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राहिल के जरिये पाक के मंसूबे

Posted On January - 10 - 2017

11001cd _Gen_Raheel_Sharif_and_saud_defence_minister_550x300रिटायर्ड जनरल राहिल शरीफ सऊदी अरब उमरा के वास्ते गये हैं या नई नौकरी पक्की करने? पाकिस्तान इन दिनों ऐसी ही बहस में व्यस्त है। राहिल शरीफ रियाद में देखे गये हैं। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस और प्रतिरक्षा मंत्री मोहम्मद बिन सलमान ने दिसंबर 2015 में आतंकवाद से लड़ने के वास्ते पैंतीस इस्लामिक देशों का एक नया मोर्चा ‘इस्लामिक अलायंस’ बनाने का ऐलान किया था। अब यह 39 मुसलमान देशों का संगठन है। ‘इस्लामिक अलायंस’ को पहले ‘अंसार अल्लाह’ से लड़ना था। उत्तरी यमन का यह गुरिल्ला संगठन ‘हौती’ के नाम से भी कुख्यात है। बाद में सऊदी सरकार के निशाने पर इराक़ में सक्रिय ‘पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्स’ (पीएमएफ) और लेबनान का सबसे क्रूर संगठन ‘हिज़बुल्ला’ आ गये। ये तीनों शिया संगठन हैं, जिनकी वजह से सऊदी अरब सवालों के घेरे में था कि 39 देशों के ‘इस्लामिक अलायंस’ को वह अपने मकसद के लिए इस्तेमाल कर रहा है।
सऊदी अरब ने इस बार पैंतरा बदला है कि ‘इस्लामिक अलायंस’, ‘आइसिस’ के विरुद्ध भी युद्ध लड़ेगा। ऐसा इसलिए कहा गया ताकि वह थोड़ा निष्पक्ष दिख सके। 57 सदस्यीय आर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) के सभी सदस्य यदि ‘इस्लामिक अलायंस’ जैसे मोर्चे में नहीं हैं तो इसका अर्थ यह निकाला जाना चाहिए कि मुसलमान देश सऊदी अरब के उद्देश्यों पर संदेह करते हैं।
रिटायर्ड जनरल राहिल शरीफ को अनापत्ति प्रमाण पत्र देने के वास्ते पाक सरकार तैयार है। इस तरह का संकेत पाकिस्तान के वित्त मंत्री इशाक दार ने सोमवार को दिया है। समां टीवी के एक शो में वित्त मंत्री दार ने कहा कि जनरल साहब को ‘एप्रूवल’ की ज़रूरत पड़ेगी। पाकिस्तान में नियम है कि सेना से अवकाश ग्रहण करने के बाद दो साल तक नौकरी नहीं की जा सकती। इस प्रकरण के बाद से ही पता चला कि पाकिस्तान आर्मी से रिटायर बहुत सारे अफसर चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, तुर्की जैसे कई सारे देशों की सेना और उनकी सुरक्षा एजेंसियों में ‘मिशनरी’ की तरह काम कर रहे हैं।
इसका मतलब यह हुआ कि राहिल शरीफ भी सऊदी अरब के लिए भाड़े के सैनिक बनेंगे। पाक वित्त मंत्री दार ने स्वीकार किया कि राहिल शरीफ जब पाक सेनाध्यक्ष थे, उस दौरान सऊदी अरब ने उन्हें यह ऑफर दिया था। सऊदी अरब पहले भी पाक सैन्य कमांडरों को ऐसे चुग्गे फेंकता रहा है। जनरल मुशर्रफ को सऊदी अरब ने जब शरण दी, तब यह साफ हुआ था कि पाक सेना को बहुत सारे निर्देश सऊदी सरकार देती रही है। पाक नेता भी गड़बड़ी के समय शरण लेने सबसे पहले सऊदी अरब जाना सुरक्षित समझते हैं। नवाज़ शरीफ उसके सबसे बड़े नज़ीर हैं, जिन्होंने निर्वासन का सर्वाधिक समय सऊदी अरब में गुज़ारा है।
मगर, राहिल शरीफ के केस में ऐसा क्यों हुआ कि वह नीयत बांध कर उमरा के लिए चले और नई नौकरी के वास्ते सऊदी सरकार से बातचीत करने में व्यस्त हो गये। पाकिस्तान के पूर्व सेनाध्यक्ष का यह क़दम इस्लामिक दीन के कितना विपरीत है, यह बहस का विषय क्यों नहीं होना चाहिए? राहिल शरीफ ‘इस्लामिक अलायंस’ से जुड़ें, इस वास्ते पाक सरकार द्वारा प्रचंड दिलचस्पी लेने की क्या वजह हो सकती है? संभव है ‘इस्लामिक अलायंस’ का कमांड संभालने के बाद राहिल शरीफ कश्मीरी अलगाववादियों को दाना-पानी इस नये फ्रंट के माध्यम से देने लगें। यों भी, राहिल शरीफ को प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ दूसरे इलाके में व्यस्त रखना चाहते हैं, ताकि उनकी दबी हुई राजनीतिक महत्वाकांक्षा परवान न चढ़े। कई दफा पाकिस्तान में मशहूर होते सेनाध्यक्ष में लोग शासनाध्यक्ष का अक्स ढूंढने लगते हैं।
सऊदी अरब आइसिस का विस्तार रोकने के बहाने जनरल राहिल शरीफ को जिस तरह से ‘इंगेज’ करना चाह रहा है, उससे उसका एक दूसरा उद्देश्य पूरा हो रहा है। पिछले कुछ महीनों से पाकिस्तान, ईरान के क़रीब जा रहा था। इस समय रूस, चीन, ईरान, पाकिस्तान समेत सेंट्रल एशियाई देशों का जो नया गठजोड़ बन रहा है, उसमें ‘इस्लामिक अलायंस’ के बरास्ते सेंध लगना संभव है। सऊदी अरब कभी नहीं चाहेगा कि पाकिस्तान उसके प्रभाव क्षेत्र से बाहर निकल जाए।
कोई 80 लाख पाकिस्तानी देश से बाहर मुख्तलिफ़ मुल्कों में रह रहे हैं। इनमें सबसे अधिक सऊदी अरब में 22 लाख पाकिस्तानी प्रवास कर रहे हैं। उसके बाद यूएई है, जहां तेरह लाख पाकिस्तानी प्रवासी हैं। सऊदी अरब एक तरह से पाकिस्तानियों का दूसरा घर है, जहां उन्हें अपना मुस्तकबिल दिखता है। सच यह है कि ईरान से नज़दीकियां सऊदी अरब के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। उसके लिए ईरान-पाकिस्तान के बीच दुरभि-संधि तोड़ना ज़रूरी है। राहिल शरीफ की कमान में ‘इस्लामिक अलायंस’ कभी कोई कार्रवाई ईरान के विरुद्ध करता है तो पक्की बात है कि तेहरान-इस्लामाबाद के बीच तोपें तनेंगी। नवाज़ शरीफ की कूटनीति के लिए मुश्किल यह है कि वे बगलगीर किससे हों। ईरान से बिगाड़ते हैं तो चीन और रूस नवाज़ शरीफ से नाखुश हो सकते हैं।
इन दिनों ‘आतंकवाद’ एक ऐसा शब्द बन चुका है, जिसका इस्तेमाल शासक अपने विरोधियों को निपटाने के वास्ते करने लगे हैं। यह दुनिया के तमाम मुल्कों में हो रहा है। उत्तरी नाइजीरिया में पिछले दिनों ‘इस्लामिक अलायंस’ ने सर्जिकल स्ट्राइक की, जिसमें बहुत सारे शिया मारे गये। इस हमले की जांच के लिए ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने अपने नाइजीरियाई समकक्ष पर दबाव बनाया ताकि सऊदी अरब ‘एक्सपोज’ हो सके। पिछले साल नवंबर में सऊदी गृह मंत्रालय ने बारह हिज़बुल्ला नेताओं को आतंकी निगरानी सूची में डाला। इससे

पुष्परंजन

पुष्परंजन

ईरान भड़का हुआ था। इराक़ी प्रतिरक्षा कमेटी के अध्यक्ष हकीम अल जमाली ने कहा कि यह सांप्रदायिक अलायंस है, जिसका इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं है। इराक़ी प्रधानमंत्री हैदर अल एबादी ने टिप्पणी की कि ‘इस्लामिक अलायंस’ सिर्फ़ कागज़ में बना रखा है। हमने इस संगठन में शामिल कई सरकारों से बात की, उन्होंने न तो कोई आर्थिक सहयोग दिया है, न ही वे कोई सैन्य मदद ‘इस्लामिक अलायंस’ को देना चाहते हैं।
2 जनवरी 2016 को सऊदी अरब ने 47 लोगों को आतंकवाद में लिप्त होने के आरोप में मौत की सज़ा दी। इनमें शिया मत को मानने वाले शेख़ निम्र-अल निम्र को मारने को लेकर तेहरान और रियाद के बीच ठन गई। जवाब में सऊदी अरब ने आंकड़े देते हुए कहा कि ईरान हमसे अधिक आतंकवाद के नाम पर लोगों को मारता है। ‘स्ट्राइक’ चाहे सऊदी कैंप करे या ईरान, इस तरह की सैन्य कार्रवाई की निष्पक्षता पर सवालात होते रहेंगे। पाकिस्तान को बस एक मंच चाहिए, जिसके बहाने वह यह दिखा सके कि आतंकवाद के विरुद्ध छद्म युद्ध में रावलपिंडी भी शामिल था!


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