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तार-तार झंकार

Posted On January - 8 - 2017

श्वेता रंजन

12912cd _thumbnail_debu chaudhuri 1संगीत की अलौकिक ताकत को पारिभाषित कर पाना हर संगीतकार के बस की बात नहीं, लेकिन हमारे देश में कुछ संगीतकार ऐसे भी हैं जो श्रोताओं को इसका अहसास करा पाने की ताकत रखते हैं। ऐसा ही एक नाम है पद्मभूषण, पद्मश्री सितार वादक पंडित देवव्रत चौधरी का, जिन्होंने संगीत के दैवीय सुखों को श्रोताओं तक पहुंचाने का काम किया। दुनिया उन्हें देबू चौधरी के नाम से जानती है।
संगीत से पहला परिचय
देबू चौधरी के परिवार का संगीत और लय से कोई वास्ता नहीं था, लेकिन देबू पर तो प्रभु कृपा थी। तभी तो उन्हें रागों का आभास और समझ 5 वर्ष की नन्ही उम्र में ही हो गई थी। मायमेंसिंग (बंगलादेश) में 1935 में जन्मे देबू का संगीत से पहला परिचय तब हुआ, जब वह बंगलादेश में रहने वाले एक पड़ोसी के घर आया-जाया करते थे। देबू उस घटना के बारे में बताते हैं : हम उन्हें अंकल कहा करते थे। मैं बहुत ही छोटा था। वो अक्सर टैगोर के गाने सुना करते थे। मुझे उनके गाने सुन कर बहुत ही अच्छा लगता था।’ यह था देबू का संगीत से पहला परिचय।
 नन्ही उम्र और सितार
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रंगपुर और फिर कोलकाता आकर बसने वाले देबू चौधरी को संगीत ने जिंदगी में एक दिशा दिखायी। वह बताते हैं: जब मेरे बड़े भाई की शादी हुई और घर में बहू आयी तो मेरी मां ने उन्हें संगीत सीखने के लिए ‘संगीत सम्मेलन’ भेजा। उनके साथ मैं भी जाया करता था। मैं अलग-अलग कक्षाओं में चला जाता था। कहीं रवींद्र संगीत तो कहीं कोई वाद्य यंत्र की क्लास चल रही होती थी। एक दिन घूमते-घूमते मैं सितार की क्लास में चला गया, वहां सिर्फ लड़कियां बैठी थीं। मुझे देख कर वो हंसने लगीं, लेकिन टीचर ने मुझसे पूछा कि क्या सितार बजाओगे? मैंने कहा : हां बजाऊंगा।’
 गुरुओं के चहेते देबू
संगीत के प्रति गंभीर रुचि के कारण ही उस छह साल के बच्चे ने सितार जैसे बेहद ही मुश्किल यंत्र का चयन किया। सितार के तारों की समझ और बारीकियों को बेहद सरलता और सहजता से समझ पाने की क्षमता ने ही देबू को शिक्षकों का सबसे प्रिय बना दिया। लेकिन घर में देबू चौधरी के इस फैसले का कड़ा विरोध भी हुआ। नन्हे से उस बालक को सितार और संगीत से दूर रहने की सलाह दी गई। मगर देबू अपने फैसले पर अडिग थे। जब उन्होंने अपनी माता से सितार खरीदने की मांग की तो उन्हें मना कर दिया। पिता के भी अनसुना कर देने पर बड़े भाई ने उन दिनों 25 रूपये में एक सितार खरीद कर देबू को भेंट की। देबू बताते हैं : मां ने सोचा कि यह बचपने की ज़िद है जो समय के साथ धूमिल पड़ जाएगी, लेकिन किसी को यह अहसास नहीं था कि सितार ही मेरी ज़िंदगी, मेरी पहचान बन जाएगी।’
संगीत जगत को देन
12912cd _thumbnail_debu chaudhuriअपने दम पर संगीत के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने वाले देबू चौधरी भारत के सबसे खास सितार वादक, भारतीय शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त संगीतकार और दिल्ली विश्वविद्यालय में संगीत के शिक्षक रह चुके हैं। ‘सेनिया संगीत घराना’ के श्री पंचू गोपाल दत्ता और संगीत आचार्य उस्ताद मुश्ताक अली खान से संगीत की शिक्षा लेने वाले देबू चौधरी की संगीत जगत को अनेक देनें हैं। वह अब तक संगीत से संबंधित 6 किताबें लिख चुके हैं। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि कि उन्होंने 8 नए संगीत रागों को जन्म दिया। ये राग हैं- बिस्वेस्वरी, पलास-सारंग, अनुरंजनी, आशिकी ललित, स्वनान्देस्वरी, कल्याणी बिलावल, शिवमंजरी और पत्नी मंजू की स्मृति में बनाया गया राग ‘प्रभाती मंजरी’। ‘सितार एंड इट्स टेक्निक्स’, ‘म्यूज़िक ऑफ इंडिया’ और ‘ऑन इंडियन म्यूज़िक’ जैसी मशहूर किताबें लिखने वाले देबू चौधरी कहते हैं : अब मैंने अपनी सातवीं किताब पर काम करना शुरू किया है। मेरी सारी किताबें संगीत पर आधारित हैं। मैंने इसे ही अपने जीवन का मूल आधार मान लिया है।’
 नया प्रोजेक्ट
देबू चौधरी ने 1971 से 1982 तक दिल्ली विश्वविद्यालय में संगीत विभाग के रीडर के रूप में अध्यापन कार्य किया। 1985 से 1988 तक इसी विभाग में डीन और विभागाध्यक्ष रहने वाले देबू चौधरी ने एक खास प्रोजेक्ट पर भी काम किया है, जो दुर्लभ संगीत वाद्य यंत्रों द्वारा प्रस्तुत धुनों को परंपरागत ‘ध्रुपद’ और ‘ख्याल’ राग के माध्यम से नए राग प्रस्तुत करने का है। उनके अनुसार : इस प्रोजेक्ट के माध्यम से मेरा प्रयास नई पीढ़ी को संगीत के क्षेत्र में दुर्लभ अनुभव प्रदान करने का है।’
 संगीत में आए उतार-चढ़ाव
पंडित देबू चौधरी ने भारतीय शास्त्रीय संगीत के तमाम उतार-चढ़ाव को महसूस किया है। बरसों इसे सहेजने की चेष्टा में लगे देबू चौधरी बताते हैं कि कैसे समय के साथ संगीत के क्षेत्र में बदलाव आये हैं। वह कहते हैं : प्रचार-प्रसार के क्षेत्र में आये बदलाव ने संगीत की दुनिया पर भी गहरा असर डाला है, जो सकारात्मक भी है और नकारात्मक भी। पहले के श्रोता या दर्शक संगीत की सराहना और आदर किया करते थे। उनमें सुनने की चाहत थी, लेकिन आज के गायक आसानी से नाम कमा लेते हैं, चाहे उनके संगीत में दम हो या ना हो। आजादी के बाद कोलकाता में मैंने देखा कि लोग रात-रात भर पंडाल लगा कर कॉन्सर्ट्स किया करते थे। हाउसफुल होता था, जिन्हें टिकट नहीं मिल पाती थी, वे रास्ते में बैठ कर प्रोग्राम सुनते थे, लेकिन आज की पीढ़ी ऐसे कॉन्सर्ट्स पर पैसे खर्च नहीं करती। लोग सिनेमा देख आते हैं, लेकिन किसी शास्त्रीय संगीत को सुनने के लिए उन्हें मुफ्त में टिकट मिले तो भी वे नहीं आते हैं।’

पिता पर पूत
12 वर्ष की उम्र में पहला सार्वजनिक संगीत कार्यक्रम देने वाले देबू चौधरी का ऑल इंडिया रेडियो पर प्रथम प्रसारण 18 वर्ष की उम्र में हुआ। पंडित देबू चौधरी यह यकीन करते हैं कि संगीत तो किसी भी इंसान के भीतर छुपा होता है। जो उसे जागृत कर लेता है, वह संगीत को पा जाता है। वह बताते हैं : मेरे बेटे प्रतीक ने बचपन में संगीत में रुचि दिखाई,  लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब उसका मन ऊब गया और उसने सितार का साथ छोड़ दिया। हमने उस पर कभी भी दबाव नहीं डाला। जब वह आठवीं में था तो उसने सितार छोड़ दिया, लेकिन कॉलेज पहुंच कर उसने महसूस किया कि सितार के बगैर जीवन अधूरा है। उसके उपरांत उसने बहुत अभ्यास किया। परिणामस्वरूप आज वह एक जाना-माना सितार वादक है।’ पंडित देबू चौधरी आजकल अपने छह साल के पोते को सितार की ट्रेनिंग दे रहे हैं। वह कहते हैं : मेरा पोता भी सितार में बेहद रुचि रखता है। उसका खिंचाव इस यंत्र के प्रति बहुत है।’


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