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पहाड़ पर पेड़ बचाने की जुगत में डिजाइनर चूल्हा मुफ्त बांटता है यह शख्स

Posted On January - 5 - 2017
पहाड़ पर मिट्टी से बने पर्यावरण संवेदी चूल्हे के साथ रुसेल।

पहाड़ पर मिट्टी से बने पर्यावरण संवेदी चूल्हे के साथ रुसेल।

ऑस्ट्रेलिया के एिडलेड से एक व्यक्ित हिमालय के तराई के इलाकों में घूमने के लिए आया था। उसका मन इतना रमा कि हर साल आने लगा। धीरे-धीरे वह अपने साथ और लोगों को भी लाने लगा। इस दौरान वे लोग पहाड़ पर रहने वाले लोगों से बात करते और उनकी समस्याओं को भी नजदीक से समझते। इन लोगों ने पाया कि पहाड़ पर रहने वाले परिवारों में महिलाओं की स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण है। ये महिलाएं दिन भर लकड़ियां एकत्रित करती हैं और फिर शाम को उनसे चूल्हा जलाती हैं। इसमें काफी लकड़ी लगती है और प्रदूषण भी होता है। रुसेल कॉलिंस ने इस समस्या का हल निकालने की सोची। इनोवेटर रुसेल ने एक ऐसा चूल्हा िडजाइन किया, जिसमें कम लकड़ी इस्तेमाल होती है और उससे प्रदूषण भी नहीं होता। इससे पहाड़ की महिलाओं के जीवन में बड़ा परिवर्तन आ रहा है।

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रुसेल के बनाए हिमालयन रॉकेट स्टोव में परंपरागत चूल्हे की तुलना में कम लकड़ी इस्तेमाल होती है। पहाड़ पर रहते हुए मैंने इस बात को भी समझा कि काफी पेड़ इसलिए काट दिए जाते हैं ताकि उनकी लकड़ी जलाने के काम आ सके। रुसेल पहली बार वर्ष 1992 में भारत आए थे। उन्होंने साइंस में बैचलर डिग्री की पढ़ाई बीच में छोड़ दी थी और इसके बाद कुछ वर्षों तक एक इकोलॉजिकल कम्युनिटी के साथ समय गुजारा था। रुसेल कहते हैं, मुझे भारत की संस्कृति और जीवन यापन के तौर-तरीके बेहद भाए थे। इसके बाद मैं यहां प्रतिवर्ष आने लगा। एडिलेड में दूसरे लोगों को भी यहां के बारे में बताया। फिर हम ‘याक ट्रैक- यूनिक जर्नी’ नाम से टूर और ट्रैवल्स का आयोजन करने लगे।
रुसेल के मुताबिक इस दौरान लद‍्दाख में इनोवेटर सोनम वांगचुक से मेरा कई बार मिलना हुआ। वर्ष 2003 में टेक्नोलॉजी पर चर्चा के दौरान उन्होंने मुझसे एक आइडिया शेयर किया। यह आइडिया एक ऐसा चूल्हा निर्मित करने का था, जिसमें कम लकड़ी इस्तेमाल होती हो और जिससे प्रदूषण भी न हो। इसके बाद हमने इस पर काम करना शुरू कर दिया। मेरा ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच आना-जाना लगा रहा, मैंने उस आइडिया पर काम करते हुए कोई 7 चूल्हे नमूने के तौर पर बनाए लेकिन वे कामयाब नहीं रहे।
इस दौरान उन्होंने ऑस्ट्रेलिया में फंड जुटाने के लिए एक अभियान चलाया और एक बड़े प्रायोजक को तलाश लिया। उनकी मदद से लद‍्दाख में एक छोटी फैक्टरी लगाई। इसके बाद उन्होंने आइडिया को आगे बढ़ाते हुए 30 चूल्हे निर्मित किए और उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को दान कर दिया। इन चूल्हों की सफलता के बाद उन्होंने और 25 चूल्हे तैयार किए हैं। रुसेल बताते हैं, उनके बनाए चूल्हे में लकड़ियों के छोटे टुकड़े इस्तेमाल होते हैं, यह चूल्हा इस तरह से डिजाइन किया गया है कि इसमें पूरी ऊर्जा का प्रयोग हो जाता है। वहीं लकड़ी जलने से निकलने वाला धुआं भी अपने आप खत्म हो जाता है। इससे अपार ऊर्जा निकलती है, फंडा यह है कि इस चूल्हे में लकड़ी का सीमित प्रयोग होने के बावजूद यह प्रदूषण नहीं फैलाता।
इस चूल्हे का इस्तेमाल पानी गर्म करने के अलावा रूम हीटर के तौर पर भी किया जा सकता है। रुसेल स्थानीय निवासियों को मिट‍्टी से पर्यावरण संवेदी चूल्हे बनाना भी सीखा रहे हैं। उनके मुताबिक बेशक धातु से पहले तैयार किए गए चूल्हे काफी बेहतर हैं, लेकिन उन पर लागत ज्यादा आती है, इसलिए हर एक के लिए उन्हें प्राप्त करना मुश्िकल है लेकिन मिट‍्टी से तैयार चूल्हे पहाड़ पर हर किसी की पहुंच में आ जाते हैं। वे चंडीगढ़ में भी लोगों को ऐसे चूल्हे बनाना सीखाने के लिए वर्कशॉप लगा चुके हैं।

भा.भू., चंडीगढ़


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