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ताई की याद

Posted On January - 3 - 2017

बनफूल
आज ताई जी की बड़ी याद आ रही है।

चित्रांकन : संदीप जोशी

चित्रांकन : संदीप जोशी

उनके सामने बैठकर खाना भी मुहाल था। तरह-तरह का पकवान बनाती। लौकी, परवल, आलू, बैंगन आदि तो तलती ही थीं, कभी-कभार लौकी के छिलके तक की भाजी बनाकर परोस देती। इसके अलावा नाना प्रकार के बंगाली भोज तो होते ही। उनके हाथ की बनी सब्जियां और तरीदार मछली का तो जवाब ही नहीं। कम मसाले के साथ इतना स्वादिष्ट भोजन पकाती थी कि ऐसा लजीज़ शायद ही कोई बनाता हो। उस पर स्वयं अपने हाथों से परोसती।
स्कूल के दिनों में मैं बोर्डिंग में रहता था। रसोइये राजकुमार का बेस्वाद भोजन छह दिनों तक मजबूरी में खाना पड़ता। रविवार को स्वाद बदलने मैं ताई जी के पास चला जाता।
वह मेरी सगी ताई नहीं थी। पिताजी के एक मित्र के बड़े भाई की पत्नी थीं। पिताजी उन्हें भैया कहते और हम लोग ताया जी। इस नाते वह हमारी ताई थी। वह मुझसे बड़ा स्नेह करतीं। मैं रविवार की सुबह ही उनके पास चला जाता। पिताजी ने बोर्डिंग के अधीक्षक से पहले ही कह रखा था, इसलिए वे मना नहीं करते। मेरा सारा दिन उनके यहां ही बीतता। जाते ही पहले साबुन से रगड़-रगड़कर नहाना पड़ता और झगड़ू नाम का बड़ी मूंछों वाला नौकर मेरी सहायता करता। ताई जी उससे कहती-सारी देह में मैल जमा है, झगड़ू रगड़-रगड़कर सारा मैल साफ कर दे। शेर के चंगुल में मेमने के फंसने पर जो हाल होता है, वही मेरा होता। साबुन की झाग आंख, नाक, कान में घुस जाती। आंखें जलने लगतीं पर झगड़ू मुझे छोड़ने का नाम नहीं लेता।
नहाने के बाद बाल संवारे जाते। यह काम ताई जी के जिम्मे था। उनके पास एक विशेष नुकीली कंघी होती। बायें हाथ से ठोढ़ी पकड़कर दायें हाथ से जोर-जोर से बाल काढ़ने लगती। मेरे उलझे बालों को ऐसे खींचती मानो जान ही निकल जाये।
‘सिर का क्या हाल कर रखा है… आंय… एक बार भी इसे बनाते नहीं क्या?’
मैं बस यही कहता, ‘ओफ्फ, बहुत दु:ख रहा है ताई जी। छोड़ दो, आपके पांव पड़ता हूं।’
‘पांव पड़ने की जरूरत नहीं। ये देख, सिर में कितनी गंदगी भर रखी है। लो, इस तौलिये से मुंह पोंछो और खाने चलो।’
खाने की सूची पहले ही बता चुका हूं। मुझे क्या पसंद है यह ताई जी जानती थीं। मटर के दाल की पकौड़ी, सेवईं की खीर, मछली का माथा डालकर बनी मूंग की दाल, तली मछली में से कुछ न कुछ हर सप्ताह बनता। बोर्डिंग लौटते समय वह एक छोटी-सी शीशी में अचार दे देती थी। एक दिन वहां गया तो देखा वे लड्डू बना रही हैं। मुझसे बोली, ‘अपने साथ कुछ लड्डू ले जाना। वहां भूख लगे तो खा लिया करना।’ मैंने कहा, ‘मैं क्या वहां अकेले खा पाऊंगा? मेरे कमरे में अन्य चार लड़के रहते हैं।’ वे बोलीं, ‘तो क्या हुआ, सबके लिए ले जाना।’
सिर्फ खाना ही नहीं, उनकी नज़र सब चीजों पर रहती थी। मेरे कमीज में बटन टांक देती। कोई कपड़ा फट जाता तो उसे स्वयं सिल देतीं, जबकि वे निस्संतान नहीं थीं। उनके बच्चे थे और उनकी देवरानियों के भी। इसके अलावा उनके घर में मेहमानों का भी आना-जाना लगा रहता। वे सबकी सेवा करतीं। बच्चों का समूह उनके आगे-पीछे सदा घूमता रहता। सभी उनके प्यार के भूखे थे। वह भी बिना किसी भेदभाव के सब में अपना स्नेह लुटातीं। किसी की नाक पोंछ देतीं तो किसी के कपड़े बदल देतीं। किसी की देह पोंछ देती तो किसी की धूल झाड़ देतीं।
कभी-कभी ताई जी हमारे घर मनिहारी जाती थीं। न जाने कितना कुछ साथ ले जातीं। नई गागर, टोकरियां, छाज, टोकरा भर आम, अमचूर, आमपापड़, केले, नीबू, संतरे यानी कि जो मिलता सब ले जातीं। छाज और टोकरे तो अकसर ले जाती थीं क्योंकि उनके यहां ये चीजें मशहूर थीं। एक और चीज लाती थीं, बेर। कलमी बड़े-बड़े बेर और सीताफल। पहाड़ी सीताफल।
ताई जी के साथ एक और याद जुड़ी है। लोग पुराने कपड़े बेचकर बर्तन खरीदते हैं पर वह ऐसा नहीं करती। उन्हें जोड़कर वह कथरियां बना लेतीं और लोगों में बांटतीं। उनकी दी हुई एक कथरी मेरे पास बहुत दिनों तक रही थी।
जिस दिन मैंने मैट्रिक की परीक्षा पास की, उस दिन मुझे ताई जी ने विशेष दावत दी। मेरा फर्स्ट डिविज़न पाना जैसे उनकी मेहनत का फल हो। सुबह जब मैं गया तो सोचा था कि उनका हंसता हुआ चेहरा देखूंगा पर आश्चर्य, वह रो रही थी। मुझे देखकर उनका रोना अधिक बढ़ गया। मुझसे लिपटकर बहुत देर तक रोती रहीं। फिर भर्राई आवाज में कहा, ‘कल तू चला जाएगा, फिर तुझे देख नहीं पाऊंगी। तू मुझे याद रखेगा न?’
मैंने हामी भरी परंतु मैं उन्हें भूल गया।
आने वाले जीवन में मैंने कई उतार-चढ़ाव देखे। आई.एस.सी. करते समय बीमार पड़ गया। ठीक होने में छह माह लगे। फिर उसके बाद पिताजी नहीं रहे। घर का बड़ा बेटा होने के कारण सारी जिम्मेवारी मेरे सिर आन पड़ी। पढ़ाई रोककर ट्यूशन पढ़ाने लगा ताकि घर का खर्च चलता रहे। पिता जी ऊंचे पद पर थे, उनकी भविष्य-निधि के पैसे मिले तो अर्थाभाव कुछ कम हुआ। मैंने फिर से पढ़ाई शुरू की । बी.एससी. पास करते ही फिर एक दुविधा खड़ी हुई। इस बार मुझे प्रेम हुआ। ऐसा-वैसा नहीं, सचमुच का। अतः उस लड़की से शादी की। बेमेल, विजातीय विवाह होने के कारण मां ने बहू को नहीं स्वीकारा। यहां तक कि मेरी पढ़ाई का खर्च भी बंद कर दिया गया। तभी एक अप्रत्याशित घटना हुई। एक प्रसिद्ध पत्रिका में मेरी एक कहानी प्रकाशित हो गई जिसकी लोगों ने बड़ी प्रशंसा की। वायरन के साथ जैसा हुआ था, वही मेरे साथ हुआ अर्थात‍् ‘मैं एक दिन सुबह उठा और अपने आप काे प्रसिद्ध पाया।’
इसके बाद फिर कॉलेज नहीं गया। पत्रिकाओं के कार्यालयों में जाने लगा। पैसे आने लगे जिनमें से कुछ जमा भी कर लिए, परंतु मन अशांत था। मेरा पुत्र पोलियो से ग्रस्त हो गया। उसे लेकर बहुत दिनों तक बंबई में रहा ताकि वहां इलाज करा सकूं पर वह बच नहीं पाया। शोक में दरबदर भटकता रहा और मेरी पत्नी विक्षिप्त-सी हो गई। वह दोनों हाथ से अपना बाल नोचती और चिल्लाती रहती। सोते हुए बड़बड़ाती, ‘मां का शाप है।’ अंत में वह भी परलोक सिधार गई। इन सब अनुभवों के आधार पर मैंने एक लंबा उपन्यास लिख डाला। इससे मेरी ख्याति बढ़ी पर मन की शांति खो बैठा था।
फिर दूसरी शादी की। सांसारिक झमेले तो थे ही, साहित्यिक जीवन भी वैसा ही था। जो इस जीवन से जुड़े हैं, उन्हें भलीभांति पता है कि इस साहित्यिक जीवन में कितनी जटिलता है। लेखन के बाजार में भी तेजी-मंदी बनी रहती है। यहां भी तरह-तरह के षड‍्यंत्र रचे जाते हैं। प्रकाशकों के द्वार पर बार-बार दस्तक न दो तो पारिश्रमिक तक नहीं मिलता। जगह-जगह ‘चंडीमंडप’ यानी कि गोष्ठियां होती हैं जहां तथाकथित साहित्यकार बैठकर परनिंदा व परिचर्चाएं करते हैं। इस क्षेत्र में भी शत्रुओं की संख्या कम नहीं। जो अभी नमस्कार के साथ आपसे हंस-हंसकर बोल रहे हैं, वही थोड़ी देर पहले आपका श्राद्ध कर रहे थे, यह आप जान भी नहीं पाएंगे। पर धीरे-धीरे अनुभव आपको पारंगत कर देगा। साहित्यिक समाज में भी राजनीति है। यहां शतरंज की चाल चलते समय सजग न रहें तो मुसीबत आ सकती है।
इन्हीं सब दांव-पेच में ऐसा उलझा कि ताई जी की याद ही नहीं रही।
*****
लगभग पच्चीस वर्षों बाद नवीनगंज के एक साहित्यिक सम्मेलन में मुझे अध्यक्ष के रूप में बुलाया गया। वहीं मेरा विद्यार्थी-जीवन बीता था जहां ताई जी रहती थीं। पता चला कि ताया-ताई को मरे वर्षों गुजर गए हैं। उनके योग्य पुत्र विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिष्ठित थे। नवीनगंज शहर भी बदल चुका था। तारकोल की पक्की सड़कें, नये-नये विशाल मकान। वह पुराना नवीनगंज अब पहचाना नहीं जा सकता था। वहां जिनसे भी मिला, उनमें पुराना चेहरा एक भी न था। सोचा, सम्मेलन समाप्त होने पर किसी पुराने चेहरे की तलाश कर उससे बातें करूंगा, परंतु कार्यक्रम इतना लंबा चला कि रात के दस बज गए। मेरा भाषण भी अच्छा-खासा लंबा हो गया।
जो मुझे वहां ले गए थे, उन्होंने कहा कि मेरे खाने-पीने की व्यवस्था एक होटल में है। मेरी ट्रेन रात के बारह बजे की थी। अतः हम सब होटल की ओर चल दिए।
होटल भव्य सुसज्जित था। कॉलेज के प्रिंसिपल बोले, ‘यहां हर तरह का भोजन मिलता है। मेनू आएगा, आप जो खाना चाहें खा सकते हैं। बिल हम अदा करेंगे।’
मेनू सामने आया। पांच रुपए प्लेट पुलाव, दो रुपए का चावल, एक रोटी चार आने की, चिकन कटलेट डेढ़ रुपए का, मटन कटलेट बारह आने का, एक प्लेट मांस दो रुपए, चिकन एक प्लेट चार रुपया और शाकाहारी सब्जी प्रति प्लेट आठ आने की। पुडिंग एक प्लेट दो रुपया। इस तरह कई तरह के खानों की सूची थी उसमें। मैंने कुछ चीजे मंगवा लीं।
खाते-खाते एक लड़के से पूछा, ‘इसी मोहल्ले में मेरी ताई जी रहती थीं। बता सकते हो उनका घर कहां है?’
वह लड़का बोला, ‘आपके ताया जी का क्या नाम है?’
‘योगेन मुखर्जी…।’
‘अरे यही तो उनका मकान है। उनके बेटों ने बेच दिया था। उसी को तोड़कर पंजाबियों ने यह होटल बनाया है।’
सुनकर मैं स्तब्ध रह गया। ताई जी का घर होटल बन गया है। अब यहां हर चीज के लिए पैसा चुकाना पड़ता है।
‘आप खा नहीं रहे?’
‘नहीं.. अब और नहीं खाऊंगा। मेरा पेट भर गया है।’

अनुवाद : रतन चंद ‘रत्नेश’


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