स्वस्थ हो जाती है।
इस कहानी का यह बुजुर्ग चित्रकार सचमुच अद्भुत किरदार है। ओ हेनरी ही ऐसे किरदारों को गढ़ सकते हैं। जो बोलता कम है, पर काम करता एकदम अलग है। यहां भी इस बुजुर्ग पेंटर के डॉयलॉग नहीं हैं, लेकिन जब उसकी कूची चली तो किसी की जान बचा गयी और वह खुद चल बसा। बेहद मार्मिक किरदार। बेहतरीन चित्रण। सोनाक्षी सिन्हा और रणवीर सिंह अिभनीत हिन्दी फिल्म ‘लुटेरे’ ओ हेनरी की इसी कहानी से प्रेरित है।
प्रस्तुति : केवल तिवारी


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