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शमशेरियत की प्रतिनिधि कविताएं

Posted On January - 3 - 2017

 कालजयी रचना

सुभाष रस्तोगी
10301cd _image (001)हिन्दी के अपांक्तेय कवि शमशेर बहादुर सिंह (1911-1993) का जन्म देहरादून (उ.प्र.) में हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा देहरादून में हुई। शमशेर ‘रूपाभ’ इलाहाबाद में कार्यालय सहायक (1939) तथा ‘कहानी’ और ‘नया साहित्य’ के संपादक मंडल में रहे। इन्होंने ‘माया’ में सहायक संपादक (1948-1954) के तौर पर व ‘मनोहर कहानियां’ में संपादन सहयोग दिया। शमशेर बहादुर सिंह ने दिल्ली विश्वविद्यालय की एक महत्वपूर्ण परियोजना के तहत उर्दू-हिन्दी कोश का संपादन किया तथा प्रेमचंद सृजनपीठ विक्रम विश्वविद्यालय (मध्य प्रदेश) के अध्यक्ष (1981-85) रहे।
मुक्तिबोध की तरह शमशेर बहादुर सिंह की कविता की कोई परंपरा नहीं है। उन्होंने संवेदना के उन इलाकों में कविता का संधान किया जिन पर अधिकांश हिन्दी कवियों ने चलने का जोखिम कम ही उठाया। विचारों से मार्क्सवादी कवि शमशेर की गणना प्रयोगवाद के उन्नायक कवियों में होती है, लेकिन वे किसी लीक से बंधकर नहीं चले। उनके काल के भाल पर दर्ज आठ कविता-संग्रह हमें उपलब्ध हैं जो इस प्रकार हैं— ‘कुछ कविताएं व कुछ और कविताएं’, ‘चुका भी हूं नहीं मैं’, ‘इतने पास अपने’, ‘उदिता-अभिव्यक्ति का संघर्ष’, ‘बात बोलेगी’, ‘काल तुझसे होड़ है मेरी’, ‘टूटी हुई बिखरी हुई’ तथा ‘कहीं बहुत दूर से सुन रहा हूं।’ डॉ. नामवर सिंह द्वारा संपादित ‘शमशेर बहादुर सिंह की प्रतिनिधि कविताएं’ इसलिए एक महत्वपूर्ण संग्रह है क्योंकि इसमें उनके रचना-काल के क्रमानुसार 101 ऐसी कविताएं संकलित हैं, जिसमें उनकी हर दौर की, हर रंग की कविताएं संकलित हैं।’ ‘शमशेर की शमशेरियत’ नाम से इसमें एक भूमिका भी है जो शमशेर की कविता के मूल स्वभाव को समझने में हमारी मदद करती है।
शमशेर बहादुर सिंह की कविता के बारे में अकसर यह कहा जाता है कि उनकी कविताओं का शिल्प ऊबड़-खाबड़ और खुरदुरा है। यह भी कहा जाता है कि शब्दों और बिंबों का चयन सावधानी से नहीं करते हैं। लेकिन ऐसा है नहीं। यह बात अलग है कि उनकी कविता का शिल्प परंपरित नहीं है। वे एक-एक शब्द, उपनाम का प्रयोग बहुत सावधानी से करते हैं। चित्रात्मकता उनकी कविता का एक बड़ा गुण है। इसी सच्चाई की तसदीक करती उनकी 1937 में लिखी एक कविता की यह पंक्तियां देखें— ‘स्थिर है शव-सी बात/ लटका है पश्चिम के घर में/ आधा चांद कटोरा कांसे का-सा/ सोते की-सी नीली रात।’ (पृ. 14)। सांगीतिक मति-गति भी उनकी कविता में खूब है। देखें उनकी एक कविता की यह पंक्तियां— ‘सहन सहन बहता है वायु/ मुक्त उसासों का स्वर भर/ सम्हल/सम्हल कर झुकती डाल/ आकुल-उर तरु का मर्मर।’ (पृ. 11)।
शमशेर की कविता पर यह आरोप भी लगाया जाता है कि वे कुंठित प्रेम के कवि हैं। यह सही है कि उनका विवाह बहुत कम उम्र में हुआ था और छह-सात साल बाद उनकी पत्नी का निधन भी हो गया था, इसलिए उनकी कविता में अकेलेपन का अवसाद होना स्वाभाविक है। नामवर सिंह की यह मान्यता और तलब है कि शमशेर ने ‘अकुंठ मन से शरीर का उत्सव रचा है। शमशेर के लिए तो सौंदर्य, एक ‘एक ठोस बदन अष्टधातु का सा’ है, जिसमें जंघाएं ठोस दरिया ठैरे हुए से’ (पृ. 184) और उनकी पहली प्रेमिका ‘आइने की तरह साफ’ है और ‘बदन के माध्यम से ही बात करती है’ और उसका कांसे का चिकना बदन हवा में हिल रहा है,’ (पृ. 185)। यहां नामवर सिंह की टिप्पणी है, ‘हिन्दी कविता में कहां है ऐसी सघन ऐंद्रियता।’ (पृ. 7)।
लेकिन शमशेर केवल सौंदर्य की मांसलता के कवि नहीं हैं। अपने एक गीत में वे मजदूरों किसानों के ताप में अपने विरह-मिलन के पाप जलाने का आह्वान करते हैं।
सच तो यह है कि मार्क्सवाद और कम्युनिज्म के प्रति उनकी एक आस्था अडिग है। अपनी काव्य-यात्रा के शुरू में शमशेर का मानना था ‘वाम वाम वाम दिशा/ समय साम्यवादी’ (पृ. 47) और बहुत बाद में लिखी। उन्होंने अपनी एक कालजयी कविता ‘काल, तुम से होड़ है मेरी’ में स्वीकार किया, ‘क्रांतियां, कम्यून/ कम्युनिस्ट समाज के/ नाना कला विज्ञान और दर्शन के/ जीवंत वैभव से समन्वित/ व्यक्ति मैं।’ (पृ. 172)
इसी कविता में कवि की होड़ सिर्फ काल से है। काल का भय उसे कतई भी नहीं क्योंकि काल अगर अपराजित है तो कवि भी अपराजित है। देखें यह पंक्तियां जो काबिलेगौर हैं, ‘काल/ तुझ से होड़ है मेरी : अपराजित तू-/ तुझमें अपराजित मैं वास करूं।’ (पृ. 172)
शमशेर जी की एक प्रसिद्ध कविता है ‘बैल’। इस कविता में कवि ने इस दीगर सच्चाई को रेखांकित किया है कि सर्वहारा और बैल की नियति एक जैसी है, दोनों ही घानी में बीज की तरह कसकर दबाकर पेरा जाता है, ‘मुझे वह इस तरह निचोड़ता है जैसे/ घानी में एक-एक बीज कसकर/ दबाकर पेरा जाता है।’
शमशेर जी स्वयं को निराला, मुक्तिबोध और अज्ञेय के बहुत निकट पाते हैं। निराला तो उनके लिए ‘सघनतम की आंख हैं’। देखें इसी सत्य की तसदीक करती यह पंक्तियां ‘भूलकर जब राह जब-जब राह भटका मैं/तुम्हीं झलके, हे महाकवि/ सघन तम की आंख बन मेरे लिए’ (पृ. 21)। शमशेर जी की शमशेरियत देखनी है तो उनकी ‘बात बोलेगी’ कविता देखें जहां कवि सबसे अलग खड़ा दिखाई देता है, ‘बात बोलेगी/ हम नहीं/ भेद खोलेगी/ बात ही।’


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