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सपनों और धुंध के बीच जीवन

Posted On January - 3 - 2017

10301cd _img022पिछले लगभग ढाई दशक से साहित्य की दुनिया में लगातार सक्रिय मनोज कुमार प्रीत का पहला परिचय तो उनका रचनाकर्म है। जिसमें उनके पांच चर्चित कहानी संग्रह ‘हारे हुए चेहरे’, ‘यातनागृह’, ‘स्मृतियों के खंडहर’, ‘दर्पण अपना-अपना’ व ‘शून्य से निन्यानवे’ तक-शामिल हैं। इसके अलावा उनकी आधा दर्जन पुस्तकें शिक्षा व भाषा विषयों पर प्रकाशित हुई हैं। उनकी पुस्तक ‘केरल धाम-स्वर्ण ग्राम’ को भाषा विभाग पंजाब द्वारा सर्वोत्तम पुस्तक पुरस्कार दिया गया था। केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने भी उनके रचनाकर्म को सम्मान दिया है। साहित्य सृजन से इतर उनका दूसरा रचनात्मक परिचय यह है कि पंजीकृत साहित्यिक संस्था- प्रीत साहित्य सदन, लुधियाना के बैनर तले वे स्थापित व नवोदित रचनाकारों की रचनाओं का विमोचन, चर्चा व काव्य गोष्ठियां दो दशक से आयोजित करते आ रहे हैं। सही मायनों में नये रचनाकारों को मंच प्रदान करने की सार्थक कोशिश हुई है।
यूं तो मनोज प्रीत निरंतर अध्ययनशील रहते हैं। लगातार पुस्तकों के विमोचन, चर्चा व गोष्ठियों का सिलसिला जारी रहता है।  मनोज प्रीत ने हाल ही में पढ़ी पुस्तक का जिक्र चलने पर पंजाब के चर्चित साहित्यकार डॉ. हरमहेन्द्र सिंह बेदी की काव्य रचना ‘धंुध में डूबा शहर’ का जिक्र किया। प्रतिष्ठित शिक्षाविद् एवं पंजाब में हिंदी के नामवर हस्ताक्षर डॉ. हरमहेंद्र सिंह बेदी गुरु नानक विश्वविद्यालय में हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेनानिवृत्ति के बाद पूर्णकालिक साहित्य साधन में रत हैं और नई पीढ़ी के रचनाकारों को दिशा देने के प्रयास में जुटे हैं। ‘धुंध में डूबा शहर’ वास्तव में जीवन के तमाम धूप-छांव के रंग उकेरती है। यूं तो रचना पंजाब के परिवेश का खाका खींचती है, मगर रचना का मूल स्वर प्रकृति, प्रेम, प्रतीक्षा, रिश्ते, संवेदना आदि के उदात्त रूप को अभिव्यक्त करता है। सरल व सधी भाषा में पंजाबी प्रतीकों-प्रतिमानों का खूबसूरती से प्रयोग किया गया है। प्रत्येक कविता का एहसास सूक्ष्म व गहन है। इन कविताओं से गुजरते हुए पाठक गहरी मानवीय संवेदनाओं से रूबरू होता है। इतना ही नहीं, रचना में संकलित कविताएं कई ज्वलंत सवालों पर मंथन को भी बाध्य करती हैं। जिसे रचनाकार के सृजन की सफलता ही कहा जा सकता है। रचना से गुजरते हुए एक बात तो शिद्दत से उभरती है कि कवि पाठकों को बांधने का हुनर रखता है। रचनाओं का बोझिलता से मुक्त व सरल-सहज संवाद की शैली में होना भी एक खास गुण है।
दरअसल, इस रचना के जरिये डॉ. हरमहेन्द्र सिंह बेदी ने चार दशक की काव्य यात्रा के दौरान अपने शहर के बनते-संवरते व बिगड़ते एहसासों की व्यथा व्यक्त की है। जिसमें पंजाब के काले दौर, नशा व युवा पीढ़ी के भटकाव को केंद्र में रखा गया है। धुंध व सपनों में बिखरे जीवन के कई रंग कवि की कल्पना को यथार्थ बनाते नजर आते हैं। ‘धुंध में डूबा शहर’ जैसी रचना ही डॉ. हरमहेंद्र सिंह बेदी को पंजाब के हिंदी रचनाकारों के बीच अलग पहचान दिलाती है।


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