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नये ज्ञान की राह न रोके भाषा

Posted On January - 10 - 2017

क्षमा शर्मा
-endangered-languagesअकसर हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं को यह शिकायत रहती है कि उनके यहां भी बहुत से महत्वपूर्ण शोध होते हैं, महत्वपूर्ण रचनाएं लिखी जाती हैं, मगर अंग्रेजी के मुकाबले उन्हें कभी कोई तरजीह नहीं दी जाती।
हाल ही में हुई एक रिसर्च ने इन शिकायतों को सही ठहराया है। कैम्िब्रज में हुई इस रिसर्च के अनुसार, दुनिया में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक शोध अंग्रेजी के अलावा विश्व की अन्य महत्वपूर्ण भाषाओं में होते हैं, मगर वे अनदेखे ही रह जाते हैं। एक तरह से दुनिया इनके लाभ से वंचित रह जाती है। न ही इन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छपने वाली महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में जगह मिलती है। इस रिसर्च में स्वीकार किया गया है कि अंग्रेजी से इतर भाषाओं के प्रति बहुत भेदभाव है। रिसर्च में मांग की गई है कि दुनिया भर की भाषाओं में होने वाली वैज्ञानिक खोजों को प्रकाशित किया जाना चाहिए। उनके अनुवाद होने चाहिए और अनुवाद के लिए अलग से फंड दिए जाने चाहिए।
यही नहीं, अंग्रेजी में जो महत्वपूर्ण शोध छपें, उनका सारांश अन्य भाषाओं में भी छपना चाहिए। खास तौर से बायोडायवर्सिटी और पर्यावरण के क्षेत्र जहां स्थानीय स्तर पर बहुत काम होता है, मगर अकसर प्रकाश में नहीं आ पाता। कैम्िब्रज विश्वविद्यालय की जीव विज्ञान विभाग की डा.तात्सुया अमानो का कहना है कि हम अंग्रेजी के महत्व को जानते हैं, मगर इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि अन्य भाषाओं में कोई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक शोध नहीं होते। यह नहीं माना जाना चाहिए कि विज्ञान सम्बंधी महत्वपूर्ण खोजें सिर्फ अंग्रेजी जगत में ही होती हैं। भाषाओं की बाधा को खत्म किया जाना चाहिए। जिन देशों में अंग्रेजी मातृभाषा नहीं है, वहां के लोगों को अंग्रेजी में हुई खोजों की जानकारी हो और उन भाषाओं में जो महत्वपूर्ण शोध हो रहे हैं, उनकी जानकारी दुनिया को मिले।
कैम्िब्रज की रिसर्च में गूगल पर उपलब्ध 2014 के बायोडायवर्सिटी से सम्बंधित रिसर्च पेपर्स का अध्ययन किया गया। इसमें सोलह भाषाओं को चुना गया। इन पचहत्तर हजार डाक्यूमेंटस में मात्र 35.6 प्रतिशत ही अंग्रेजी में थे। बाकी भाषाओं में स्पेनिश में, उसके बाद पुर्तगाली और फ्रेंच भाषाओं में थे। इनके अलावा चीनी, जर्मन, जापानी, स्वीडिश, कोरियन, इटेलियन आदि भाषाओं में बायोडायवर्सिटी से सम्बंधित हजारों पेपर्स थे। यह हालत तो सिर्फ सोलह भाषाओं की और मात्र एक-दो विषयों की थी। दुनिया में बोली-बरती जाती असंख्य भाषाओं में विज्ञान की विविध धाराओं में कितना काम हो रहा होगा, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। इसके अलावा विज्ञान की दुनिया में पश्चिम की मठाधीशी और एकाधिकार इतना ज्यादा है कि कई बार स्थानीय वैज्ञानिकों को अंग्रेजी भाषा की जानकारी होने के बाद भी अपनी ही सरकारों और लोगों के दुराग्रहों का शिकार होना पड़ता है।
कैम्बि्रज की इस रिसर्च को जब पढ़ा तो अपने यहां की एक घटना याद आई। बंगाल में एक डाक्टर थे-सुभाष मुखोपाध्याय। सत्तर के दशक में डाक्टर सुभाष मुखोपाध्याय ने शोध के बाद कहा था कि टेस्ट ट्यूब बेबी का सपना सच हो सकता है। भारत में जन्मी पहली टेस्ट ट्यूब बेबी दुर्गा उन्हीं की शोध की पहचान बनी। यह बच्ची अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जन्मे पहले टेस्ट ट्यूब बेबी से मात्र सढ़सठ दिन बाद ही जन्मी थी। लेकिन अपनी खोज के कारण डा. मुखोपाध्याय को कितना अपमान सहना पड़ा, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। न केवल समाज के लोग बल्कि सरकारें भी उनके पीछे पड़ गईं और उन्हें झूठा साबित करने पर तुल गईं। उन्हें राज्य सरकार और केंद्र सरकार के दंड को भी झेलना पड़ा। उनके खिलाफ जांच के लिए एक कमेटी बना दी गई। कमेटी ने निष्कर्ष निकाला कि डा. सुभाष मुखोपाध्याय का सारा काम बोगस है। उनके कहीं आने-जाने, अपनी बात अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कहने पर रोक लगा दी गई। एक वक्त ऐसा आया कि उन्होंने आत्महत्या कर ली। उनके जीवन पर एक बेमिसाल फिल्म भी बनी है-एक डाक्टर की मौत।
ऐसे वैज्ञानिक दुनियाभर में मौजूद होंगे, जिनकी रिसर्च की स्वीकार्यता के लिए उनके ही देश की सरकारें पश्चिम का मुंह ताकती होंगी। भाषा आती भी हो तो उन्हें सरकारों से जूझने की चुनौतियों का सामना करना पड़ता होगा। हमारे यहां भी अंग्रेजी का दबदबा और विदेश, खास तौर से पश्चिमी देशों से आए प्रमाणपत्रों की इतनी अधिक मान्यता है कि जब तक विदेशी हमें न स्वीकारें, हम अपनों को ही दुत्कारने में समय नहीं लगाते। इसीलिए अगर अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुई खोजों को हर सूरत में दुनिया के सामने लाने की बात की जा रही है, तो यह अच्छा है। भाषा और सरकारें ऐसी दीवारें न खड़ी करें कि किसी के जीवन भर की मेहनत खत्म हो जाए।


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