असल जिंदगी का रूप है सिनेमा : अख्तर !    नहीं रहे प्रसिद्ध उर्दू गीतकार लायलपुरी !    पूर्व सीबीआई प्रमुख की रिपोर्ट पर फैसला आज !    अकाली दल के कई नेता कांग्रेस में शामिल !    2 गोल्ड जीतकर लौटी फरीदाबाद की बेटी !    जेसी कालेज की लड़कियों ने मारी बाजी !    भारत का प्रतिनिधित्व करेगा दिवेश !    तेरिया ने जीता 'झलक दिखला जा' का खिताब !    पाक में मामले की सुनवाई 25 को !    विशेष अतिथि होंगे 40 आदिवासी !    

बदलेंगे घुमक्कड़ी के अंदाज़

Posted On January - 1 - 2017

अलका कौशिक
plr copyलद्दाख तक पहुंचने की सरे-राह पर बर्फ की मोर्चाबंदी भी अब यायावरों के पैरों को थाम नहीं पाती। आसमान को चीरते लोहे के पंछियों पर सवार हो कितने ही कदम इस सर्दीली खोह में उतरने की बेताबी को और हवा देते हैं। ये दीवाने सिर्फ घुमक्कड़ी के लिए वहां पहुंचते हों, ऐसा नहीं है। कोई लद्दाख के सुदूर गांवों तक बिजली पहुंचाने की पहल करने वाले सामाजिक संगठन का हिस्सा बन जाना चाहता है तो किसी को बीते सीज़न में वहां आए यात्रियों द्वारा पीछे छोड़ जाने वाले कचरे को हटाने की मुहिम का हिस्सा बनने की जिद होती है। सिर्फ और सिर्फ सैर—सपाटा पीछे छूट रहा है और यात्राओं में कुछ नया अनुभव भरने, कोई नया प्रयोग जोड़ने, किसी जिद को पूरा करने, कहीं दुस्साहसी तेवर आजमाने की फितरत बढ़ रही है। सच है, यात्राएं बदल रही हैं और उनके संग—संग बदल रहे हैं यात्रियों के मिजाज़।
फख़्त यायावरी
DSCN8673BB copyपत्रकार रंजिनी सिंह जब एक रोज़ अपनी अस्त—व्यस्त जिंदगी में ‘ब्रेक’ के लिए भूटान निकल पड़ती हैं तो उनकी यात्राओं के पीछे किसी योजनाबद्ध तैयारी को ढूंढना मुश्किल होता है। और वो पूरी ईमानदारी से स्वीकार करती हैं कि यात्राओं पर निकलने से पहले उन्हें प्लानिंग करना ज्यादा पसंद नहीं है। और इसकी वजह है, नई घटनाओं, नई जगहों, नए अनुभवों के रहस्य को जितना हो सके बरकरार रखना। सफरी दुनिया में यह ट्रेंड अब तेजी से ज़ोर पकड़ रहा है। लोग नई, अनदेखी मंजिलों के बारे में बिना जानकारी हासिल किए, जेब में टिकट, पासपोर्ट पर वीज़ा और सीने में जुनून भरकर निकल रहे हैं। उन्हें नए अनुभवों, चुनौतियों, परेशानियों, नए लोगों, नई संस्कृतियों, अपरिचित ठिकानों से कतई परहेज़ नहीं रहा है। नए दौर का यात्री वाकई अपने नए समीकरण गढ़ रहा है जहां यात्राओं पर निकलने से पहले लंबी तैयारियों की नहीं, जज़्बे की खुराक ही काफी है।
यात्राओं में घुलेंगे ‘थीम्स’
ajanta-caves-excursion copy”मेरी यात्राओं में थीम हावी रहता है। एक सिरे से दूसरे को जोड़ने वाला कोई ऐसा सेतु जिस पर सवार होकर मैं अपने आसपास के बारे में एक नई निगाह पाती हूं, मेरी यात्राओं की मंजिलों को तय करता है। और वो मंजिलें गोवा—मुंबई—दिल्ली जैसे शहर भले ही हों लेकिन उनमें भी मेरा सफर मुझे ऐसी गलियों में ले जाता है जहां अमूमन दूसरे यात्री नहीं जाते या गिने—चुने ही उस तरफ जाना पसंद करते हैं। ‘डिस्कवरिंग डिफरेंटली’ का मेरा फलसफा मुझे किसी भी शहर—महानगर—गांव—कस्बे को देखने—समझने की एक अलग दृष्टि देता है। मसलन, हाल में दिल्ली में तफरीह करते हुए मैंने ‘ब्रेकअवे’ की टेक्सटाइल ट्रेल के लिए साइन—अप किया। अब भला कोई सोच सकता है कि दिल्ली जैसे महानगर में भी ऐसी मंजिलें होंगी जहां कुछ पल थमकर हम अपने देश की वस्त्र संस्कृति से रूबरू हो सकते हैं? …. पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट सुनन्दिता अपने ट्रेवल स्टाइल की परतें खोलने के साथ—साथ आने वाले साल में अपनी यात्राओं के तौर—तरीकों से भी वाकिफ करा रही थीं। ”कार्पोरेट दुनिया की डेडलाइन और बैलेंस शीटों के आंकड़े जब ज्यादा ही मनमानियों पर उतरने लगते हैं और मैं शहर से दूर सफर पर नहीं निकल सकती तो अपने ही शहर को जानने निकल पड़ती हूं। ‘ब्रेकअवे’ के साथ मैं नेब सराय में रंगरेजी गलियों को नापती हूं, ‘शिबोरी’ जैसी कपड़ा रंगने की जापानी तकनीक से वाकिफ होती हूं, फिर किसी ऐसे मुहल्ले से होकर गुजरती हूं जहां किसी दीवाने ने अपने ही घर को दुनिया-जहां की बुनाई वाले बेशकीमती फेब्रिक से सजे स्टूडियो में तबदील कर लिया है। और ट्रेल का अगला सिरा हम मुसाफिरों को “संस्कृति म्युज़ियम” से जोड़ता है जहां देश—दुनिया की टेक्सटाइल का एक विशाल संग्रह ललचाता है। अगला कदम हम रखते हैं किसी कला दीर्घा में जहां एक बार फिर बुनकरों की दुनिया को बेहतर तरीके से समझने का मौका मिलता है। इस तरह एक पूरा दिन बीत जाता है अपने ही बैकयार्ड में सिर तानकर खड़ी उस दुनिया को समझने में, जिससे हम अमूमन नावाकिफ रहते हैं।”
वॉलन्टूरिज़्म
d2ce3727 copyबारहवीं में पढ़ने वाला अर्श इस साल अपने बोर्ड एग्ज़ाम के बाद लद्दाख में बच्चों को पढ़ाने जाने के लिए एक एनजीओ से जुड़ चुका है। बीते साल उसने कंबोडिया में भी ऐसा ही कुछ अनुभव लिया था। पढ़ाने के बदले उसे मिलता है मुफ्त खाना—पीना, रहने का ठिकाना और स्थानीय ठिकानों पर घूमने के अवसर। दूर—दराज के इलाकों में वॉलंटियरिंग का यह अनुभव स्कूल—कॉलेज के छात्रों के अलावा युवा पेशेवरों तक को लुभा रहा है। कश्मीर से लेकर कर्नाटक तक, नॉर्थ ईस्ट से लेकर गुजरात तक में एजुकेशनल इंस्टीट्यूटों, एनजीओ, मॉनेस्ट्री—ननरी और आश्रमों, टूरिज़्म कंपनियों, म्युज़ियम और यहां तक कि पेशेवरों से जुड़कर वॉलन्टियरिंग और इंटर्नशिप के अनुभवों ने यात्राओं को नया आयाम दिया है। यह चलन आने वाले साल में और बढ़ेगा क्योंकि अब बहुत से लोगों को सिर्फ घुमक्कड़ी रास नहीं आती बल्कि वे इसे किसी सार्थक, उत्पादक और अधिक रोचक अनुभव में तबदील करना चाहते हैं।
हावी होता एडवेंचर
Bogota-63112 copyपुष्कर से रणथंबौर, रणकपुर, जयपुर से आगरा तक के आसमान में उड़ते गुब्बारे गवाह हैं कि आधुनिक दौर के सैलानियों के मन में पंछियों की परवाज़ को पछाड़ने की लालसा लगातार बढ़ रही है। स्काइवॉल्ट्ज़ कंपनी ने 2008 में जब पहले गुब्बारे के साथ हिंदुस्तान के आकाश में टहलकदमी शुरू की थी तो उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि यूरोप—अमेरिका के पर्यटन मुहावरे का अभिन्न हिस्सा रहे ये हॉट एयर बैलून्स दस साल से भी कम समय में हिंदुस्तान में नए यात्रा रुझान गढ़ने लगेंगे। स्काइवॉल्ट्ज़ के डायरेक्टर समित गर्ग नवंबर में आगरा में ताज हॉट एयर बैलून फेस्टिवल के मौके पर जमा उत्साही सैलानियों के सीनों में परवाज़ भरने के जज़्बों को महसूस कर रहे थे। समित कहते हैं कि ताज के आसमान पर गुब्बारों में उड़ने का रोमांच लफ्ज़ों में बयान नहीं किया जा सकता। लोकल और टूरिस्टों का बैलून राइड के लिए उत्साह सुखद अहसास से भर देने वाला अनुभव था। यह किसी जश्न से कम नहीं था और इस बार का अनुभव हमें इस उम्मीद से भर गया है कि इस फेस्टिवल को हर साल आयोजित किया जा सकता है। सरकारी सपोर्ट इस बात का भी इशारा है कि देश अब रटे—रटाए पर्यटन समीकरणों से बाहर निकलने को तैयार है।”
उधर, कश्मीर में गुलमर्ग से लेकर उत्तराखंड में औली और हिमाचल में मनाली तक की बर्फीली ढलानों पर स्कींग का ख्वाब संजोने वालों के चेहरों पर सीज़न की पहली बर्फबारी से फैलने वाली मुस्कुराहट इस बात का बयान होती है कि उनकी रगों में एडवेंचर किस हद तक दौड़ता है। पिछले वर्षों में लद्दाख में सर्दियों में पारे के माइनस बीस—तीस तक लुढ़कने के बावजूद ट्रैकर्स के उत्साही ग्रुप, लक्षद्वीप, गोवा, अंडमान द्वीपों पर स्कूबा के लिए दौड़े चले जाने वाले पर्यटक, एक्स्ट्रीम स्पोर्ट्स के लिए देश की हदों को पार कर विदेश जाने तक से भी परहेज़ नहीं करने वाले सैलानी, पैराग्लाइडिंग—हॉट एयर बैलून राइड, स्काइ डाइविंग जैसे रोमांचकारी अनुभवों पर हजारों रुपए खर्च कर देने का माद्दा रखने वाले यात्रियों का बढ़ना संकेत है कि एडवेंचर आने वाले समय में ट्रैवल सीन में और रंग भरेगा।
विरासत की सैर
lkgl;dfkgll; copyदिल्ली जैसे ऐतिहासिक शहर को टटोलने के लिए हेरिटेज वॉक (विरासत की सैर) से लेकर इस तरह की टेक्सटाइल ट्रेल एक नया नज़रिया देती हैं। हेरिटेज वॉक लीडर और कल्चरल एक्टीविस्ट डॉ नवीना जाफा कहती हैं, ” करीब दो दशक पहले जब मैंने देश के अलग—अलग हिस्सों में यात्रियों को हेरिटेज वॉक के माध्यम से उस जगह के जाने—अनजाने पहलुओं से वाकिफ कराने की पहल की थी तो ज्यादातर विदेशी मेरी उंगली थामकर चला करते थे। लेकिन आज हालात बदल रहे हैं, अब मैं कर्नाटक में बादामी की गुफाओं से लेकर हंपी—पट्टाडकल के ऐतिहासिक मंदिर समूहों तक जो ट्रिप लेकर जाती हूं उनमें कुछ संख्या देसी यात्रियों की भी होती है। और अपने ही शहर में तो कभी रमज़ान वॉक के बहाने जामा मस्जिद और फिर उसके पिछवाड़े सजे बाजारों के बहाने पीछे छूट चुके लंबे दौर की रिवायतों को समझने या ‘कोर्टिसन्स (तवायफ) वॉक’ में शामिल होने वाले लेखकों—ब्लॉगर्स के उत्साही ग्रुप यह बताने के लिए काफी हैं कि लोगों का अपने जाने—पहचाने इलाकों को किसी एक्सपर्ट के साथ जानने निकल जाना एक नया ‘ट्रेंड’ बनकर उभर रहा है। दरअसल, डॉ जाफा मानती हैं कि ”अतीत के संरक्षण की कोई भी पहल तब तक अधूरी है, जब तक लोगों को इस बारे में शिक्षित न किया जाए और हेरिटेज वॉक ऐसा करने का बेहद कारगर नुस्खा है।”
उधर, लखनऊ जैसे इतिहास में रंगे-सजे शहर में हेरिटेज वॉक के बहाने अंग्रेज़ी हुकूमत के दिनों की यादों को ताजा कराने के लिए ‘टॉरनॉस’ के वॉकिंग टूर बेहद लोकप्रिय हो रहे हैं। टॉरनॉस के वॉकिंग टूर अयोध्या—काशी की गलियों—मुहल्लों, गंगा के घाटों, विद्या—पीठों से लेकर कुश्ती के अखाड़ों और योग—संगीत शालाओं तक की सैर कराते हुए सैलानियों को बीते युग से मिलवाते हैं और मौजूदा जीवनशैली की झलक दिखाते हैं। नेशनल ज्यॉग्राफिक, लोनली प्लेनेट, कॉन्डे नैस्ट जैसे यात्राओं की दुनिया के महारथी भी इन शहरों को पिटे—पिटाए ढर्रों से अलग जाकर देखने की चाहत रखने वाले मुसाफिरों के लिए इस किस्म की सैर की सिफारिश करते हैं।
कोई शक नहीं कि बीते साल—महीनों में हेरिटेज वॉक के सिलसिले बढ़े हैं और पांडिचेरी में इंटैक द्वारा प्रायोजित स्ट्रीट वॉक से लेकर मुंबई की बदनाम बस्ती में कमाठिपुरा नाइट वॉक, भोपाल में बीते दौर की नवाबी संस्कृति को जानने—समझने के लिए पुराने मुहल्लों की सैर, काशी में गंगा पर तिरती नौकाओं पर से हिंदू संस्कृति की झलकियां दिखलाती सैर, हैदराबाद में हिमरू—शिमरू जैसी लुप्तप्राय: बुनाई को जीवनदान देने वाले बुनकरों से मिलवाने के लिए ‘ब्रेकअवे’ की टैक्सटाइल वॉक, पुणे में मराठा इतिहास के दौर से रूबरू कराती विरासत की सैर दिनों- दिन लोकप्रिय हो रही हैं और मुसाफिर अपनी यात्राओं में इन्हें शामिल करने लगे हैं। आने वाले दिनों में यह आंदोलन यकीनन ज़ोर पकड़ेगा।
होमस्टे की आजमाइश
आने वाले साल में विदेश यात्राओं में भी तेजी का दौर रहने की उम्मीद जतायी जा रही है। ग्लोबलाइज़ेशन ने भौगोलिक सीमाओं को लांघने का सपना दिखाया है। कभी सिर्फ काम के सिलसिले में विदेश का रुख करने का चलन था लेकिन अब ईजिप्ट, सेशेल्स, इस्राइल, जॉर्डन, ताइवान, आइसलैंड, आयरलैंड, नॉर्वे, स्वीडन, स्लोवेनिया, आस्ट्रिया, टर्की जैसे देश लोगों को आकर्षित करने की बाकायदा सिलसिलेवार मुहिम छेड़ते हैं। पैकेज टूर किसी की जेब के हिसाब से उपयुक्त साबित होते हैं तो कुछ घुमक्कड़ काउचसर्फिंग या होम स्टे जैसे विकल्पों को आजमाने निकल पड़ रहे हैं। हिच हाइकिंग यानी बिना जेब से कुछ खर्च किए सड़कों पर दूसरे यात्रियों से लिफ्ट मांगकर सैर—सपाटे करने वाले बढ़ रहे हैं। होटलों—हॉस्टलों में रहना हुआ पुराना, अब लोकल बाशिन्दों के साथ, उनके घरों में रहते हुए किसी नई जगह को जानना नए दौर का शुगल है।
यात्राओं की शैली ही नहीं, अपने घरों से दूर, दूसरे शहर में, विदेश में रहने—जीने की अवधि भी तेजी से बदल रही है। हफ्ते—दस दिन के पैकेज टूर की बजाय कई—कई महीनों कहीं और जाकर लोकल की तरह रहना—सहना अब नए वक्त़ का नया फलसफा है। आगे—आगे देखिए यात्राओं के पड़ाव इक्कीसवीं सदी के प्रयोगधर्मी यायावरों को और कहां ले जाते हैं।


Comments Off on बदलेंगे घुमक्कड़ी के अंदाज़
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

समाचार में हाल लोकप्रिय

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.