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फिर से दायित्व निभाने का समय

Posted On January - 1 - 2017

काॅफी पर गपशप
हरीश खरे

िचत्रांकन :   संदीप जोशी

चित्रांकन : संदीप जोशी

हमने एक और नये साल में प्रवेश किया है और भले ही हम नये साल का जश्न मना रहे हैं लेकिन फिर भी हमें अपने गणतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थानों को दरपेश चुनौतियों के प्रति दोगुना जागरूक रहना होगा। मीडिया के लिए विशेषकर नया साल बहुत ही कठिन रहने वाला है। मगर अपने पेशे की पवित्रता को बचाये रखना एक ईमानदार पत्रकार की जिम्मेदारी भी होगी।
जीवंत गणतंत्र के लिए आलोचनात्मक मीडिया बेहद ज़रूरी है। लेकिन कई बार उस वक्त हम खुद को बड़ी विकट स्थिति में पाते हैं जब मीडिया से वफादार होने की अपेक्षा की जाती है। लेकिन असहिष्णुता की नयी संस्कृति को सरकार की मौन स्वीकृति के चलते मीडिया को आलोचना की अपनी जिम्मेदारी त्यागने को कहा जा रहा है। इसके लिए तर्क यह दिया जा रहा है कि मीडिया और पत्रकारों को ‘तटस्थ’ रहना चाहिए। इस तर्क की शब्दावली है : नये मसीहा पर मीडिया कैसे सवाल उठा सकता है‍? सरकार पर संदेह क्यों किया जा रहा है?
देशभर के समाचार पत्रों को आर्थिक तनाव का सामना करना पड़ रहा है। आज अखबार निकालना महंगा सौदा हो गया है। छोटे और मझोले अखबार तो हमेशा राज्य तथा केंद्र सरकारों के संरक्षण पर आश्रित रहे हैं। लेकिन अब तो सरकार के खुद सबसे बड़ी विज्ञापनदाता बन जाने के कारण बड़े अखबारों को भी अपनी आवाज कम रखने के लिए लालच दिया जा रहा है।
पिछला साल विशेषकर मीडिया के लिए अच्छा नहीं रहा। पत्रकार भी अपनी गरिमा बनाये नहीं रख पाते। बल्िक एक पर्यवेक्षक के अनुसार अब तो ट्रेंड यह हो गया है “कि भारत का मीडिया सच्चाई के प्रति कंजूसी ही नहीं बरत रहा है बल्कि झूठ को बढ़ावा दे रहा है।”
लेकिन हताश होने की कतई ज़रूरत नहीं। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा कि मीडिया को सरकार के खिलाफ खुलकर अपने विचार रखने से रोका जा रहा हो। इस संबंध में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का पिछले दिनों यह कहना उिचत था कि “संदेह, असहमति और विवेकपूर्ण प्रतिवाद” हमारे लोकतांत्रिक संवैधानिक तानेबाने का हिस्सा है।
द ट्रिब्यून महसूस करता है कि नया साल पेशेवर पत्रकारिता के प्रति अपनी वचनबद्धता को फिर से निभाने का मौका होना चाहिए, जैसा कि इस महान समाचार पत्र की परम्परा रही है। हमें अपनी मूल जिम्मेदारी निभाने यानी सत्ताधारी पक्ष की आलोचना के चलते अकसर भला-बुरा कहा जाता है।
मेरा मानना है  कि अपने पाठकों, विशेषकर पंजाब के पाठकों को इस बात के प्रति आश्वसत करना जरूरी है कि पंजाब विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र हमारे कोई निहित स्वार्थ नहीं हैं और न ही हमारी कोई पसंदीदा पार्टी, नेता या फिर कोई पसंदीदा प्रत्याशी है। हम बिना किसी डर और पक्षपात के अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी और काबिलियत से निभायेंगे।
31 dec 3इंडियन ऑफ द ईयर 2016 के लिए मैं अपना वोट
विराट कोहली को देना चाहूंगा। लेकिन इसलिए नहीं कि एक क्रिकेटर और भारतीय टेस्ट कि्रकेट टीम के कप्तान के तौर पर उनका यह साल सफल रहा है बल्कि इसलिए कि वह उत्कृष्टता की खोज के ऐसे मानक के रूप में उभरे जो कि अधिकतर भारतीयों में नहीं होती। हम अकसर मध्यम अथवा औसत दर्जे से ही संतुष्ट हो जाते हैं।
पूर्णता के प्रतीक के अलावा मैं सोचता हूं कि विराट कोहली सोशल मीडिया पर चल रहे फूहड़पन की खिलाफत के लिए सलामी के हकदार हैं। उन्होंने बड़ी दृढ़ता से अपनी मित्र सुश्री अनुष्का शर्मा का बचाव किया, जिनके बारे में सोशल मीडिया पर बेवजह कई तरह की बातें की जा रही थीं। किसी को ट्विटर पर भद्दी टिप्पणियां करने वालों को यह सब बंद करने के लिए आगे आना पड़ा। विराट ने वही किया।
समाज के तौर पर हम खुद को एक विचित्र दोराहे पर खड़ा पाते हैं। हम साेशल मीडिया के बड़बोलेपन के गुलाम हो गये हैं। शिष्टाचार को आज हाशिये पर धकेल दिया गया है। लेकिन अभी भी वक्त है। भद्रजनों की बजाय सोशल मीडिया पर फूहड़ और विषैली बातें करने वालों का बोलबाला है। और यही वजह रही कि सोशल मीडिया पर बेहूदा बातें करने वालों की खिलाफत करने के विराट कोहली के साहस को व्यापक स्तर पर सराहा गया। उम्मीद है कि नये साल में भद्र नागरिक अपने उदार मूल्यों  को मुखर कर गणतंत्र के सन्मार्ग पर पुन: चल पायेंगे।
इयान टालबोट को अिवभाजित पंजाब के बेहतरीन
इतिहासकारों के रूप में जाना जाता है। उन्होंने बंटवारे और पाकिस्तान के बारे में खूब लिखा है। अब उन्होंने पाकिस्तानी विद्वान ताहिर कामरान के साथ मिलकर एक बेहद पठनीय पुस्तक, लाहौर इन द टाइम आफ द राज लिखी है।
टालबोट का लाहौर एक जीवंत, चमक-दमक और फैशन वाला बहिर्मुखी शहर है। टालबोट अंग्रेजों द्वारा इस शहर के अंतर्मुखी होने की अवधारणा को गलत बताते हैं, बल्िक वह तो इस शहर को बिना किसी प्रयास के अंतर्राष्ट्रीय जरूरतों के अनुसार खुद को ढालने वाले शहर के रूप में पेश करते हैं। टालबोट का तर्क है : ‘‘कि लाहौर औपनिवेशिक युग से कई शताब्दी पूर्व भी व्यापार, लोगों के आवागमन और विचारों से जुड़ा रहा है। लाहौर कोई पिछड़ा क्षेत्र नहीं बल्िक इसके संबंध अपनी सीमाओं से बाहर के क्षेत्रों और दूसरे राष्ट्रों से भी रहे हैं। लाहौर रूडयार्ड किपलिंग के ‘सिटी आॅफ ड्रेडफुल नाइट’ की तरह बिल्कुल भी नहीं था। यह उत्तर भारत में फैले पेशेवर, राजनीतिक और सांस्कृितक संबंधों का शहर था।’’
अंग्रेजों द्वारा 1857 के विद्रोह को बेरहमी से कुचल दिये जाने के बाद दिल्ली का वो शाही दर्जा नहीं रहा। प्रतिभाशाली और उद्यमी लोग आसानी से और स्वाभाविक तौर पर लाहौर चले गये। टालबोट ब्रिटिश राज की आखिरी शताब्दी के दौरान शहर के बदलाव की एक बड़ी रोचक कहानी पेश करते हैं।
यह पुस्तक उस बदलाव और विस्तार का जीवंत चित्रण है। ब्रिटिश शासन के आखिरी छह दशकों में लाहौर की आबादी चार गुणा बढ़ गई। आबादी के मामले में लाहौर ने पंजाब के सबसे बड़े शहर अमृतसर को पीछे छोड़ दिया। रेलवे स्टेशन, सिविल लाइन, एक जीपीओ, हाईकोर्ट और अन्य भवनों ने न केवल भौगोलिक विस्तार को नया आकार दिया बल्िक इससे नया नजरिया और विचार निर्माण एवं खपत की नयी पद्धतियों का भी
सृजन हुआ।
शहर ने नयी सम्पन्नता अौर नया नज़रिया  देखा, अनारकली बाजार में नयी खुदरा दुकानें अौर करियाना स्टोर अौर माल; द अरोड़ाज़, खत्रीज, अग्रवाल अौर अन्य बनिये एेसे पहले संपन्न लोगों में शामिल थे जो पुराने शहर से बाहर जाकर बसे। टालबोट बताते हैं कि एक समय तो लाहौर में 20 बैंकों के दफ्तर थे, जो कि किसी भी दूसरे भारतीय शहर के मुकाबले ज्यादा थे। वह अागे बताते हैं कि ‘14  द माॅल की सनलाइट बिल्िडंग में न्यू बैंक अाॅफ इंडिया का दफ्तर था अौर इसमें बुर्के वाले ग्राहकों के लिए एक महिला सहायक भी तैनात थीं।
हिन्दू उद्यमी प्रायोगिक मूड में थे। लाला लाजपत राय अौर लाला हरकिशन ने मिलकर पंजाब नेशनल बैंक अौर बीमा कंपनियां शुरू कीं। 1931 की मंदी की मार से पूर्व लाल हरकिशन शहर की एक बड़ी हस्ती थे। वह कार रखने वाले शहर के सबसे पहले लोगों में शामिल थे अौर वह उप राज्यपाल की तरह ही ऊंट बग्गी की सवारी करते थे।
टालबोट दरवाजों (भाटी गेट, शाह अालमी गेट, मोची गेट) की भी बात करते हैं। वह मोहल्लों (हवेली मियांखान); फलैती होटल (जहां फ्रेंच, इटैलियन अौर जर्मन बोली जाती थीं), मुशायरों अौर कवियों (मोहम्मद हुसैन अाजाद, अल्ताफ हुसैन हाली), अखाड़ों, उनके संरक्षकों, खलीफाअों, उस्तादों अौर पहलवानों (गामा पहलवान, बूरा पहलवान) की भी बात करते हैं। उन्होंने क्रिकेट खिलाड़ियों (लाला अमरनाथ, जहांगीर खान) अौर 1944-45 में हिन्दुअों अौर मुसलमानों के बीच खेले गये क्रिकेट मैच के फाइनल, जिसे  दो लाख से अधिक लोगों ने देखा तथा शहीदों अौर क्रांतिकारियों (भगत सिंह, उधम सिंह, मदन लाल ढींगरा) का भी पुस्तक में उल्लेख किया है।
लाहौर इन द टाइम अाॅफ द राज एक पूरी तरह मनोरंजक पुस्तक है।
अंतत: मैं अाशा करता हूं कि द ट्रिब्यून के पाठकों अौर संरक्षकों के साथ वार्तालाप  का यह सिलसिला नये साल में भी बदस्तूर चलता रहेगा।
मैं इस कालम बारे बड़ी संख्या में पाठकों की अोर से मिलने वाली प्रतिक्रिया के लिए उनका अाभारी हूं। असहमति अौर अालोचनाअों का सदैव स्वागत है। एक साथ काॅफी पीने की तरह हम मिलकर नयी अौर पुरानी बुराइयों
का मुकाबला करेंगे। इस बारे आपका क्या ख्याल है?

kaffeeklatsch@tribuneindia.com


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