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संरक्षक बनने की मजबूरी

Posted On January - 9 - 2017

 तिरछी नज़र

हेमन्त कुमार पारीक
निवर्तमान होने वाले और नहीं होने वाले सभी के लिए खुशखबरी है। पर एट्टीफाइव, टेन और फाइव परसेन्ट आरक्षण है। एट्टीफाइव उनके लिए जो आज की तारीख में निवर्तमान हो गए हैं। दस परसेन्ट उनके लिए जो वी.आर.एस. का मन बना रहे हैं और पांच परसेन्ट उनके लिए जो निवर्तमान नहीं होना चाहते लेकिन उनका हाथ पकड़कर उन्हें चौराहे पर घसीटते हुए इस पद की कुर्सी पर फेंका जा रहा है। यह एक ऐसा पद है जिसके लिए फेंकने वाला कह रहा है-मान न मान तू मेरा मेहमान! अधिकार के नाम पर खाली पीपे-सा बजने वाला है यह पद। ऐसा है कि उसे कुर्सी तो मिलती है मगर उसमें न आग है और न पानी। और गले में वे सूखी मालाएं डाली जाती हैं जो दूसरों के गलों के कई फेरे लगा चुकी होती हैं।
इस दौड़ में स्वेच्छा से भागने वाले एक शख्स मन्नू ही मिले। मन्नू यानी हमारे मित्र के पिताश्री। कहने लगे-तू तो मेरे बेटे से बढ़कर है। कुछ मुझे भी बना दे। घर में टाइम नहीं कटता। गर खाली बैठता हूं तो बुरे-बुरे ख्याल आते हैं। ‘मसलन?’ मैंने पूछा तो आंखों में आंसू भरकर बोले-मसलन बांस, बल्ली, रस्सी, कपड़ा, भैंसा और यमराज। अब बीवी की आंखों में प्यार ही नहीं दिखता। जब देखो खांव-खांव करती रहती है। तुम सोच नहीं सकते और मैं बता नहीं सकता। इच्छा होती है कि कटोरा लेकर शनि मंदिर में बैठ जाऊं। कम से कम काम तो मिलेगा। कुछ मिले न मिले पर नाम तो मिलेगा।
मैंने कहा-आप मेरे दोस्त के पिता हैं। उसके लिए नहीं तो मेरे लिए आदरणीय हैं। आजकल शौचालय और डिजिटल दो चीजें हाई पे हैं। डिजिटल से आपका कोई लेना-देना नहीं है। हालांकि आज तो हर आदमी डिजिट है। और अभी आप इस दुनिया में हैं, इसलिए मेरी आत्मा गवारा नहीं करती कि आप डिजिटल हो जाएं। मैं तो आपके लिए सोचता हूं, जीवेम शरद: शतम!’ वे आहत हो गए-बेटा, ऐसा शाप मत दे!’ ‘तो फिर शौचालय वाला आइडिया है। स्टेशन पर एक शौचालय रिक्त पड़ा है। आपका स्टेच्यू बनवाकर लगवा देता हूं। आजकल जिन्दा इनसान भी स्टेच्यू बनकर तनकर खड़ा है। उसे भरोसा नहीं है कि उसके जाने के बाद उसकी औलाद अंतिम इच्छा पूरी करेगी।’
‘मतलब?’ उनकी आंखों में चमक आ गयी। मैंने कहा-सबसे बढ़िया जगह है। कोई ‘इफ’ एण्ड ‘बट’ वाली बात नहीं है। चौराहे पर लगे स्टेच्यू धूल खाते हैं। अगर आपके स्टेच्यू के पैरों पर साबुन रगड़ दी जाए तो रोज सुबह सैकड़ों आपके पैरों का स्पर्श करेंगे।’ वे बोले-यह तो बाद की बात है। अभी के लिए?’ मैंने कहा-संरक्षक का पद खाली है। कम से कम लोग पांव तो छुएंगे। सोचिए आप कितने भाग्यशाली हैं कि आडवाणी, मुलायम और ओबामा की तरह लाइन में नहीं हैं। अगर समझ में आए तो चले आइएगा।


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