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यहां दीवारें नहीं रोक पाती ज्ञान की रोशनी को

Posted On January - 5 - 2017

Sp1सोनीपत जिला जेल

तो इसकी शुरुआत कैसे हुई जेलर साहब? यह सवाल सुनकर जेल सुपरिंटेंडेंट जयकिशन छिल्लर कुछ सोचने लगते हैं। जाहिर है कोई मुहिम महज एक-दो महीने या फिर साल में फलीभूत नहीं हो जाती है, उसके लिए निरंतर काम करना पड़ता है जोकि जेलर छिल्लर ने भी किया।
वे बताने लगते हैं, साल 2003-04 मैं भिवानी की जेल में डिप्टी जेल सुपरिंटेंडेंट के पद पर तैनात था। मेरे रहते हुए एक रिटायर्ड बीईओ (ब्लॉक एजुकेशन ऑफिसर) संगीन अपराध में जेल में पहुंचा था। उनके केस का ट्रायल लंबा था, तो मुझे एक दिन ख्याल आया, क्यों ना उनके अनुभव का लाभ कैदियों के लिए लिया जाए। इसका प्रस्ताव मैंने रिटायर्ड बीईओ के सामने रखा, तो उन्होंने इसे मंजूर कर लिया। बस बात बन गई थी। हमने कुछ कैदियों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया।

तो रिटायर्ड बीईओ ने कर दिया जाने से मना
छिल्लर बताते हैं, रिटायर्ड बीईओ को यह काम इतना पसंद आया कि उन्होंने अपने परिजनों को केस की पैरवी करने के लिए मना कर दिया, ताकि वे अधिक से अधिक समय इस जेल के कैदियों को पढ़ाने के लिए दे सकें। छिल्लर कहते हैं, उस व्यक्ति की शिक्षा के प्रति लगन ने मुझे इतना प्रोत्साहित कर दिया कि मैंने ठान लिया, आगे जिस भी जेल में रहूंगा, शिक्षा की ज्योत बुझने नहीं दी जाएगी।

सोनीपत जिला जेल में लगी क्लास। सभी फोटो हप्र

सोनीपत जिला जेल में लगी क्लास। सभी फोटो हप्र

और 2009 में आ गए सोनीपत
बकौल छिल्लर, साल 2009 में मेरा ट्रांसफर सोनीपत जेल में हो गया। यहां आकर भी मैंने इस मुहिम को जारी रखते हुए अपने सीनियर से इस बाबत चर्चा की। इसके बाद धीरे-धीरे काम शुरू कर दिया। शुरुआत में यह मिशन गति नहीं पकड़ पाया और मेरा तबादला हो गया। छिल्लर कहते हैं, करीब 3 साल बाद पदोन्नति मिलने पर मेरा तबादला फिर सोनीपत जिला जेल में हो गया। वे एसपी बनकर लौटे थे। मन में वह पुरानी कसक थी, तो आते ही साथियों से शिक्षा मिशन की चर्चा की और हत्या के केस में बंद एक टीचर से मदद मांगी। वह टीचर जेल में रहते हुए तनाव का शिकार हो गया था। उसे आत्महत्या के विचार आने लगे थे। छिल्लर ने उसे योग और अध्यात्म के जरिये मुख्यधारा में लौटने को प्रेरित किया। इसी दौरान उस सजायाफ्ता टीचर ने तय किया कि वह अपनी बाकी की सजा इसी जेल में दूसरे कैदियों को पढ़ाते हुए पूरी करेगा।

कौन-कौन क्या पढ़ा रहा
इस मिशन की अनूठी बात यह है कि इसमें कैदियों के साथ-साथ जेल के आला अफसर भी शिक्षा देने में जुटे हैं। तकनीकी कोर्स के लिए तो आईटीआई से शिक्षक आते हैं, लेकिन 10 वीं,12 वीं तथा ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए 8 कैदी दूसरे साथियों को पढ़ा रहे हैं। कैदियोंं में (बीए/बीएड जेबीटी) कुलमीत, (बीए) संदीप, (एमए भूगोल) विकास कुमार, (बीए) विक्रम, (एमए हिंदी) सतीश कुमार, (बीए गणित) राकेश कुमार, (बीएससी) जरनैल सिंह तथा (बीए) संदीप कुमार शामिल हैं। वहीं जेल स्टाफ से डिप्टी जेल सुपरिंटेंडेंट रामचंद्र अंग्रेजी पढ़ाते हैं, वार्डर मांगेराम इतिहास और हिंदी के शिक्षक का दायित्व निभा रहे हैं, डिप्टी जेल सुपरिंटेंडेंट सचिन अर्थशास्त्र पढ़ा रहे हैं, तो सहायक जेल अधीक्षक शिवकुमार राजनीति शास्त्र पढ़ाने का जिम्मा उठाए हुए हैं। फिलहाल, सोनीपत जेल में 4 क्लास रूम नियमित रूप से चलते हैं। इनमें कुर्सी-डेस्क से लेकर ब्लैक बोर्ड तक सारी सुविधाएं हैं। कैदी कुलमीत कहते हैं, जेल प्रशासन का प्रयास काबिले तारीफ है। यहां दीवारों के पीछे जिंदगी संवरती हैं।

इग्नू, ओपन स्कूल से मिली मान्यता
आरंभ में यह मिशन साक्षरता से शुरू किया गया। लेकिन बाद में यहां नेशनल ओपन स्कूल का सेंटर शुरू कराकर 10वीं की पढ़ाई शुरू कराई गई। ताकि पढ़ने वालों को प्रमाणपत्र भी मिलें। यह कोर्स शुरू होने पर आंकड़ा इतना बढ़ा कि प्रशासन ने इसे 12वीं तक के कोर्स में तब्दील कराया और इसके साथ ही यहां इंदिरा गांधी ओपन यूनिवर्सिटी (इग्नू) के कोर्स शुरू किए गए।

किस कोर्स में कितनी सीटें
इलेक्ट्रीशियन कोर्स, कारपेंटर की 30 सीटें, प्लंबर के लिए 60 सीट, एसी और रेफ्रिजरेशन कोर्स में 30 सीट तथा वेल्डिंग में 60 सीट हैं। ये सभी सीट हर वर्ष फुल रहती हैं। यहां से अब तक 330 इलेक्ट्रीशियन, 17 कारपेंटर, 288 प्लंबर और 299 वेल्डिंग का कोर्स पूरा कर चुके हैं।

पुरुषोत्तम शर्मा, सोनीपत


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