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तब बच्चों के लिए बुजुर्गों के सुनाए किस्से ही मनोरंजन का साधन थे

Posted On January - 5 - 2017
भगवान देवी

भगवान देवी

गर्मियों में हमारी छत पर करीब 10 खाट आसपास डलतीं, इन पर पूरे परिवार के लोग सोते। इस दौरान खाना खाकर घर के बड़े-बुजुर्ग और बच्चे पहले ही पहुंच जाते। चांदनी रात होती, हल्की-हल्की हवा बह रही होती और हम बच्चे दादी से लिपट कर कहानी सुनाने की जिद कर रहे होते।
दादी हमें परियों और समुंदर के बीच में रहने वाले राक्षस की कहानी सुनाती। यह किस्सा पिछले दिनों एक दोस्त ने मुझे सुनाया था। खैर, आज के समय में बच्चों की रुचि बदल गई है, अब उन्हें  परियों की कहानी नहीं बल्िक मोबाइल फोन पर गेम खेलने में ज्यादा मजा आता है। इंद्री के वार्ड-1 की निवासी 78 वर्षीय भगवान देवी इस बात से सहमत हैं। उनकी शिकायत है कि आज बच्चों के पास बड़े बुजुर्गों के पास बैठने का वक्त ही नहीं है।
बुजुर्गों की जगह अब टेलीविजन और मोबाइल फोन ने ले ली है। उनके मुताबिक बड़े बुजुर्गों के पास अब भी कहानियों की पोटली मिल जाएगी जिसमें तमाम छोटे-बड़े किस्से होते हैं, लेकिन उन किस्सों को समझने वाला नहीं मिलता। वे कहती हैं, पहले किसी-किसी घर में टीवी होता था, मनोरंजन के साधन नहीं थे, संयुक्त परिवार होते थे। बुजुर्गों के पास बच्चों को संभालने की जिम्मेदारी भी होती थी, इसलिए वे कहानियों की चाशनी में लपेट कर अनुभव की वह सीख देते थे जोकि बच्चों को उनकी जिंदगी में काम आए। उन बातों में संस्कारों की मिलावट होती, और वाकई में उन बातों का बच्चों पर काफी असर होता था। तभी कहा जाता था- मेरे दादा जी ने यह कहा है या फिर मेरी नानी कहती थी….।

गुंजन कैहरबा, इंद्री


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