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व्यवस्था में बदलाव की कविता

व्यवस्था में बदलाव की कविता

डॉ. राजवंती मान एक सरकारी अधिकारी के साथ-साथ, हरियाणा की चर्चित लेखिका, शोधकर्ता और कवयित्री हैं। वह हिंदी, अंग्रेजी व उर्दू में आत्मविश्वास से लिखती हैं। इतिहास और साहित्य पर अब तक उनकी नौ किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। वह किसान पृष्ठभूमि से सम्बन्ध रखती हैं। 2012 में उनकी पुस्तक ...

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चैतन्य अवस्था में है पाठक

चैतन्य अवस्था में है पाठक

वंदना सिंह हाल के दिनों में जिन लेखिकाओं ने अपनी रचनाओं से हिंदी जगत का ध्यान अपनी ओर खींचा है, उनमें रजनी मोरवाल का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। रजनी मोरवाल की कहानियों का संकलन ‘कुछ तो बाकी है’ हाल ही में प्रकाशित हुआ है। इसके पहले उनके तीन ...

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बोझ

बोझ

लघु कथा गोविंद शर्मा दोनों बरसों बाद मिले एक वृद्ध आश्रम में। दोनों ने एक-दूसरे को पहचान लिया, आंखों में यह सवाल लिए कि तू यहां क्यों? एक ने बताया—मेरे आर्थिक हालात वैसे ही हैं। बेटे की आय बहुत कम है। मेरी देखभाल ठीक से करता है, पर जब वह काम पर चला ...

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प्रेमाश्रम : ग्रामीण-समाज के आंतरिक सत्य

प्रेमाश्रम : ग्रामीण-समाज के आंतरिक सत्य

अशोक भाटिया रूसी कथा-साहित्य में जो स्थान गोर्की और चेखव का है, चीनी में लू-शुन का है, वही स्थान हिंदी कथा-साहित्य में प्रेमचंद को प्राप्त है। प्रेमचंद को ‘उपन्यास-सम्राट’ और ‘कलम का सिपाही’ कहा जाता है, जबकि वे स्वयं को कलम का मजदूर कहते थे। बचपन से ही विपरीत हालात में ...

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सलामी

सलामी

कहानी यश गोयल घने कोहरे में न सिर्फ विधानसभा भवन की गुंबद अदृश्य था, बल्कि पूरा शहर धुंध में लिपटा था। सर्द हवा जब कान के पास से होकर गुजरती तो पूरा शरीर कांप जाता था। दोनों हाथ कांख में दबाने से भी कड़ाके का जाड़ा कम नहीं हो रहा था। ये ...

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त्रासदी का एक्सरे करती कथा

त्रासदी का एक्सरे करती कथा

अध्ययन कक्ष से बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी अशोक अंजुम जितने सधे हुए काव्य साधक हैं, उतने सशक्त मंचीय गीतकार भी। ‘अंजुम’ ने मुख्यत: गज़ल, दोहा, गीत, हास्य-व्यंग्य के साथ ही लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, लेख, समीक्षा, भूमिका, साक्षात्कार, नाटक विधा में कलम चलाई है। तकरीबन डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकों के रचयिता ...

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लोकतंत्रीकरण हुआ है लेखन का

लोकतंत्रीकरण हुआ है लेखन का

समय और सृजन वंदना सिंह युवा कवयित्री, कहानीकार इरा टाक साहित्य सृजन के अलावा एक बेहतरीन चित्रकार और फिल्मकार भी हैं। अब तक इरा टाक पेंटिंग के आधा दर्जन सोलो शो और कई ग्रुप शो में हिस्सा ले चुकी हैं। दिल्ली में हाल ही में समाप्त हुए पुस्तक मेले में उनकी ...

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  • सलामी
     Posted On January - 24 - 2017
    घने कोहरे में न सिर्फ विधानसभा भवन की गुंबद अदृश्य था, बल्कि पूरा शहर धुंध में लिपटा था। सर्द हवा....
  • प्रेमाश्रम : ग्रामीण-समाज के आंतरिक सत्य
     Posted On January - 24 - 2017
    रूसी कथा-साहित्य में जो स्थान गोर्की और चेखव का है, चीनी में लू-शुन का है, वही स्थान हिंदी कथा-साहित्य में....
  • बोझ
     Posted On January - 24 - 2017
    दोनों बरसों बाद मिले एक वृद्ध आश्रम में। दोनों ने एक-दूसरे को पहचान लिया, आंखों में यह सवाल लिए कि....
  • चैतन्य अवस्था में है पाठक
     Posted On January - 24 - 2017
    हाल के दिनों में जिन लेखिकाओं ने अपनी रचनाओं से हिंदी जगत का ध्यान अपनी ओर खींचा है, उनमें रजनी....

कविता

Posted On January - 24 - 2017 Comments Off on कविता
सेतु तुमसे मुझ तक एक सेतु था —एक नेह-बंध। सेतु न जाने कब अंतराल हुआ और नेह-बंधन बन चुका। समय चक्र की अनवरत गति भावनाओं की सिलवटों को संवारती-बिगाड़ती— एक धुंधली-सी प्रतिच्छाया छोड़ सरक गई— बंद मुटि्ठयों से रेत की मानिंद । िकरकिरा रही हंै आंखें जैसे उनींदी आंखों में चुभती है पूरी नींद। कसैली सी जुबान, रीती हथेलियां। अपने अस्तित्व को साक्षी बन यूं भुरभुराते देखना अपनी ही मृत्यु का 

व्यवस्था में बदलाव की कविता

Posted On January - 24 - 2017 Comments Off on व्यवस्था में बदलाव की कविता
डॉ. राजवंती मान एक सरकारी अधिकारी के साथ-साथ, हरियाणा की चर्चित लेखिका, शोधकर्ता और कवयित्री हैं। वह हिंदी, अंग्रेजी व उर्दू में आत्मविश्वास से लिखती हैं। इतिहास और साहित्य पर अब तक उनकी नौ किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। वह किसान पृष्ठभूमि से सम्बन्ध रखती हैं। 2012 में उनकी पुस्तक ‘सर छोटू राम शख्सियत और मिशन’ को हरियाणा उर्दू अकादमी की तरफ से तर्जुमा नगार ....

कविताएं

Posted On January - 17 - 2017 Comments Off on कविताएं
जिस्म …एक अजीब-सी झनझनाहट होती है सड़क पर आॅटो में… बस में… कहीं भी आते-जाते कई नजरें पैरों से सिर तक कपड़ों को स्कैन करते हुए दिमाग को चीर कर निकलती हैं पड़ोस की आंखें टंगी रहती हैं खिड़कियों पर दरवाजों पर कहां गई? कहां से आई? और जान कर समझ कर भी सारे सवाल झटक कर फेंक दिए जाते हैं क्योंकि ऐसा होता है तो ऐसा क्यों होता है क्या लड़कियां सिर्फ जिस्म होती हैं? और कुछ भी नहीं! पानी की बारी आधी 

त्रासदी का एक्सरे करती कथा

Posted On January - 17 - 2017 Comments Off on त्रासदी का एक्सरे करती कथा
बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी अशोक अंजुम जितने सधे हुए काव्य साधक हैं, उतने सशक्त मंचीय गीतकार भी। ‘अंजुम’ ने मुख्यत: गज़ल, दोहा, गीत, हास्य-व्यंग्य के साथ ही लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, लेख, समीक्षा, भूमिका, साक्षात्कार, नाटक विधा में कलम चलाई है। ....

लोकतंत्रीकरण हुआ है लेखन का

Posted On January - 17 - 2017 Comments Off on लोकतंत्रीकरण हुआ है लेखन का
युवा कवयित्री, कहानीकार इरा टाक साहित्य सृजन के अलावा एक बेहतरीन चित्रकार और फिल्मकार भी हैं। अब तक इरा टाक पेंटिंग के आधा दर्जन सोलो शो और कई ग्रुप शो में हिस्सा ले चुकी हैं। दिल्ली में हाल ही में समाप्त हुए पुस्तक मेले में उनकी तीसरी किताब कहानी संग्रह रात पहेली प्रकाशित हुई। ....

लघुकथाएं

Posted On January - 17 - 2017 Comments Off on लघुकथाएं
‘मैं मर क्यों नहीं जाती?’ जमाने भर की सताई हुई औरत ने खुद से ही बुदबुदाते कहा। ‘तुम जिंदा ही कब थी?’ औरत के अंदर की औरत ने सवाल किया। ....

व्यवस्था की विसंगतियों पर गहरा तंज

Posted On January - 17 - 2017 Comments Off on व्यवस्था की विसंगतियों पर गहरा तंज
बीसवीं सदी के महान अंग्रेजी उपन्यासकार जॅार्ज ऑरवेल की कालजयी कृति ‘एनिमल फार्म’ पहली बार इंग्लैंड में 17 अगस्त 1945 को प्रकाशित हुई थी। इस लघु उपन्यास का मूल नाम ‘एनिमल फार्म : ए फेयर स्टोरी’ था परंतु अमेरिका के प्रकाशकों ने इसे छोटा कर दिया। ....

अबाबील

Posted On January - 17 - 2017 Comments Off on अबाबील
नाम तो उसका रहीम खां था, पर उस जैसा ज़ालिम शायद ही कोई हो। सारा गांव उसके नाम से कांपता था। एक दिन एक लोहार के बेटे ने उसके बैल की पूंछ से कंटीली झाड़ी बांध दी तो रहीम खां ने बच्चे को मार-मार कर अधमरा कर दिया। उसके अगले दिन सरकारी अफसर की घोड़ी उसके खेत में आ घुसी तो उसने उसे इतना मारा ....

कविताएं

Posted On January - 10 - 2017 Comments Off on कविताएं
एक टुकड़ा आकाश कतरा–कतरा पल बीते गुज़र गए कितने ही साल छूट गए सब गुड़िया–झूले आ बैठी प्रीतम के द्वार। कल्पनाएं कितनी बिखर गयीं फर्श के पोंछे के साथ सपने सारे अटक गए छत के कोनों के जालों में। मिट्टी–गाराÊगोबर थाप सहलाती रही अपने हाथ हर शाम दीया जलाया क्योंकर जल गए मेरे हाथ। प्रार्थनाओं का फल मीठा ही है यही रहा सदा एहसास ईंट सिरहानाÊ धरती बिछौना बने रहे मेरे साथ। अब तो इनसे निकल जाऊंगी नए 

साहित्य के राजनीतिक संदर्भ

Posted On January - 10 - 2017 Comments Off on साहित्य के राजनीतिक संदर्भ
प्रमोद कौंसवाल हिंदी साहित्य में कविताओं और कहानियों के अलावा साहित्य परिशिष्टों के संपादन और अपने अनुवाद के हुनर के लिए पहचाने जाते हैं। उनकी पुस्तक ‘आता ही होगा कोई नया मोड़’ (2015) में वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी का जीवन और लेखन से परिचय कराते हुए उन्होंने हिंदी के प्रख्यात आलोचकों, नामवर सिंह से लेकर जानेमाने कवि असद जैदी तक के चालीस से अधिक लेखकों ....

पढ़ने की ललक बढ़ी

Posted On January - 10 - 2017 Comments Off on पढ़ने की ललक बढ़ी
महेश कटारे, कहानीकार, उपन्यासकार और नाटककार। बेहद विनम्र और अब भी ठेठ गंवई अंदाज में हिंदी साहित्य जगत में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने वाले महेश कटारे का महाराजा भर्तृहरि के जीवन पर दो खंडों में लिखा गया उपन्यास ‘कामिनी काय कांतरे’ खासा चर्चित रहा है और पाठकों के साथ-साथ आलोचकों ने उस उपन्यास को लेकर महेश कटारे के काम की सराहना की है। ....

वक्त का फैसला

Posted On January - 10 - 2017 Comments Off on वक्त का फैसला
बारात के बैंड-बाजे की आवाज दूर से आ रही थी। आवाज सुनते ही सभी तरफ चहल-पहल आरंभ हो गई थी। दीवान जी गुलाबी पगड़ी बांधे तेजी से हलवाई की तरफ बढ़ रहे थे, यह जानने के लिए कि खाना तैयार हो गया है या नहीं? सभी सगे-संबन्धी खुशी से झूम रहे थे। ....

अनुभव और एहसास की शायरी

Posted On January - 10 - 2017 Comments Off on अनुभव और एहसास की शायरी
नहीं, आसान नहीं होता लोकप्रियता और श्रेष्ठता के संतुलन को बनाए रखना। जी हां, गुलज़ार ने यह कर दिखाया है। शायरी, फिल्मी गीत, कविताएं, कुछ भी हो, विचारों की बुलंदी और अंदाज़े-बयां के साथ गुलज़ार का मुकाम आज महत्वपूर्ण है और उल्लेखनीय भी। ....

बारह जनवरी

Posted On January - 10 - 2017 Comments Off on बारह जनवरी
मोशिया करवेऊ सहमा हुआ-सा दफ्तर से बाहर आया। बाहर आते वक्त उसके कई मित्रों ने उसे छिपकर जाने को कहा। उसने दफ्तर के लगभग तीन फ्रैंक खो दिए थे। अब वह शीघ्रता से घर पहुंच जाना चाहता था। रास्ते में उसे एक व्यक्ति से यह भी सूचना मिली कि घर पर उसकी पत्नी बड़ी बेसब्री से उसका इंतज़ार कर रही है। ....

ताई की याद

Posted On January - 3 - 2017 Comments Off on ताई की याद
बनफूल आज ताई जी की बड़ी याद आ रही है। उनके सामने बैठकर खाना भी मुहाल था। तरह-तरह का पकवान बनाती। लौकी, परवल, आलू, बैंगन आदि तो तलती ही थीं, कभी-कभार लौकी के छिलके तक की भाजी बनाकर परोस देती। इसके अलावा नाना प्रकार के बंगाली भोज तो होते ही। उनके हाथ की बनी सब्जियां और तरीदार मछली का तो जवाब ही नहीं। कम मसाले के साथ इतना स्वादिष्ट भोजन पकाती थी कि ऐसा लजीज़ शायद ही कोई बनाता हो। उस पर स्वयं 

शमशेरियत की प्रतिनिधि कविताएं

Posted On January - 3 - 2017 Comments Off on शमशेरियत की प्रतिनिधि कविताएं
 कालजयी रचना सुभाष रस्तोगी हिन्दी के अपांक्तेय कवि शमशेर बहादुर सिंह (1911-1993) का जन्म देहरादून (उ.प्र.) में हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा देहरादून में हुई। शमशेर ‘रूपाभ’ इलाहाबाद में कार्यालय सहायक (1939) तथा ‘कहानी’ और ‘नया साहित्य’ के संपादक मंडल में रहे। इन्होंने ‘माया’ में सहायक संपादक (1948-1954) के तौर पर व ‘मनोहर कहानियां’ में संपादन सहयोग दिया। शमशेर बहादुर सिंह ने दिल्ली विश्वविद्यालय 
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