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पढ़ने की ललक बढ़ी

Posted On January - 10 - 2017

11001cd _photoसमय और सृजन

वंदना सिंह
महेश कटारे, कहानीकार, उपन्यासकार और नाटककार। बेहद विनम्र और अब भी ठेठ गंवई अंदाज में हिंदी साहित्य जगत में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने वाले महेश कटारे का महाराजा भर्तृहरि के जीवन पर दो खंडों में लिखा गया उपन्यास ‘कामिनी काय कांतरे’ खासा चर्चित रहा है और पाठकों के साथ-साथ आलोचकों ने उस उपन्यास को लेकर महेश कटारे के काम की सराहना की है। उनके कई कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें ‘समर शेष है’, ‘इतिकथा-अतकथा’, ‘मुर्दा स्थिगित’, ‘पहरुआ’ प्रमुख हैं। इनके दो नाटक ‘महासमर का साक्षी’ और ‘अंधेरे युगांत के’ भी खासे चर्चित रहे हैं। इन दिनों वे अपने उपन्यास ‘बीहड़ के रास्ते’ पर काम कर रहे हैं। उनको कई सम्मानों और पुरस्कारों से नवाजा चुका है। उनको सारिका सर्वभाषा कथा पुरस्कार, वागीश्वरी पुरस्कार, गजानन माधव मुक्तिबोध पुरस्कार, शमसेर सम्मान, सुभद्रा कुमारी चौहान पुरस्कार, कथाक्रम सम्मान आदि मिल चुके हैं।
महेश पुस्तक मेलों को बेहद उपयोगी मानते हैं। उन्होंने बताया कि दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में काफी लोग आ रहे हैं और जमकर किताबें भी खरीद रहे हैं। नए बच्चों की भागीदारी इन पुस्तक मेलों में बढ़ी है। हालांकि वो ये जोड़ना नहीं भूलते कि हिंदी की तुलना में अंग्रेजी की ओर पाठकों का ज्यादा आकर्षण है।  बच्चों को लगता है कि अगर अंग्रेजी में सिद्धहस्त हो जाएंगे तों जल्द से जल्द रोजगार मिल जाएगा। कई बार तो ऐसा भी देखने को मिलता है कि अंग्रेजी में लिखी दोयम दर्जे की कृति भी सफल हो जाती है।
उनका मानना है कि जब भाषा में बदलाव आते हैं तो संस्कृति भी बदलती है। पुस्तक मेलों में उसी बदलती संस्कृति के दर्शन हो सकते हैं। वे इस बात से बेहद खुश नजर आए कि नई पीढ़ी में पढ़ने की ललक ज्यादा दिखाई देती है। नई पीढ़ी ने पढ़ने की अपनी रुचि का भी विस्तार किया है। इसमें दर्शन से लेकर शिक्षण तक को शामिल है। भाषा के सवाल को लेकर वे कहते हैं कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में बहुत ज्यादा स्कोप नहीं है। भारतीय भाषाओं में लिखकर कोई भी लेखक घर-परिवार चला नहीं सकता। अगर धनार्जन के आधार पर देखें तो अंग्रेजी लेखकों की तुलना में भारतीय भाषाओं के लेखक बेचारे नजर आते हैं।
वे कहते हैं कि आप इन पुस्तक मेलों को देखें तो आपको पता चल जाएगा कि प्रकाशकों को कितना मुनाफा होता है। पहले साल जो प्रकाशक एक स्टॉल लेता है वो अगले साल दो और उसके अगले साल चार स्टॉल ले लेता है। अगर किताबें बिकती नहीं हैं तो फिर उनका विस्तार कैसे होता है।
वे कहते हैं कि उनके बाद जो पीढ़ी साहित्य में आई है वो बहुत अच्छा काम कर रही है। कई युवा लेखक और लेखिकाएं बेहतर रच रहे हैं, चाहे वो कहानी हो या कविता। साथ ही ये भी जोड़ते हैं कि अच्छी चीजें लिखने के बाद पता नहीं वो किस दौड़ में शामिल हो जाते हैं।


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