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पहले स्वदेशी विकल्प तलाशें

Posted On January - 11 - 2017

अभिषेक कुमार

11101CD _SOCIAL_MEDIA_VS_MSMपुड्डुचेरी के मुख्यमंत्री और राज्यपाल किरण बेदी के बीच सरकारी कामकाज में सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर पैदा हुआ विवाद पहली नजर में हमें राज्यपाल के पक्ष में खड़ा करता है। आज के युग में सरकारी कामकाज संचार के आधुनिक प्रबंधों से परहेज रखना किसी भी नजरिये से ठीक नहीं लगता, लेकिन जैसे ही हम इसके खतरों की तरफ निगाह डालते हैं तो पता चलता है कि इस मामले में कितनी ज्यादा सावधानी की जरूरत है।
असल में, हाल में पुड्डुचेरी में मुख्यमंत्री के आदेश पर राज्य सरकार ने एक सर्कुलर जारी करके सरकारी कामकाज में सोशल मीडिया, जैसे फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सएप के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी। आदेश में कहा गया कि चूंकि इन सभी सोशल मीडिया कंपनियों के सर्वर विदेशों में स्थित हैं, जिससे विदेशी ताकतें कभी भी सरकारी गोपनीय सूचनाओं को देख सकती हैं, ऐसे में यह ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट का उल्लंघन है। लिहाजा इन पर रोक लगाई जाती है। लेकिन कुछ ही दिनों में पुडुचेरी की राज्यपाल किरण बेदी ने मुख्यमंत्री का फैसला निरस्त करते हुए कहा कि यह निर्णय हमें गैर-तकनीकी युग में ले जाएगा।
नि:संदेह सरकारी कामकाज की गोपनीयता की जरूरत के मद्देनजर ऐसे कई उपायों की जरूरत है जो ईमेल और सोशल मीडिया के मंचों को साइबर सुरक्षा के लिहाज से मजबूत बनाएं। पिछले वर्ष बताया गया था कि सरकार जल्द ही ईमेल सिक्योरिटी पॉलिसी लागू करने जा रही है। साइबर सुरक्षा की इस नीति के तहत देश के सरकारी कर्मचारियों के लिए सरकारी ईमेल सेवा का निर्माण किया जा रहा है और सार्वजनिक क्षेत्र के सभी कर्मचारियों के ईमेल आईडी को नेशनल इन्फॉर्मेशन सेंटर (एनआईसी) के अधिकार-क्षेत्र यानी डोमेन में लाया जा रहा है। यह फैसला भी किया गया था कि सरकारी कर्मचारी अपने कार्यालयों में लगे कंप्यूटरों से जीमेल आदि निजी इंटरनेट सेवा प्रदाताओं (सर्विस प्रोवाइडर्स) के प्लेटफॉर्म से ईमेल नहीं भेजेंगे।
उल्लेखनीय है कि दुनिया के अन्य विकसित और विकासशील देशों की तरह ही भारत में भी साइबर स्पेस का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में ही हमारे देश में वायरलेस दूरसंचार सुविधाओं (जिसमें इंटरनेट का हिस्सा सबसे ज्यादा है) का घनत्व 5 प्रतिशत से बढ़ कर 85 प्रतिशत हो गया और इंटरनेट की पहुंच दस लाख से भी कम यूजर्स से बढ़ कर 35 करोड़ यूजर्स तक पहुंच गई है। आज बैंकिंग और वित्त ही नहीं, परिवहन, संचार, रक्षा और इंडस्ट्री के विभिन्न क्षेत्रों का कामकाज काफी हद तक साइबर दुनिया पर निर्भर है।
पर इस निर्भरता का एक बड़ा पहलू यह है कि जितना यह सुगम है, उतना ही इसके पलक झपकते ही छिन्न-भिन्न होने और इसके दुरुपयोग का खतरा है। दुनिया में कहीं भी बैठे हैकर हमारी महत्वपूर्ण सूचनाएं चुरा सकते हैं, उनका गलत इस्तेमाल कर सकते हैं और हमारी बैंकिंग, परिवहन, सैटेलाइटों सेवाओं को बाधित करने के अलावा सरकारी व सैन्य सेवाओं पर आभासी कब्जा जमा सकते हैं। कई हादसों से ये साबित भी हुआ है।
नि:संदेह जीमेल, फेसबुक, ट्विटर जैसी ज्यादातर इंटरनेट सेवाओं को संचालित करने वाले सर्वर अमेरिका में स्थित हैं। इससे हमारी सारी सूचनाएं अमेरिका और ब्रिटेन आदि मुल्क जब चाहें, इन सर्वरों से निकाल सकते हैं। सरकारी सूचनाओं की सुरक्षा बढ़ाने के मकसद से लिए गए फैसलों का एक आधार स्नोडेन प्रकरण है। अमेरिकी खुफिया एजेंसी के एजेंट रहे एडवर्ड स्नोडेन बता चुके हैं कि कैसे अमेरिकी पूरी दुनिया की सरकारों की सूचनाओं को हासिल करता रहा है।
लिहाजा सरकारी दफ्तरों में सोशल मीडिया और जीमेल आदि को प्रतिबंधित करना एक सही उपाय हो सकता है। कई आईटी कंपनियां अपने दफ्तरों तक में ऐसा करती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि फेसबुक, ट्विटर, जीमेल और याहू जैसी ईमेल सेवाओं को अपने दफ्तरों में इस्तेमाल की छूट देने पर उनकी कंपनी से जुड़ी अहम जानकारियां प्रतिद्वंद्वी कंपनियों के पास पहुंच सकती हैं। फेसबुक का इस्तेमाल करने वालों या ऑनलाइन शॉपिंग करने वालों को इसका एहसास अवश्य होगा, क्योंकि इन वेबसाइटों के इस्तेमाल पर एक संदेश यह आता है कि उपयोगकर्ता द्वारा दी गई जानकारी का इस्तेमाल वह वेबसाइट गोपनीयता की शर्त के साथ कर सकती है। गोपनीयता का यह दावा कितना सतही है-इसका अंदाजा उस वक्त हो जाता है जब फेसबुक या जीमेल आदि पर उपयोगकर्ता की जरूरतों से जुड़ी चीजों के विज्ञापन नजर आने लगते हैं।
वैसे इन समस्याओं का एक समाधान यह है कि देश में सोशल मीडिया और ईमेल सेवाओं का ऐसा प्लेटफार्म तैयार किया जाए, जिनसे जुड़े सर्वर देश के भीतर ही हों। इसके दो फायदे हैं। एक तो हमारी सूचनाएं बाहर नहीं जा पाएंगी और दूसरे, किसी आपराधिक या आतंकी घटना से जुड़े सूत्रों को देश में स्थित इन्हीं सर्वरों के जरिये जब चाहें, खंगाला जा सकेगा। लेकिन जब ऐसी व्यवस्था सरकारी दफ्तरों के सोशल मीडिया या ईमेल इंतजामों के संबंध में होगी तो सर्वर की क्षमता का सवाल वहां भी खड़ा होगा।


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