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लघु कथा

Posted On January - 3 - 2017

नजदीक,  बहुत नजदीक

मधुदीप
29 may 3गांव से दो किलोमीटर दूर इस सुनसान अड्डे पर बस ने विजया को छोड़ा तो सर्द शाम का धुंधलका छाने लगा था। गांव से उसका भाई उसे लेने अवश्य आया होगा, इस उम्मीद से उसने इधर-उधर देखा मगर दूर-दूर तक किसी की कोई आहट नहीं थी। उसने पर्स से मोबाइल निकाला तो उसकी स्क्रीन भी ग्रे थी। चलने से पहले शायद वह उसे चार्ज करना भूल गई थी।
पांच-सात मिनट गंवाने के बाद उसने बैग को कांधे पर टांगकर पांवों को गांव की ओर जाने वाली पगडंडी पर डाल ही दिया। आखिर वह शहर के एक नामी महिला कॉलेज की हॉकी टीम की सबसे तेज फॉरवर्ड खिलाड़ी और गर्ल्स होस्टल की दबंग छात्रा थी। मन में हौसला था और आत्मविश्वास पांवों को गति दे रहा था। मगर फिर भी सलामुद्दीन की बगीची तक पहुंचते-पहुंचते आसमान से तेज गति से अंधेरा उतर आया तो मन में घबराहट होने लगी।
अपने ही कदमों की आहट अब उसे पराई लग रही थी। वह घबराहट में बार-बार पीछे मुड़कर देख रही थी, पगडंडी सुनसान पड़ी थी। गांव अभी बहुत दूर था।
‘तू रजिया सुल्ताना है…’ उसने मुट्ठी हवा में लहराकर पांव आगे बढ़ा दिए।
‘तू झांसी की रानी है…’ उसके आगे बढ़ते पांवों में तेजी आ गई।
‘तू भारत की वीर बेटी है…’ हां! अब गांव नजदीक, बहुत नजदीक था।


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