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पसंद का नेता तय करने का समय

Posted On January - 8 - 2017

काॅफी पर गपशप
हरीश खरे

िचत्रांकन :   संदीप जोशी

चित्रांकन : संदीप जोशी

पंजाब का मतदाता अगले पांच साल के लिए अपने हुक्मरान चुनने के लिए 4 फरवरी को मतदान करेगा। क्या ये मतदाता सहजता के साथ ईमानदार विकल्प चुन पाने के प्रति आश्वस्त होगा?
एक नागरिक के नज़रिए से कहें तो यह बात बहुत महत्वपूर्ण है कि पंजाब में चुनाव प्रचार अभियान साफ-सुथरा हो और राजनीतिक मुकाबला पूरी तरह निष्पक्ष। यह सुनिश्चित करना अब भारतीय निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है। पंजाब में आयोग के अधिकारियों को सुनिश्चित करना होगा कि स्थानीय स्तर पर प्रशासन व्यापक स्तर पर बादल-मुक्त है। पिछले दस साल से पंचायत तथा इससे निचले स्तर पर सिविल तथा पुलिस नौकरशाही को अकाली दल की प्राथमिकताओं और इसके नेताओं की व्यक्तिगत सनक और जरूरतों के मुताबिक खुद को एडजस्ट करने के लिए म•जबूर कर दिया गया है। इसके लिए यह तर्क हो सकता है कि अधिकारियों के लिए कोई और चारा भी नहीं था। बहरहाल, दस साल बाद पंजाब पर एक परिवार की जागीर बन कर रह जाने का धब्बा तो लगता ही है।
लेकिन अब आदर्श आचार संहिता लागू हो जाने के बाद ऐसा नहीं होना चाहिए। लेकिन सौभाग्यवश, प्रदेश के दो वरिष्ठतम अधिकारी मुख्य सचिव सर्वेश कौशल तथा पुलिस महानिदेशक सुरेश अरोड़ा एक तरह से पुराने दौर के मंझे हुए पेशेवर हैं। सभी उम्मीदवारों तथा राजनीतिक दलों के प्रति समान व्यवहार तथा रवैया सुनिश्चित करने के लिए अपने जूनियर सहयोगियों को राजी करना उनकी जिम्मेदारी है। यदि चुनाव के दौरान अधिकारियों का आचरण सम्मानजनक रहता है तो बाद में दोषारोपण की ज्यादा जरूरत नहीं पड़ेगी।
दस साल तक राज्य की सत्ता में रहने के कारण अकालियों के समक्ष हर प्रकार के नुकसान की स्थिति है। उनका रिकार्ड तो अवश्य मिला-जुला रहा है लेकिन उनकी प्रतिष्ठा दागदार हो गई है। परिवारवाद की राजनीति की कीमत तो चुकानी ही पड़ती है और पंजाब भी कोई अपवाद नहीं है। क्योंकि पंजाब में व्यापक औद्योगिकरण नहीं हुआ है। जिस कारण प्रदेश का राजनीतिक वर्ग मुख्यत: पुरानी सोच और संपर्कों तक ही सीमित रहा। इसका नतीजा यह हुआ कि राजनेताओं ने अपनी पूरा ताकत अपने समर्थकों को खुश करने या फिर विरोधियों को परेशान करने के लिए स्थानीय अधिकारियों का इस्तेमाल करने में ही खपा दी। यह क्षुद्र राजनीतिज्ञों के गांव-दर-गांव छोटे-मोटे भ्रष्टाचार में संलिप्त रहने की एक घटिया कहानी है। गांव के स्तर का यह भ्रष्टाचार बहुत ही बदसूरत और अमानवीय होता है क्योंकि इससे न तो पीडि़त ही बच पाता है और न ही इसे प्रश्रय देने वाला। पंजाब में सामंती वफादारियों और उससे उपजे आक्रोश का माहौल है। और ये दुश्मनियां चुनाव में खुला खेल दिखायेंगी।
आम आदमी पार्टी ने एक समय में जनता में एक बड़ी उम्मीद जगाई थी कि वह एक नयी राजनीति की अग्रदूत बनेगी, और अकाली दल अथवा कांग्रेस के मुकाबले कहीं अधिक नैतिक बनकर उभरेगी। लेकिन वो उम्मीद और मौका अब खत्म हो गए हैं। मतदाता के परिवर्तन के प्रति मंत्रमुग्ध होने के बावजूद अब कहा जा रहा है कि इस पार्टी में अब वो बात नहीं रही।
इस सबके चलते भाजपा के समक्ष बड़ी विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई है। उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री मतदाता से ‘परिवर्तन’Ó का आह्वान करते हैं लेकिन पंजाब में उन्हें मतदाता के समक्ष यथास्थिति और निरंतरता का राग अलापते देखा जा सकेगा। केंद्र में सत्ताधारी पार्टी होने के नाते भाजपा और इसका नेतृत्व ‘नया फार्मूलाÓ’ रूपी अपना थीम गीत जारी रखना चाहेगा लेकिन पंजाब में उसके गाने के सुर ‘पुराने फार्मूले’ के होंगे। लेकिन इस सबके बावजूद इन नेताओं, उनके दिखावों और दावों की छंटनी करने के लिए हमें एक बार फिर मतदाता तथा उसकी समझ पर भरोसा करना होगा।

मैं  पूर्व सेना प्रमुख जनरल जेजे सिंह द्वारा पटियाला से कैप्टन अमरेंद्र सिंह के मुकाबले अकाली दल के संभावित प्रत्याशी के रूप में अपना नाम चर्चा में लाने की इजाजत दिये जाने से आश्चर्यचकित हूं। कोई भी निश्चित  तौर पर यह नहीं कह सकता कि वह इस मुकाबले के लिए राजी भी होंगे या फिर पटियाला से उन्हें प्रत्याशी बनाया ही जायेगा। फिर भी यह एक तरह से विचित्र बात है। इसलिए नहीं कि उनका किसी विशेष दल के प्रति झुकाव है बल्कि संपूर्ण आनुपातिक कमी की वजह से। एक पूर्व थलसेना प्रमुख ने खुद को विधानसभा चुनाव के प्रत्याशी के स्तर तक गिरा दिया। एकदम अजीब बात।
लोकसभा चुनाव लड़ना शायद थोड़ी सम्मानजनक बात होती लेकिन विधानसभा चुनाव, क्या कहें? इसका क्या फायदा?‍ पंजाब में शासन और राजनीति के नियमों को नये सिरे से परिभाषित करने का दावा करने वाली आप जैसी पार्टी की ओर से भी उन्हें मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी के तौर पर पेश किया जाता, तो भी शायद बात समझ में आती। लेकिन एक ऐसी पार्टी, जो कि पूरी तरह एक पारिवािरक संगठन है, उसकी ओर से विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी बनना! इस बात पर निश्चित तौर पर किसी के मन में कोई संदेह नहीं है कि वयोवृद्ध प्रकाश सिंह बादल ही अकाली दल की ओर से मुख्यमंत्री पद का चेहरा हैं और उनके बाद उप-मुख्यमंत्री तथा अकाली गद‍्दी के नामित उत्तराधिकारी सुखबीर बादल।
बेशक, किसी ने भी कभी जे.जे. सिंह के एक प्रतिभाशाली जनरल होने पर अंगुली नहीं उठायी, इस बात पर व्यापक आम राय है कि वह एक मेहनती जवान रहे हैं। लेकिन जनरल जे.जे. सिंह की तुलना में उनकी सोच अधिक दांव पर है।
क्या जनरल अपने पद से हटते ही इस पावन पद से जुड़ी संस्थागत विशेष्ाताओं के संरक्षक होने की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं? क्या हर जनरल को वीके सिंह की नकल करना जरूरी है, जो कि खुद को एक महत्वहीन राज्यमंत्री की महत्वहीन जिम्मेदारी में झोंक दिया पाते हैं? मुझे तो यह सब गड़बड़झाला समझ ही नहीं आता। ऐसे में भी उम्मीद की जाती है कि ‘चीफ’ की इज्जत हो।

7 jan 3बात 1923 की है, जब जर्मनी के कुछ विद्वान और चिंतक फ्रेंकफर्ट में सामाजिक अनुसंधान के लिए संस्थान स्थापित करने के लिए एक साथ आये। उनमें से हर कोई व्यक्ितगत तौर पर जानने को उत्सुक था कि जर्मनी रूस की 1919 की बोल्शेविक जैसी क्रांति ला पाने में नाकाम क्यों रहा। सामूहिक तौर पर जिज्ञासु मन वाला यह मजबूत समूह बेहद प्रभावशाली फ्रेंकफर्ट स्कूल के नाम से मशहूर हुआ। इनमें से लगभग सभी यहूदी थे और इनका संबंध प्रभावशाली परिवारों से था तथा इनमें से अधिकतर जर्मनी की सड़कों पर एडाल्फ हिटलर और उसके सशस्त्र मिलिशिया के आतंक से बचकर भाग निकले थे।
ये सब पहले न्यूयार्क में एकजुट हुए और फिर जर्मनी में जहां उनकी बौद्धिक यात्रा में नये अनुयायी और प्रशंसक जुड़ गये।
िब्रटिश पत्रकार स्टुअर्ट जैफरीज ने इस बौद्धिक विचार की एक सामूहिक जीवनी लिखी है। ग्रैंड होटल एबिस — द लाइव्ज ऑफ फ्रेंकफर्ट स्कूल नामक यह पुस्तक पढ़ने में कोई मुश्िकल किताब नहीं है लेकिन इतनी आसान भी नहीं है। मगर डटे रहने पर पाठक थियोडोर एडोर्नो, मैक्स हार्केमर, हर्बट मार्कूज, फ्रांज न्यूमैन, एरिक फ्राम और जर्गन हैबरमास जैसे सिद्धांतकारों से परिचित हो जाता है। एक पत्रकार की सूची में उपलब्ध तमाम तरकीबों और अलंकारों के सहारे जैफरीज पाठक को बेहद जटिल बुद्धि वाले लोगों की जटिल दुनिया में बांध लेता है।
शुरुआत में फ्रेंकफर्ट स्कूल वाले बड़ी तत्परता से क्रांति के अवरोधकों की रखवाली से इनकार कर देते हैं। वे ‘दलगत राजनीति से अलग और राजनीतिक संघर्ष के प्रति सशंकित रहते हैं।’ उनके विरोधी यह प्रचार करते थे कि यह स्कूल ‘परिवर्तन में उतना अच्छा नहीं है जितना कि वे बखान करते हैं।’ इसलिए इसे ग्रैंड होटल एबिस का अनाकर्षक नाम दिया गया जहां कि इसके आवासीय बुद्धिजीवियों ने सुरक्षित फासले पर रहते हुए जनता की पीड़ा पर चिंतन किया।
तमाम कटाक्षों के बावजूद फ्रेंकफर्ट स्कूल और इसके आलोचनात्मक सिद्धांत पूंजीवाद और इससे उपजे उपभोक्तावादी समाज पर सवाल उठाने के लिए बौद्धिक प्रेरणा और अवसर उपलब्ध करवाते रहे। इस तर्क का उपसंहार यह था कि ‘एकाधिकारवादी पूंजीवाद राष्ट्रीय समाज अथवा सोवियत मार्क्सवाद की तरह ही अधिनायकवाद का एक रूप है।’ इस स्कूल ने अधिकांश यूरोपीय इतिहास और समाज में यहूदियों के प्रति व्याप्त भेदभाव की सहज प्रवृत्ति पर पुनर्विचार के लिए मजबूर कर दिया। थियोडोर एडोर्नो की किताब आथोरिटेरियन पर्सनेल्टी इस बात को समझने की दिशा में पहला व्यापक प्रयास था कि समाज किस तरह हिटलर जैसे राजनीतिक बदमाशों की बातों से बहक जाता है।
जैफरीज हमें यह याद दिलाते हुए पुस्तक का समापन करते हैं कि फ्रेंकफर्ट स्कूल के निष्कर्ष आज के डिजिटल तानाशाही के युग पर एकदम सटीक बैठते हैं। आॅनलाइन संस्कृति का उद्योग और इसके दिग्गज स्टीव जाॅब्स और मार्क जुकरबर्ग ‘हमारे स्वाद के अनुरूप बांधे रखने और हममें अपने ही वर्चस्व की चाहत विकसित करने के लिए एक बेहतर तरकीब ढूंढ़ निकालते हैं।’ ‘अनुकूलित संस्कृति’ के आज के दौर में जैफरीज हमें याद दिलाते हैं कि फ्रेंकफर्ट स्कूल अभी भी हमें बहुत कुछ सिखा सकता है—‘कम से कम असंभवता और अलग तरीके से सोचने की आवश्यकता के बारे में।’ आमीन

पिछले रविवार को नये साल के मौके पर मुझे इस कालम के पाठक मित्रों के साथ काॅफी पर गपशप का मौका मिला। धूप खिली होने के कारण उत्साहवर्धक सुबह, दोस्ताना मजाक, गपशप और खुशी के पलों को याद करने का आदर्श अवसर। और अब क्योंकि बारिश के चलते ठंड एक बार फिर जोर पकड़ गई है तो एेसे में गर्मागर्म काॅफी तो बनती है। पीना चाहेंगे?


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