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बारह जनवरी

Posted On January - 10 - 2017
चित्रांकन : संदीप जोशी

चित्रांकन : संदीप जोशी

फ्रांसिसी कहानी

हेनरी लैवडन
मोशिया करवेऊ सहमा हुआ-सा दफ्तर से बाहर आया। बाहर आते वक्त उसके कई मित्रों ने उसे छिपकर जाने को कहा। उसने दफ्तर के लगभग तीन फ्रैंक खो दिए थे। अब वह शीघ्रता से घर पहुंच जाना चाहता था। रास्ते में उसे एक व्यक्ति से यह भी सूचना मिली कि घर पर उसकी पत्नी बड़ी बेसब्री से उसका इंतज़ार कर रही है। इससे उसे और भी चिंता होने लगी। घर के पास पहुंचने पर उसे ऐसा लगने लगा कि उसकी हिम्मत जवाब देने लगी है। पता नहीं उसकी पत्नी उसे क्या समाचार सुनाने वाली है?
धीरे-धीरे सीढ़ी पर पांव रखता वह ऊपरी मंजिल की ओर बढ़ने लगा। उसका हृदय बड़ी तेजी से धड़क रहा था। जब वह एक पायदान पार कर दूसरे पर पांव रखने जा ही रहा था कि ऊपर किसी के खखारने की आवाज आई। उसने अपना सिर ऊपर उठाकर देखा तो रेलिंग के सहारे अपनी पत्नी को नीचे झुका पाया। उसके हाथ में एक दीपक भी था। वह और भी अधिक घबरा गया। बहरहाल वह धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ता रहा। उसने अपने चेहरे पर उड़ती हवाइयों को मुस्कान में छिपाने की भरसक कोशिश की। कुछ ही देर में ज्यों ही वह ऊपर पहुंचा कि उसके कुछ बोलने के पहले ही उसकी पत्नी बोल उठी-आखिकार आप आ ही गए। मैं बड़ी अधीरता से अब तक आपकी राह देख रही थी। फिर वह पति का हाथ तेजी से अपने हाथों में लेते हुए बोली-आप नहीं जानते कि मैं कितनी आश्चर्यजनक बात आपको बताने जा रही हूं। …आइए, अंदर आइए।
वे कमरे में गए। महिला ने दरवाजा बंद कर लिया और बोली-अभी आपको पता लग जाएगा कि बात क्या है। कहकर वह जोर से हंसी।
‘तुम मुझे परेशान कर रही हो, लोना। पहेलियां मत बुझाओ, बताओ न क्या बात है?’ करवेऊ ने कहा।
‘तो सुनो…। एक घंटे पूर्व मेरे साथ एक बड़ी आश्चर्यजनक घटना घटी है। आपने तो ढेर सारे उपन्यास पढ़े हैं, पढ़े हैं न?’
‘हां, पढ़े तो हैं परन्तु तुम कहना क्या चाहती हो और तुम्हारी उस बात का मेरे उपन्यास के पढ़ने से क्या लेना-देना है?’
‘क्या आप अनुमान नहीं लगा सके? एक बार कोशिश करके तो देखिए।’
‘अरे बताओ तो सही क्या बात है? मैं अब तुमसे प्रार्थना करता हूं।’
‘तो सुनिए… मैं सेंट होनोरे से जब वापस आ रही थी तो रास्ते में मुझे यह मिला।’ कहकर बड़ी मुश्किल से उसने अपने जेब से एक काली और कठोर चीज निकाली। फिर उसका चेहरा गंभीर हो गया जैसे वह कोई अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहस्य उजागर करने जा रही हो। उसने वह वस्तु अपने पति की ओर बढ़ा दी और बोली, ‘ज़रा इसे देखो, इसके बारे में आपकी क्या राय है?’
करवेऊ ने उसे उलट-पलटकर देखा फिर कहा, ‘अरे, यह तो एक पॉकेट-बुक है।’
‘इसके अंदर तो देखिए।’
सावाधानी से करवेऊ ने उसे खोला। कुछ कागज के पन्ने बाहर उड़कर गिर पड़े। महिला को बुरा लगा। कहने लगी, ‘मुझे दो।’ फिर उसने पॉकेट-बुक का पहला पन्ना खोलकर कहा, ‘देखिए, यह कोई विदेशी व्यापारी कंपनी के शेयर के कागज हैं। मैं फिलहाल कह नहीं सकती कि इसकी कीमत क्या होगी।’
‘आश्चर्य की बात है कि यह तुम्हें मिला।’
‘हां, यह मुझे सड़क के किनारे पड़ी मिली।’
‘किसी का गिर गया होगा।’
‘हां… और क्या?’
‘यदि कहो तो खाना खाने के बाद चलकर इसे किसी थाने में जमा कर आएं। तुम क्या कहती हो?’
‘क्यों नहीं, अवश्य। मुझे इसे रखने की कतई इच्छा नहीं है।’
वे चुप्पी साधकर बैठ गए। फिर महिला ने यकबयक कहा, ‘वह व्यक्ति जो कल हमारे यहां खाना खाने आया था, मौरीन… उसे दिखाकर पूछते हैं कि सचमुच यह है क्या?’
उन्होंने कागज के उन पन्नों को मौरीन को दिखाया। उसने अच्छी तरह कागजों को देखकर कहा, ‘रूसी-आस्टि्रयन रेलवे के शेयर। वाह, आप लोगों की तो किस्मत खुल गई। ये कम से कम चालीस हजार फ्रैंक के होंगे।’
‘चालीस हजार फ्रैंक?’ सुनकर पति-पत्नी दोनों उछल पड़े।
मौरीन ने आगे कहा, ‘सबसे बड़ी बात यह है कि कुछ ही वर्षों में इनकी कीमत दुगुनी हो जाएगी। मैं इन चीजों का अच्छा पारखी हूं।’ फिर हंसते हुए उसने कहा, ‘अगर मैं तुम्हारी जगह होता तो…।’
थोड़ी देर बाद जाकर उन्होंने उस पॉकेट-बुक को थाने में जमा कर दिया। उनका नीरस जीवन पहले जैसा ही फिर से बीतने लगा।
इस तरह देखते ही देखते आठ महीने गुज़र गए। नवां महीना भी तकरीबन आधा समाप्त हो चुका था। एक दिन महिला ने अपने पति से कहा, ‘क्या आप विश्वास करेंगे कि अभी तक उस पॉकेट-बुक को लेने कोई नहीं आया है। …मैंने इस बारे में थाने जाकर पूछा था।’
‘अच्छा… सचमुच।’
‘हां।’ वह अत्यंत प्रसन्न दिख रही थी।
उस दिन से दोनों लगभग हर रोज उस पॉकेट-बुक के बारे में जानने के लिए थाने जाने लगे। वहां का थानेदार उन्हें देखते-देखते परेशान हो उठा। अंततः उन्होंने तय किया कि यदि कोई न मिले तो वे ही उसे दुबारा वापस ले लेंगे।
उस रात वे सो न सके। बिस्तर पर बैठे वे रात भर दीपक के धुंधले प्रकाश में कल्पनाओं की उड़ान भरते रहे। उन्होंने समुद्र के किनारे एक किला बनाने का निर्णय लिया और उसका नाम भी सोच लिया—बिलालोनी। उन्होंने एक नौकर भी रखने के बारे में भी सोचा।
एक दिन शाम को करवेऊ ने अपनी पत्नी से कहा, ‘अब हम नहीं रुक सकते। कल उसे हम मांग लाएंगे।’
दूसरे दिन उसने नौकरी भी छोड़ दी क्योंकि अब वह अपने को धनवान समझने लगा था।
एक दिन अखबार में उसने देखा-पेटाइटस डालेस में स्वेस भवन की नीलामी।
करवेऊ ने उस भवन की सबसे अधिक कीमत पंद्रह हजार फ्रैंक लगायी और पंद्रह दिन के अन्दर भुगतान कर सौदा कर लेने का वायदा किया।
अंततः आखिर वह दिन भी आ गया। बारह जनवरी को अच्छे-अच्छे कपड़े पहनकर दोनों पति-पत्नी ख़ुशी-ख़ुशी थाने गए और थानेदार के सामने हस्ताक्षर कर उस पॉकेट-बुक को वापस ले आए।
इतने दिनों की प्रतीक्षा के बाद मीठे फल की आशा में उन्होंने चर्च में जाकर ईश्वर का धन्यवाद किया। इसी खुशी में उन्होंने मौरीन को अपने यहां दावत भी दे डाली। दावत की समाप्ति के बाद उन्होंने यह खुशखबरी उसे भी सुनाई। फिर पॉकेट-बुक जिसे उन्होंने लोहे के संदूक में बंद कर रखा था, लाकर मौरीन को थमा दिया।
मौरीन ने पॉकेट-बुक पढ़ना शुरू किया।
‘रूसी और आिस्ट्रयन रेलवे।’ उसने कहा, ‘…पर मेरे भाई, छह माह हो चुके हैं यह कंपनी तो दिवालिया घोषित हो चुकी है। अगर तुम्हें कोई इसका तीन सौ फ्रैंक भी दे तो बिना समय गंवाए ले लो।’

अंग्रेजी से अनुवाद : रतन चंद ‘रत्नेश’


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