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वक्त का फैसला

Posted On January - 10 - 2017
चित्रांकन : संदीप जोशी

चित्रांकन : संदीप जोशी

लघु कथा

प्रेम विज
बारात के बैंड-बाजे की आवाज दूर से आ रही थी। आवाज सुनते ही सभी तरफ चहल-पहल आरंभ हो गई थी। दीवान जी गुलाबी पगड़ी बांधे तेजी से हलवाई की तरफ बढ़ रहे थे, यह जानने के लिए कि खाना तैयार हो गया है या नहीं? सभी सगे-संबन्धी खुशी से झूम रहे थे। गली के लोग बारात के स्वागत के लिए इकट्ठे हो चुके थे। दीप्ति के भाई कभी टेबलों की सजावट देखते तो कभी काम करने वालों को अच्छी तरह से काम करने के निर्देश दे रहे थे। घर की औरतें रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर तितलियों की भांति घूम रही थी। ज्यों-ज्यों बाजे की आवाज नजदीक आने लगी, त्यों-त्यों घरवालों की धड़कनें तेज होने लगीं। दीप्ति भी अपने भावी पति की झलक पाने का इंतजार कर रही थी। सभी को अपनी-अपनी जल्दी थी। बारात गली के समीप पहुंच गयी थी। बाजे की आवाज इतनी ऊंची थी कि एक-दूसरे का सिर्फ मुंह हिलता नजर आ रहा था। बाजे वालों को जब भंगड़ा डाल रहे लड़के पैसे देते तो वे और ऊंची आवाज से बाजा बजाने लगते। भंगड़ा डालने वालों की चाल धीमी पड़ चुकी थी। कुछ बाराती तो पेट पर हाथ रखकर भूख का संकेत कर रहे थे। इधर मिलनी शुरू हो गई। कुछ बाराती खाना खाने निकल गये थे। पण्डित जी ने लड़के को घोड़ी से उतारने के लिए कहा। दूल्हा जो तलवार पकड़े बैठा था, उसने एक बार, दूसरी बार नीचे उतरने की कोशिश की लेकिन वह उतरने में सफल ना हो सका। तीसरी बार उतरने की कोशिश में वह नीचे गिर पड़ा। ज्यों ही यह दृश्य दीप्ति ने खिड़की से देखा तो उसे यह समझते देर नहीं लगी कि दूल्हा नशे में डूबा हुआ है। वह खिड़की के हटकर भीतर चली गई। दीवान साहिब भी भीतर आ गये। दीप्ति ने सोचा यदि इस समय चुप रही तो सारी उम्र पछताना पड़ेगा। चेहरे से लाज के पर्दे को उठाते हुए वह अपने पिता के पैरों पर गिर पड़ी और रोने लगी। पिता ने उसे उठाकर गले से लगाया और इससे पहले कि वह बोलती, पिता खुद ही गरज उठे ‘बेटी घबरा मत, यह शराबी तुम्हारा पति नहीं बनेगा।’ परिवार के सभी लोग घर में इकट्ठे हो गये। उधर, बाहर दूल्हे को थामे उसके रिश्तेदार दुल्हन का इंतजार कर रहे थे। इतने में दुल्हन का सारा परिवार अंदर से बाहर आया और बारात के आगे हाथ जोड़ दिये। बारात को शराबी दूल्हे के संग बैरंग लौटना पड़ा।


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