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साहित्य के राजनीतिक संदर्भ

Posted On January - 10 - 2017

11001cd _IMAG1003अध्ययन कक्ष से

प्रमोद कौंसवाल हिंदी साहित्य में कविताओं और कहानियों के अलावा साहित्य परिशिष्टों के संपादन और अपने अनुवाद के हुनर के लिए पहचाने जाते हैं। उनकी पुस्तक ‘आता ही होगा कोई नया मोड़’ (2015) में वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी का जीवन और लेखन से परिचय कराते हुए उन्होंने हिंदी के प्रख्यात आलोचकों, नामवर सिंह से लेकर जानेमाने कवि असद जैदी तक के चालीस से अधिक लेखकों के ऐसे साक्षात्कार लिए जिनसे कविता को समझने की नई दिशा दिखी। प्रमोद की कविताओं ने ‘पहल’ और ‘वर्तमान साहित्य’ के शताब्दी विशेषांकों में अपनी जगह बनाई है। साथ ही विष्णु खरे और बारबरा लोत्जे संपादित विश्व कविताओं के संकलन ‘जीवंत साहित्य’ में उनकी कविताएं हिंदी के साथ जर्मन और अंग्रेजी में संकलित हैं। इस संकलन में सीताकांत महापात्रा, कुंवर नारायण, अशोक वाजपेयी और उदय प्रकाश, निदा फाजली सरीखे विश्व के कुल तीस कवि शामिल रहे हैं। प्रमोद कौंसवाल अपनी ही तरह का आदमी, रूपिन सूपिन, आता ही होगा कोई नया मोड़, रात की चीख, क्या संबंध था सड़क का उड़ान से, भारतीय संदर्भ कोश, सुरों की सोहबत आदि पुस्तकों के लेखक हैं।
प्रमोद कौंसवाल बताते हैं कि हाल में उन्होंने जिया सिद्दिकी की कहानियों, बशीर और कई अन्य की रचनाओं में आए उन सामाजिक संदर्भों के आईने में एक नया अध्याय जोड़ने वाली पुस्तक को विस्तार से पढ़ा जो भारत के इतिहास में सांप्रदायिक हिंसा के काले इतिहास को परत दर परत खोलती है। जिया ने भागलपुर दंगे के बाद और बशीर साहब ने मेरठ दंगों के बाद शहर छोड़ दिए थे। इस पुस्तक में नेल्ली नरंसहार, सिख विरोधी हिंसा, गुजरात दंगे और भागलपुर को पूर्ण विस्तार और काफी हद तक बाबरी विध्वंस के बाद मुंबई की हिंसा को कवर किया गया है। पुस्तक सुरभि चोपड़ा, प्रीता झा की मेहनत का परिणाम है तो इस पुस्तक को रूप में लाने का ऐतिहासिक काम किया है—थ्री एशेज कलेक्टिव ने। यह कालजयी अध्ययन है, जो पढ़ने में उपन्यास जैसे विस्तार में है और फर्क इतना है कि वह हकीकत है जो फंतासी से भयानक लगती है। इसके गुजरात अध्याय से एक-दो जरूरी और सामयिक बातें मैंने नोट कीं या जिन्होंने स्वाभाविक तौर पर ध्यान खींचा। असंख्या और पूर्ण संदर्भों के साथ… 27 फरवरी, 2002 की शाम थी जब अफसरों की बैठक ली गई। उसमें मुखिया ने सभी से कहा—निष्पक्ष ना हो। शहरी और ग्रामीण लोगों को हथियारबंद भीड़ ने निशाना बनाया। रिपोर्ट में सुबूत मिले कि दक्षिणपंथी संगठनों ने हिंसा भड़काई। ग्रामीण इलाकों में खासकर से दाहोद और पंचमहल के अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया। केंद्र सरकार के दखल से इनकार के बाद सरकार को पूरे राज्य में हिंसा की अनदेखी करने और सहने के लिए अनुमति मिल गई। इसके कुछ महीनों बाद हिंसा की जांच के लिए नानावती आयोग की स्थापना की। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक मामलों में न्याय और नुकसान के लिए मुआवजा पाने के लिए चुनौती देकर इस दबाव को कायम रखा। साथ ही बड़े-बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों और राजनेताओं को बड़े पैमाने पर हुई हिंसा में मिलीभगत के लिए जवाबदेह ठहराया… आयोग के सम्मुख फैक्स की प्रतियां दिखाईं, जिनमें खुफिया इनपुट को लेकर जानकारी दी गई और इसके प्रमाण थे। यह सारे संदर्भ रौंगटे खड़े करते हैं जब यह पता चलता है कि यहां की सारी सरकारी मशीनरी सत्ता के इशारे पर काम कर रही थी। यह अध्ययन बताता है कि कैसे अपराधियों को मुक्त करने के रास्ते हमारे लोकतंत्र में मौजूद हैं।


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