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मन लगाके…

Posted On January - 11 - 2017

सीताराम गुप्ता
Man Concentratingतुलसीदास जी लिखते हैं, ‘दुचित कतहुं परितोष न लहहीं।’ यानी चित्त के दुविधा में हो जाने पर कहीं संतुष्टि नहीं मिलती। अकसर हमारे चित्त की सभी वृत्तियां बिखरी हुई अवस्था में रहती हैं। इसी बिखराव के कारण मन चारों ओर भागता रहता है। किसी एक बिंदु पर स्थिर नहीं हो पाता। इससे ने तो किसी काम में पूर्ण सफलता मिल पाती है और न संतुष्टि। जीवन में संतुष्टि और किसी भी काम में पूरी सफलता के लिए मन की एकाग्रता अनिवार्य है। जब बार-बार हमारा ध्यान अनपेक्षित घटनाओं और विचारों पर केंद्रित होता है, तो अपेक्षित ज़रूरी कार्यों में मन नहीं लगता।
एकाग्रता क्या है? जब हमारे ध्यान की समग्रता किसी एक बिंदु, स्थान या विषय पर केंद्रित हो जाती है, वही एकाग्रता की स्थिति है। एकाग्रता का सबसे बड़ा लाभ ये है कि हम न केवल अपेक्षित दिशा में ध्यान लगा सकते हैं, बल्कि अनपेक्षित दिशाओं से ध्यान हटा भी सकते हैं। यही हमारा उद्देश्य है। चित्त वृत्तियों के बिखराव को रोककर एक स्थान पर, एक बिंदु पर केंद्रित करना।
सूर्य की रोशनी को जब मैग्नीफाइंग ग्लास के जरिये एक बिंदु पर केंद्रित किया जाता है तो उसकी ऊर्जा कागज या छोटे-मोटे तिनकों को जलाने में सक्षम हो जाती है और जलते हुए कागज या तिनकों से हम किसी भी चीज को जला सकते हैं। इसी तरह जब विचार रूपी किरणों को केंद्रित करके अंतर्गामी किया जाता है तो उससे एक नयी सृष्टि की खोज संभव है। एकाग्रता का एक और अर्थ भी है- अपनी ज्ञानेंद्रियों के क्रिया-कलापों को सीमित कर उनको बहिर्मुखी से अंतर्मुखी बनाना। हमारे मस्तिष्क में अरबों कोशिकाएं होती हैं जिन्हें न्यूरान कहते हैं। एकाग्रता से इन ज्ञान तंतुओं को किसी कार्य विशेष के लिए केंद्रित कर अपनी आंतरिक क्षमताओं का भरपूर उपयोग किया जा सकता है। हर व्यक्ति में विभिन्न कार्य करने की अपार क्षमता होती है, लेकिन कई बार सही संकल्प या एकाग्रता के अभाव में वह कुछ भी नहीं कर पाता। एकाग्रता विकसित करके न केवल अभूतपूर्व सफलता पायी जा सकती है, बल्कि असंभव से लगने वाले कार्यों को भी आसानी से किया जा
सकता है।
पहला कदम ‘निश्चय’ : निश्चय कर पहले एक काम का चुनाव करके उसे पूरा कर लीजिए। यह निश्चय ही एकाग्रता की शुरुआत है। ध्यान को अनेक चीजों, घटनाओं, इच्छाओं अथवा विचारों से समेट कर केवल और केवल एक वस्तु या विचार पर केंद्रित कर देना या लगा देना ही एकाग्रता है। इससे हमारी पूरी ऊर्जा एक बिंदु पर काम करने लगती है। ऊर्जा का बिखराव रुक जाने से काम में सफलता की उम्मीद बढ़ जाती है। एकाग्रता के अभाव में ऊर्जा कई स्थानों पर बंटी रहती है, जिससे कोई भी काम उत्कृष्टता से नहीं हो पाता।
सैकड़ों अधूरे कामों से अच्छा है कुछ पूरे काम
एकाग्रता के अभाव में काम में सफलता नहीं मिलेगी तो जीवन में संतुष्टि भी असंभव है। सैकड़ों आधे-अधूरे काम करने के बजाय कुछ महत्वपूर्ण काम पूरे कर लिए जायें, तो उनसे संतुष्टि का अहसास मिलता है। इसके फलस्वरूप जीवन में आनंद ही आनंद होगा। इसके लिए जरूरी है कार्यों में ध्यान, मन की एकाग्रता। एकाग्रता के संबंध में एक बात और अत्यंत महत्वपूर्ण है और वो ये कि हम केवल सकारात्मक विचारों व उपयोगी कार्यों पर ही स्वयं को एकाग्र करें। एक विद्यार्थी जहां पढ़ाई में एकाग्रता से सफलता प्राप्त करता है, वैज्ञानिक नये आविष्कार करता है, वहीं कोई चोर या लुटेरा भी एकाग्र होकर बड़ी तन्मयता के साथ अपने काम को अंजाम तक पहुंचाता है। नकारात्मक विचारों और अनुपयोगी निरर्थक क्रियाओं पर एकाग्रता हमारे खुद के लिए ही नहीं पूरे समाज, राष्ट्र व मनुष्यता के लिए घातक है।
एकाग्रता बढ़ाएं कैसे
11101cd _girlएकाग्रता हमारा खुद का निर्णय होता है। बलपूर्वक किसी को एकाग्रता के लिए विवश नहीं किया जा सकता। जिस तरह एक पशु को नदी तक तो ले जाया जा सकता है, लेकिन उसे पानी पीने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। उसी तरह एक बच्चे को डरा-धमकाकर पढ़ने के लिए बिठाया तो जा सकता है लेकिन उसे पढ़ने के लिए एकाग्र नहीं किया जा सकता। एकाग्रता के लिए अपेक्षित सकारात्मक परिवेश अनिवार्य है।

  • मौन, श्वास के विभिन्न अभ्यास, निश्चलता और एकांत ऐसे तत्व हैं, जो एकाग्रचित बनाने में सहायक हैं।
  • पठन-पाठन, सत्संग-स्वाध्याय, योगाभ्यास, खेलकूद और विभिन्न कलाओं के अभ्यास से भी एकाग्रता बढ़ती है।
  • जो लोग खेलकूद में भाग लेते हैं, उनकी किसी कार्य को ध्यानपूर्वक करने की क्षमता दूसरों से ज्यादा होती है।
  • एक कलाकार की एकाग्रता भी सामान्य व्यक्ति के मुकाबले में अच्छी होती है।
  • जब हम पूरी तरह से थक जाते हैं तो आराम करने के बाद किसी नये काम को बेहतर तरीके से करना ज्यादा संभव होता है। एकाग्रता का अभ्यास भी अनिवार्य है और लगातार अभ्यास से उत्कृष्टता आती जाती है।

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