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प्रश्नों के कठघरे में मानवता

प्रश्नों के कठघरे में मानवता

हरियाणा साहित्य अकादमी से सम्मानित डाॅ. शील कौशिक हरियाणा स्वास्थ्य विभाग में एक अधिकारी के अलावा साहित्य साधना में भी रत रही हैं। अब तक उनकी कुल सत्रह पुस्तकें प्रकाशित हुई हैंं। इनमें छह कविता–संग्रह (दूर होते हम, नए एहसास के साथ, कचरे के ढेर पर ज़िंदगी, कविता से पूछो, ...

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शैली-शिल्प मेें बाजार का दबाव

शैली-शिल्प मेें बाजार का दबाव

वंदना सिंह नंद भारद्वाज हिन्दी और राजस्थानी में कई दशकों से सक्रिय हैं। कवि, कथाकार, समीक्षक और संस्कृतिकर्मी के रूप में सुपरिचित नंद भारद्वाज ने हिंदी और राजस्थानी में विपुल लेखन किया है। ‘अंधार पख’ और ‘आगै अंधारौ’ उनके कविता संग्रह हैं। ‘सांम्ही खुलतौ मारग’ उनका उपन्यास और ‘बदलती सरगम’ कहानी ...

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कविताएं

कविताएं

आंसू मैं आंखों की दहलीज पर अटका एक आंसू जिसे बाहर कोई आने नहीं दे रहा भीतर लौटने के लिए कोई जगह नहीं बची है बंधु-बांधव उस जगह पर कर चुके हैं कब्जा आंसू अपनी जगह खड़ा थरथरा रहा है दहलीज उसे जगह छोड़ने को कह रही है उसका अस्तित्व चरमरा रहा है सच मैं ऐसा एक आंसू! स्वाद जहां भूख थी प्यास थी चिलचिलाती धूप थी वहां मैं था जहां लड़ रहे थे लोग अन्याय और ...

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चोट

चोट

लघुकथाएं रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ मज़दूरों की उग्र भीड़ महतो लाल की फैक्टरी के गेट पर डटी थी। मज़दूर नेता परमा क्रोध के मारे कांप रहा था,‘इस फैक्टरी की रगों में हमारा खून दौड़ता है। इसके लिए हमने अपनी हड्डियां गला दीं। क्या मिला हमको–भूख, गरीबी, बदहाली। यही न। अगर फैक्टरी मालिक हमारा ...

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मानव सभ्यता के विकास का सजीव चित्र

मानव सभ्यता के विकास का सजीव चित्र

योगेंद्र नाथ शर्मा ‘अरुण’ ‘वोल्गा से गंगा’ महापंडित राहुल सांकृत्यायन की बीस कालजयी कहानियों का अनूठा संग्रह है। ये बीस कहानियां आठ हजार वर्षों तथा दस हजार किलोमीटर की परिधि में बंधी हुई हैं। समीक्षकों ने इन कहानियों को भारोपीय मानव-सभ्यता के विकास की पूरी कड़ी को सामने रखने में सक्षम ...

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माचिसवाली

माचिसवाली

डेनमार्क की कहानी हैंस क्रिश्चियन एंडरसन भीषण सर्दी का आलम था। बर्फ गिर रही थी और अंधेरा छा गया था। शाम होने को आई थी। यह वर्ष की आखिरी शाम थी। ठंड और अंधकार में एक लड़की नंगे सिर और नंगे पैर सड़क पर चली जा रही थी। जब वह अपने घर ...

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मासूम

मासूम

पंजाबी कहानी दलीप कौर टिवाणा चारों ओर बर्फ से ढके पहाड़ थे। ठंडी शांत, निर्मल हवा थी। आराम था। यह कोयल का देश था। एक लम्बी यात्रा के बाद एक बार एक कौवा वहां पहुंचा। कोयल ने अतिथि-सत्कार किया। ‘बड़ा सूनापन, बड़ी उदासी, बड़ी चुप्पी है तुम्हारे देश में।’ कौवे ने कहा। ‘नहीं तो। सामने नदी ...

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  • माचिसवाली
     Posted On February - 14 - 2017
    भीषण सर्दी का आलम था। बर्फ गिर रही थी और अंधेरा छा गया था। शाम होने को आई थी। यह....
  • मानव सभ्यता के विकास का सजीव चित्र
     Posted On February - 14 - 2017
    ‘वोल्गा से गंगा’ महापंडित राहुल सांकृत्यायन की बीस कालजयी कहानियों का अनूठा संग्रह है। ये बीस कहानियां आठ हजार वर्षों....
  • चोट
     Posted On February - 14 - 2017
    मज़दूरों की उग्र भीड़ महतो लाल की फैक्टरी के गेट पर डटी थी। मज़दूर नेता परमा क्रोध के मारे ....
  • शैली-शिल्प मेें बाजार का दबाव
     Posted On February - 14 - 2017
    नंद भारद्वाज हिन्दी और राजस्थानी में कई दशकों से सक्रिय हैं। कवि, कथाकार, समीक्षक और संस्कृतिकर्मी के रूप में सुपरिचित....

हंगेरियन क्लासिक में टैगोर का शांतिनिकेतन

Posted On July - 19 - 2016 Comments Off on हंगेरियन क्लासिक में टैगोर का शांतिनिकेतन
सन‍् 1929 में अपने पति के साथ भारत के शांतिनिकेतन में दो वर्षों तक प्रवास पर रही एक घरेलू महिला रोज़ा हजनोशी गेरमानूस ने अपनी दैनंदिनी को एक रोचक उपन्यास की तरह इस पुस्तक में समेटा है । हंगरी भाषा में यह कृति लेखिका की मृत्यु के बाद 1944 में ‘बेंगाली तूज़’ के नाम से प्रकाशित हुई थी। पहले ही वर्ष में इसके तीन संस्करण ....

रूहों की राह

Posted On July - 19 - 2016 Comments Off on रूहों की राह
अपेक्षा से कहीं पहले माइकेल ओबी की इच्छा पूरी हो गई। जनवरी, 1949 में उसकी नियुक्ति नड्यूम केंद्रीय विद्यालय के प्रधानाचार्य के पद पर कर दी गई। यह विद्यालय हमेशा से पिछड़ा हुआ था, इसलिए स्कूल चलाने वाली संस्था के अधिकारियों ने एक युवा और ऊर्जावान व्यक्ति को वहां भेजने का निर्णय किया। ओबी ने इस दायित्व को पूरे उत्साह से स्वीकार किया। ....

कविता

Posted On July - 12 - 2016 Comments Off on कविता
मन के अंदर बूंद पुरानी बात वह सुहानी... न मेरे पास सागर न मेरे पास नदियां प्यार की अजीब ....

यादों में बाकी रिश्तों की महक

Posted On July - 12 - 2016 Comments Off on यादों में बाकी रिश्तों की महक
पुस्तक अंश मांजी के गुज़र जाने पर उनकी तेरहवीं पर बालू वाली नानी जी आई थी अन्टा शोक प्रकट करने। छोटे चाचा जी महताब की सास थी वो। दूसरी शादी थी उनके ससुर की। मलेर कोटले की थी सो उसे बालू में ‘जंगलो’ कहते थे, एक दम पक्की सरदारनी। जल्दी विधवा हो गई थी और सारी कबीलदारी उनके सिर पर आ गई। उनकी बांगर और मलेर कोटले की मिश्रित बोली बहुत अच्छी लगती थी हमें। बाऊजी और चाचाजी को साऊ कहती थी। खानदानी औरत 

गुम नहीं होती कविता

Posted On July - 12 - 2016 Comments Off on गुम नहीं होती कविता
अशोक वाजपेयी हिंदी के संभवत: इकलौते लेखक हैं जो साहित्य और कला की दुनिया में समान रूप से आवाजाही करते हैं। उनको साहित्यिक संस्थाओं के निर्माता के रूप में भी जाना जाता है। भोपाल के सांस्कृतिक केंद्र भारत भवन को स्थापित करने में उनकी केंद्रीय भूमिका रही है। उन्होंने बहुवचन, समास, पूर्वग्रह समेत कई पत्रिकाओं का संपादन भी किया। उनकी करीब दो दर्जन से ज्यादा ....

छाया

Posted On July - 12 - 2016 Comments Off on छाया
प्लेटफार्म का वह टेढ़ा-मेढा पेड़। जनवरी में कटाई-छंटाई हुई तो शक्ल भयानक हो गई। स्टेशन मास्टर से लेकर उच्चाधिकारियों तक शिकायत की गई कि बच्चे इसे देखकर डर जाते हैं। स्टेशन की शोभा भी बिगड़ रही है। इसे हटाया जाए। शिकायतों का दौर लम्बा चला। जांच करने के लिए ऊपर से एक अधिकारी भेजा गया। तब तक जून का महीना आ गया। शिकायतकर्ताओं को स्टेशन पर ....

मातृभूमि का गौरवगान ‘भारत-भारती’

Posted On July - 12 - 2016 Comments Off on मातृभूमि का गौरवगान ‘भारत-भारती’
मैथिलीशरण गुप्त (1886-1964) का जन्म चिरगांव, जिला झांसी में हुआ था। वे द्विवेदी काल के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि थे। गुप्त जी की रचनाएं प्रारंभ में कलकत्ता से निकलने वाले ‘वैश्योपकारक’ में प्रकाशित होती थीं। कालांतर में यह महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपर्क में आये और इनकी रचनाएं ‘सरस्वती’ में प्रकाशित होने लगीं। द्विवेदीजी की प्रेरणा और प्रोत्साहन से श्री गुप्त की कविता में निखार आया। ....

जाल

Posted On July - 12 - 2016 Comments Off on जाल
नदी की धारा बदलते ही असद नाव से जाल फेंकने लगा। आषाढ़ समाप्त होने को आया था। नदी पूर्ण यौवन पर थी। सगीर मजबूत हाथ से पतवार थामे बैठा था। नाव में बने छतनारे में मद्धम लालटेन जल रही थी। आज आसमान में चांद नहीं था। नदी के हृदय में गहन अंधकार पसरा था। ....

खेती-किसानी की बाकी निशानी

Posted On July - 5 - 2016 Comments Off on खेती-किसानी की बाकी निशानी
सुबह-सवेरे अगर आपने कभी खेत में काम किया हो तो आपको मालूम होगा कि भूख कैसी होती है, और खेत में रोटी लाने वाले की बाट कैसी। मैं जब कभी पांच बजे के आस-पास गेहूं के बुआरे के वक्त खेत संवारने ट्रैक्टर पर जाता था तो बाऊजी की बाट होती, जो थर्मस में चाय या दूध व परांठे लेकर आते थे, अपनी स्कूटर पर। हाली तो घरवाली की रोटी लेकर आने वाले वक्त गांव की तरफ मुंह कर-कर के बाट देखा करते थे। मुझे दादाजी के ज़मानों 

लघु कथा

Posted On July - 5 - 2016 Comments Off on लघु कथा
अन्तर गोविंद शर्मा आइए, श्रीमान… सर, आप मुझे श्रीमान क्यों कह रहे हैं? मैं तो एक भिखारी हूं। भीख मांगने आया हूं। अरे, जब हम नेताओं को श्रीमान‍् कहते हैं तो आपको क्यों नहीं? वे भी तो वोटों की भीख मांगने आते हैं हमारे पास। सर उनमें और हम भिखारियों में अंतर हैं। हम भीख लेने के लिये दुआएं देते है। भीख मिलने पर और भी ज्यादा। वे वोटों की भीख मांगने के लिये आपसे हजार वायदे करेंगे। 

गुरुदेव के संवेदनशील मन की व्यथा

Posted On July - 5 - 2016 Comments Off on गुरुदेव के संवेदनशील मन की व्यथा
 कालजयी रचना रतन चंद ‘रत्नेश’ बांग्ला साहित्य में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर रचित ‘नष्टनीड़’ को कहीं लम्बी कहानी तो कहीं लघु उपन्यास की श्रेणी में रखा गया है जिस पर सुप्रसिद्ध फिल्म-निर्देशक सत्यजित राय ने 1964 में ‘चारूलता’ नाम से फिल्म का निर्माण किया था। 1901 में लिखा यह उपन्यास टैगोर की तीसरी कृति थी जिसने कवि को बतौर एक कथाकार प्रतिष्ठित करने में अहम भूमिका निभायी थी। 

विवशता

Posted On July - 5 - 2016 Comments Off on विवशता
सुशांत सुप्रिय जब सुबह झुनिया वहां पहुंची तो बंगला रात की उमस में लिपटा हुआ गर्मी में उबल रहा था। सुबह सात बजे की धूप में तल्ख़ी थी। वह तल्ख़ी उसे मेम साहब की तल्ख़ ज़बान की याद दिला रही थी। बाहरी गेट खोलकर वह जैसे ही अहाते में आई, भीतर से कुत्ते के भौंकने की भारी-भरकम आवाज़ ने उसके कानों में जैसे पिघला सीसा डाल दिया। उंगलियों से कानों को मलते हुए वह बंगले के दरवाज़े पर पहुंची। घंटी 

साहित्यकर्म का जनतंत्रीकरण

Posted On July - 5 - 2016 Comments Off on साहित्यकर्म का जनतंत्रीकरण
वंदना सिंह सुधीश पचौरी इस वक्त हिंदी में सबसे ज्यादा लिखने वालों में शीर्ष पर हैं। उनके लेख देशभर की पत्र-पत्रिकाओं में नियमित तौर पर छपते हैं। सुधीश पचौरी ने दर्जनों पुस्तकें लिखी हैं। नई कविता का वैचारिक आधार, कविता का अन्त, उत्तर-आधुनिक परिदृश्य, उत्तर-आधुनिकता और उत्तर संरचनावाद; नवसाम्राज्यवाद और संस्कृति; विकास से बाजशर तक; उत्तर-आधुनिक साहित्यिक-विमर्श; देरिदा का विखण्डन 

लघु कथा

Posted On June - 28 - 2016 Comments Off on लघु कथा
वसीयत राजकुमारी मदान बूढ़े मां-बाबा की ख़ैर-ख़बर लेने बेटी तो कभी-कभी ससुराल से आ जाती थी, किन्तु बेटा अपनी घर-गृहस्थी में व्यस्त रहता। बहन मां -बाबा का दु:ख देख-समझ कर भाई को आने को मिन्नतें करती, पर वह सुन कर भी अनसुनी कर देता। सोचता कि मां-बाबा ने उन्हें पाल पोसकर अपना फ़र्ज़ ही तो पूरा किया, वह भी अपना परिवार पाल पोस कर फ़र्ज़ पूरा कर ही रहा है। बचपन में वह मां-बाबा के कंधों पर चढ़ 

नया लड़का

Posted On June - 28 - 2016 Comments Off on नया लड़का
अरविन्द कुमार उसके नौकरी पर लगने के दूसरे दिन से ही तीनों यूनियनों ने जोड़-तोड़ और दौड़-धूप शुरू कर दी… उसे अपने गोल में शामिल करने के लिए। अलग-अलग। उसके साथ। बातचीत। मिलना-जुलना। उठना-बैठना। कुछ तो उसे अपने घर भी ले गए। सुबह समय से काम पर आता। चुपचाप दिनभर अपनी ड्यूटी बजाता। जो कहा जाता, वह करता। और शाम को छुट्टी का भोंपू बजते ही चुपचाप घर की तरफ वापस चल पड़ता। उसका नाम था मुन्नी 

मुक्तिबोध : मुश्किल वक्त के मुश्किल कवि

Posted On June - 28 - 2016 Comments Off on मुक्तिबोध : मुश्किल वक्त के मुश्किल कवि
कालजयी रचना सुभाष रस्तोगी यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि गजानन माधव मुक्तिबोध (1917-1964) का जीते जी एक भी कविता-संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ था। लेकिन उत्तरशती के इस दूसरे दशक में स्थिति यह है कि कोई भी समकालीन कवि/ आलोचक मुक्तिबोध से जुड़े बिना अपनी प्रासंगिकता सिद्ध ही नहीं कर सकता। 1980 में उनका संपूर्ण साहित्य छह खंडों में प्रकाशित हुआ। यह निर्विवाद सत्य है कि मुक्तिबोध जितने बड़े 
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