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धुएं के बाद धुंध

Posted On January - 8 - 2017

राजेंद्र कुमार राय

DSCN3781 copyआजकल पूरा उत्तर भारत कोहरे यानी फॉग से जूझ रहा है। ट्रेन और फ्लाइट से लेकर सड़क मार्ग तक यात्रियों को इसका सामना करना पड़ रहा है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार उत्तर भारत में आजकल ‘वेस्टर्न डिस्टरबेंस’ ने पुनः दस्तक दी है। पहाड़ी इलाकों में मौसम के इस बदलते सिस्टम के कारण बर्फबारी हो रही है, जिससे मैदानों में भी मौसम बदल सा गया है। अनुमान है कि अगले दिनों के दौरान भी उत्तर भारत के राज्यों खासकर दिल्ली में घना कोहरा बना रह सकता है।  देश भर की भांति कुछ साल पहले तक दिल्ली के लोगों ने भी केवल ‘फॉग’ शब्द ही सुना था, जिसका मतलब होता है कोहरा या धुंध, क्योंकि दिल्ली में सर्दियों की दस्तक के साथ ही फॉग भी आ धमकता था। मगर अब पिछले कुछ साल से दिल्ली के लोगों को हर साल फॉग के साथ-साथ एक और नया नाम ‘स्मॉग’ भी सुनने को मिल रहा है। ‘स्मॉग’ यानी प्रदूषित कोहरा या ऐसा कोहरा, जो सीधे आपकी सेहत पर अटैक करता है। आप अपनी आंखों में तेज जलन महसूस करते हैं। स्किन पर रूखापन आ जाता है। सांस लेने में दिक्कत और ऐसा लगने लगता है जैसे आपको किसी गैस चैंबर में बंद कर दिया गया हो। दिल्ली-एनसीआर के आसमान में छायी धुंध और  स्मॉग की घनी चादर न केवल विजिबलिटी पर असर डाल रही है, बल्कि इसकी वजह से लोगों की सेहत पर भी बहुत बुरा असर पड़ रहा है। पिछले एक हफ्ते से अस्पतालों में अचानक बढ़ी मरीजों की तादाद हालात की गंभीरता बयान कर रही । इनमें से ज्यादातर मरीज अधिक उम्र के हैं और सांस की समस्या से ग्रसित हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार, हवा की गुणवत्ता ‘बेहद खराब’ की स्थिति से भी 12 गुना और ज्यादा खराब स्थिति में पहुंच चुकी है। पिछले हफ्ते ओपीडी में मरीजों की तादाद में करीब 20 से 30 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी हुई। ये मरीज कंजेशन, साइनस, अस्थमा, सांस लेने में तकलीफ जैसी बीमारियों से ग्रसित थे। प्रदूषित हवा सांस के जरिये फेफड़ों में जाकर बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बुरी तरह नुकसान पहुंचा रही है। चूंकि पीएम 2.5 के कण बेहद बारीक होते हैं, इस वजह से ये बच्चों के विकसित होते फेफड़ों में जमा हो सकते हैं और अस्थमा या सांस की अन्य बीमारियों को गंभीर बना सकते हैं। अस्पताल में आ रहे करीब 60 प्रतिशत मरीज या तो 5 साल से कम उम्र के हैं या फिर 50 साल से अधिक की उम्र के। नए मरीजों की तादाद बढ़ने के साथ ही अस्थमा, एलर्जी और इसी तरह की अन्य समस्याओं से ग्रसित लोगों की तबीयत भी दिनोंदिन और खराब होती जा रही है।
14-12-15 Agartala- Foggy winter morning (1) copyबढ़ता प्रदूषण
इस की सबसे बड़ी वजह पर्यावरण में अचानक बढ़ने वाला प्रदूषण है। दिल्ली में पिछले कुछ साल से प्रदूषण का स्तर कई गुना बढ़ा है। दिल्ली-एनसीआर में लगातार कंस्ट्रक्शन एक्टिविटीज, बढ़ते वाहन और सफाई व्यवस्था दुरुस्त नहीं होने की वजह से पर्यावरण में पहले से ही धूल-मिट्टी जमा होती रहती है। पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने के चलते हवा के रास्ते यह प्रदूषण भी देश की राजधानी में आ पहुंचता है। सर्दियों की वजह से एक तो हवा की गति धीमी हो जाती है और उसमें नमी आ जाती है, दूसरा पर्यावरण में पसरा धुआं पहले से यहां मौजूद धूल, मिट्टी और खतरनाक गैस कणों के साथ मिलकर पर्यावरण में ही ठहर जाता है और इसका कॉकटेल एक घने स्मॉग का रूप धारण कर लेता है। इसकी वजह से गंभीर हालात पैदा हो जाते हैं।
सेहत पर असर
प्रदूषण के कारण स्मॉग के चलते लोगों का सांस लेना तक दूभर हो जाता है। इसमें कोहरे के साथ-साथ पीएम 1, पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे सेहत को नुकसान पहुंचाने वाले बेहद सूक्षम और खतरनाक कण भी मिले होते हैं, जो सीधे आपकी हेल्थ और स्किन पर अटैक करते हैं। साथ ही सांसों के जरिये फेफड़ों में जाकर और ब्लड में घुल मिलकर ये खतरनाक कण आपके शरीर को अंदर से भी नुकसान पहुंचाते हैं। ये सबसे ज्यादा आपके हृदय, मस्तिष्क और श्वसन तंत्र को प्रभावित करते हैं, जिसके चलते कई तरह की बीमारियां बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है। खासतौर से सांस और फेफड़ों की बीमारी से ग्रसित लोगों के लिए तो स्मॉग किसी खतरे की घंटी से कम नहीं। अस्थमा के मरीजों के लिए भी यह यमराज की तरह है। साथ ही बुजुर्गों, बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए भी यह बेहद खतरनाक है।
03089_353404 copyक्या है बचाव
सबसे बड़ा उपाय तो यही है कि जब स्मॉग हो रहा हो, तो ज्यादा से ज्यादा घर पर ही रहने की कोशिश करें। अपने घर के खिड़की दरवाजे बंद रखें। मॉर्निंग और इविनंग वॉक और जॉगिंग से बचें और सुबह के समय प्राणायाम या श्वास संबंधी अन्य एक्सरसाइज और यौगिक क्रियाएं भी ना करें। अपनी स्किन को ज्यादा से ज्यादा ढक कर रखें और आंखों को जलन से बचाने के लिए किसी चश्मे का इस्तेमाल करें। खूब पानी पीते रहें, ताकि घबराहट न महसूस हो।
दिल्ली ने रिकार्ड तोड़ा
दिल्ली में फॉग और स्मॉग अटैक का यह कोई पहला उदाहरण नहीं है। हर साल ही सर्दी की आहट से पहले माहौल में प्रदूषण के चलते जहर घुलने लग पड़ता है।  दीवाली और न्यू ईयर पर पटाखों, बेतहाशा वाहनों का प्रदूषण धुंध में प्रदूषित धुएं का समावेश कर डालता है।  इस बार की धुंध और धुएं ने दिल्ली में पुराने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। इस बार दिल्ली के कई इलाकों जैसे आनंद विहार, पंजाबी बाग, आरकेपुरम में पीएम 10 और पीएम 2.5 का स्तर 999 की अंतिम लिमिट के भी पार पहुंच गया। ऐसी भयावह स्थिति दिल्ली ने 17 साल पहले देखी थी, जब दिल्ली को भयंकर स्मॉग का सामना करना पड़ा था, मगर उस वक्त लोगों को इसके बारे में ज्यादा जानकारी ही नहीं थी। इस बार जब स्मॉग हुआ, तो हर तरफ पैनिक फैल गया और लोग घरों में बंद होने को मजबूर हो गए। स्कूलों की छुट्टियां करनी पड़ी और कई लोगों को तो साफ हवा में सांस लेने के लिए दिल्ली से बाहर जाना पड़ा।
बीजिंग में भी प्रदूषण
धुंध और स्मॉग का प्रकोप भारत के दिल्ली जैसे शहरों में ही नहीं है। दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाले देश चीन की राजधानी बीजिंग का भी यही हाल है। वहां भी हर साल प्रदूषण का स्तर इतना बढ़ जाता है कि प्रशासन को ऑरेंज और रेड अलर्ट घोषित करना पड़ता है और स्कूलों की छुट्टियां करनी पड़ती हैं। लंदन में वर्ष 1952 में धुंध के साथ-साथ स्मॉग ने कहर ढाया था। प्रदूषित धुंध के चलते उस समय हजारों मौतों से पूरा लंदन हिल गया था। दिल्ली और एनसीआर की हवा इतनी जहरीली हो चुकी है कि पर्यावरण विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर हालात जल्द नहीं सुधरे तो लंदन जैसे हालात बन सकते हैं।
कृत्रिम बारिश का सहारा
टेक्नोलॉजी ने बहुत तरक्की कर ली है। इतनी कि अब हम कुदरत को भी बदल सकते हैं। जी हां, इसी का उदाहरण है क्लाउड सीडिंग यानि आर्टिफिशियल बारिश। आइए जानें कि यह क्या होती है? सिल्वर आयोडाइड को विमान के जरिए आकाश में बादलों के बहाव के साथ फैलाया जाता है। सिल्वर आयोडाइड क्रिस्टल नैचुरल बर्फ की तरह ही होती है। प्लेन में सिल्वर आयोडाइड के दो जनरेटर होते हैं। इनमें सिल्वर आयोडाइड का सोल्यूशन हाई प्रेशर के साथ भरा जाता है। जहां क्लाउड सीडिंग करवानी है वहां प्लेन को अपोजिट डायरेक्शन में उड़ाया जाता है। जैसे ही परफेक्ट क्लाउडिंग यानि नमी वाले बादल दिखते हैं, जनरेटर ऑन कर दिया जाता है। प्लेन किस दिशा में उड़ेगा, इसका निश्चय क्लाउड सीडिंग ऑफिसर मौसम के आंकड़ों को ध्यान में रखकर करता है। ये केमिकल्स आकाश में बादलों से टकराकर केमिकल एक्शन के जरिए बारिश करते हैं। क्लाउड सीडिंग यानी कृत्रिम बारिश तभी सफल होती है, जब बादलों में वाष्पीकरण की क्षमता हो। 2003 में महाराष्ट्र में कृत्रिम बारिश कराई गई थी। तब सरकार ने 5 करोड़ 40 लाख रूपये खर्च करके कृत्रिम बारिश करवायी थी। यह प्रयोग सफल रहा था।

58404301ba6eb6b1018b6f86-2400घर के अंदर प्रदूषण
दरअसल अपने यहां अभी तक चर्चा बाहरी प्रदूषण पर होती रही है, लेकिन घर के अंदर का प्रदूषण भी जानलेवा है। आज जरूरत है घरेलू प्रदूषण पर रोक लगाने की। वर्तमान में स्थिति यह है कि हम घर के अंदर मौजूद प्रदूषक तत्वों की पहचान नहीं कर पा रहे हैं। हमारी बदलती जीवन शैली में भौतिक जीवन स्तर को सुधारने में जो प्रयास हुए, उसमें ज्यादातर उपकरण प्रदूषण उत्पन्न करने वाले रहे। इनमें रेफ्रिजरेटर, एयरकंडिश्नर, कीटनाशक स्प्रे, मास्किटो रिपेलेन्ट, दुर्गंधनाशक, हेयर स्प्रे, पेंट, पाॅलिश, प्लास्टिक एवं सनमायका के फर्नीचर इत्यादि हैं। घरों में प्रदूषण का दूसरा सबसे ज्यादा घातक कारण है धूम्रपान। तंबाकू में निकोटिन सहित लगभग 150 विषैले तत्व होते हैं। इसमें कार्बन-मोनो आक्साइड प्रमुख है। इसकी सूक्ष्म मात्रा भी आंखों में जलन व ऊपरी सांस नलिका को खराब कर देती है। वहीं बढ़ी हुई मात्रा फेफड़ों के लिए घातक है।

असर इनफर्टिलिटी पर
दिल्ली की खराब हवा दिल्ली निवासियों के लिए गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि यह उनकी यौन रुचि और क्रियाओं को भी प्रभावित कर रही है। प्रजनन विशेषज्ञों ने संबंधित बात कही। विशेषज्ञों के अनुसार, वायु प्रदूषण के प्रतिकूल प्रभावों से यौन क्रियाओं में 30 प्रतिशत कमी आ सकती है। नए शोध से पता चला है कि दुनिया भर के पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या लगातार कम होती जा रही है। शोधकर्ता इसका कारण प्रदूषण की बढ़ती समस्या और कीटनाशकों का बढ़ता इस्तेमाल बता रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अभी सावधानी नहीं बरती गई तो आने वाले वर्षों में स्थिति बहुत खराब हो जाएगी। दिल्ली की संबंधित विशेषज्ञ डाक्टर सागरिका अग्रवाल ने कहा : वायु में बहुत सारे भारी तत्व हैं, जो सीधे तौर पर शरीर के हार्मोन को प्रभावित करते हैं। भारत में पुरुषों की 15 प्रतिशत आबादी बांझ है। यह दर महिलाओं की तुलना में ज्यादा है। पर्टिकुलेट मैटर अपने साथ पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन लिए होते हैं। इसमें सीसा, कैडमियम और पारा होते हैं, जो हार्मोन के संतुलन को प्रभावित करते हैं। ये शुक्राणुओं के लिए नुकसानदायक होते हैं।’ अग्रवाल के अनुसार, टेस्टोस्टोरोन या एस्ट्रोजन स्तर में कमी संसर्ग की इच्छा में कमी ला सकती है। इस तरह यह यौन जीवन में बाधा पैदा कर सकती है। लेकिन प्रजनन में इस बदलाव से बचने के लिए बाहर जाते समय बहुस्तरीय फिल्टर मास्क का प्रयोग करें। प्रदूषण में सांस लेने से रक्त में ज्यादा मात्रा में मुक्त कण एकत्रित हो जाते हैं। यह एक प्रजनन सक्षम पुरुष में भी शुक्राणुओं की गुणवत्ता घटा सकते हैं।


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