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व्यवहार की शिक्षा

Posted On January - 11 - 2017

एकदा
दो संतों के मध्‍य चर्चा हो रही थी कि औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद कैसे तय किया जाए कि कौन विद्यार्थी प्राप्‍त की गई शिक्षा को अपने जीवन में व्‍यवहार में ला रहा है। उसी अवधि में उनके दो पुराने शिष्‍य वहां पधारे। संतों ने उनसे अपने सम्‍मुख बैठने का आग्रह किया। एक शिष्‍य तत्‍काल, बिना सोचे-समझे उनके सामने जबकि दूसरा कुछ संकोच, सोच-विचार के बाद उनके चरणों के पास बैठ गया। संतों ने शिष्‍यों से उनको परोसा गया भोजन ग्रहण करने को कहा। पहला शिष्‍य चुपचाप भोजन करने लगा जबकि दूसरे ने पहले अपने गुरुओं को पूछा-गुरुजी क्‍या आप लोगों ने भोजन ग्रहण कर लिया? गुरुद्वय ने हां में उत्‍तर दिया तब वह भोजन करने बैठा। शिक्षा के महत्‍व को जीवन में कैसे उतारें, आज इस प्रश्‍न का सर्वोत्‍तम उत्‍तर संतों को मिल गया। शिष्‍यों के व्‍यवहार के आकलन के बाद उन्‍होंने सिद्ध किया कि कोई वस्‍तु, सु‍विधा तथा सेवा सहज उपलब्‍ध होने के बाद भी जो इन्‍हें लेने में संकोच करेगा तथा जो जनकल्‍याणार्थ अपना सर्वस्‍व झोंकने में तनिक भी संकोच न करेगा वही मानव औपचारिक शिक्षा को जीवन-शिक्षा में परिणत कर सकेगा।                                    प्रस्तुति : विकेश कुमार बडोला


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