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कहानियों से गायब होता गांव

कहानियों से गायब होता गांव

वंदना सिंह कथाकार शैवाल को फिल्म और साहित्य के बीच की कड़ी माना जाता है। उनकी कहानियों पर कई फिल्में बन चुकी हैं। मशहूर निर्देशक प्रकाश झा ने उनकी कहानी दामुल और मृत्युदंड पर इसी नाम से फिल्म बनाई थी जो काफी सफल रही थी। हाल ही में उनकी कहानी ...

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स्त्री-मन का संवेदनशील चित्रण

स्त्री-मन का संवेदनशील चित्रण

साहित्य और पत्रकारिता की दुनिया में गत चार दशकों से सक्रिय गिरीश पंकज के अब तक सात उपन्यास, पंद्रह व्यंग्य संग्रह सहित विभिन्न विधाओं में कुल पचपन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके चर्चित उपन्यासों में मिठलबरा की आत्मकथा, माफिया, पॉलीवुड की अप्सरा, एक गाय की आत्मकथा, मीडियाय नमः, टाउनहाल ...

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लघुकथाएं

लघुकथाएं

समाधान गोविन्द शर्मा एक सहायक ने कहा—सर, इस जगह आपका विरोध कुछ ज्यादा ही है| लोगों की शिकायत है कि पिछली बार सबने आपको वोट दिया था, फिर भी आप पांच साल में एक बार भी नहीं आये। फ़िक्र मत करो, उनकी नाराजगी मेरी घोषणा दूर कर देगी। किसी को शिकायत करने तो ...

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काव्यधारा और इतिहास के बीच पद्मावत

काव्यधारा और इतिहास के बीच पद्मावत

कालजयी रचना ज्ञान चंद्र शर्मा चित्तौड़ की रानी पद्मावती की कहानी को लेकर निर्माता-निर्देशक संजय लीला भंसाली ने एक फिल्म बना रहे हैं। यह एक प्रसिद्ध आख्यान है जिसके आधार पर सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने पहले-पहल अपनी रचना ‘पद्मावत’ का सृजन किया। बाद में इसके फारसी और उर्दू रूपों की ...

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मेरे घर का पता

मेरे घर का पता

रतन चंद ‘रत्नेश’ स्टॅापेज पर खड़ा मैं लोकल बस की प्रतीक्षा कर रहा था। इस बस से फिलहाल मुझे अंतरराज्यीय बस अड्डे तक जाना था। वहां जाकर ही निर्णय लेना था कि अब कहां पहुंचना है? कहीं दूर नहीं, बस वहां से पंद्रह-बीस किलोमीटर दूर कहीं राह में किसी गांव से ...

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प्रश्नों के कठघरे में मानवता

प्रश्नों के कठघरे में मानवता

हरियाणा साहित्य अकादमी से सम्मानित डाॅ. शील कौशिक हरियाणा स्वास्थ्य विभाग में एक अधिकारी के अलावा साहित्य साधना में भी रत रही हैं। अब तक उनकी कुल सत्रह पुस्तकें प्रकाशित हुई हैंं। इनमें छह कविता–संग्रह (दूर होते हम, नए एहसास के साथ, कचरे के ढेर पर ज़िंदगी, कविता से पूछो, ...

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शैली-शिल्प मेें बाजार का दबाव

शैली-शिल्प मेें बाजार का दबाव

वंदना सिंह नंद भारद्वाज हिन्दी और राजस्थानी में कई दशकों से सक्रिय हैं। कवि, कथाकार, समीक्षक और संस्कृतिकर्मी के रूप में सुपरिचित नंद भारद्वाज ने हिंदी और राजस्थानी में विपुल लेखन किया है। ‘अंधार पख’ और ‘आगै अंधारौ’ उनके कविता संग्रह हैं। ‘सांम्ही खुलतौ मारग’ उनका उपन्यास और ‘बदलती सरगम’ कहानी ...

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  • काव्यधारा और इतिहास के बीच पद्मावत
     Posted On February - 21 - 2017
    चित्तौड़ की रानी पद्मावती की कहानी को लेकर निर्माता-निर्देशक संजय लीला भंसाली ने एक फिल्म बना रहे हैं। यह एक....
  • स्त्री-मन का संवेदनशील चित्रण
     Posted On February - 21 - 2017
    साहित्य और पत्रकारिता की दुनिया में गत चार दशकों से सक्रिय गिरीश पंकज के अब तक सात उपन्यास, पंद्रह व्यंग्य....
  • कहानियों से गायब होता गांव
     Posted On February - 21 - 2017
    कथाकार शैवाल को फिल्म और साहित्य के बीच की कड़ी माना जाता है। उनकी कहानियों पर कई फिल्में बन चुकी....
  • लघुकथाएं
     Posted On February - 21 - 2017
    एक सहायक ने कहा—सर, इस जगह आपका विरोध कुछ ज्यादा ही है| लोगों की शिकायत है कि पिछली बार सबने....

बासी रोटी

Posted On December - 20 - 2016 Comments Off on बासी रोटी
रात के दो बजे एक कुत्ता एक झोपड़ी के आगे उदास बैठा था। दूसरा आया और बोला—रोज तो खूब भौंकता है, आज चुप क्यों बैठा है? आज कहीं से रोटी नहीं मिली क्या? ....

पाणिनि के भारत का बिंब

Posted On December - 20 - 2016 Comments Off on पाणिनि के भारत का बिंब
डॉ. जय नारायण कौशिक हरियाणा साहित्य जगत में आदर के साथ लिया जाना वाला नाम है। विभिन्न विधाओं में लिखी तकरीबन अस्सी पुस्तकें उनके रचनाकर्म की गवाही देती नजर आती हैं। हरियाणा साहित्य अकादमी के निदेशक रह चुके कौशिक सांस्कृतिक अकादमी व हरियाणा इन्साइक्लोपीडिया के सलाहकार रह चुके हैं। ....

पाठकों का प्यार ही पुरस्कार

Posted On December - 20 - 2016 Comments Off on पाठकों का प्यार ही पुरस्कार
हिंदी में कम ही लेखक ऐसे हैं जो साहित्येतिहास की ओर मुड़े हैं और गंभीरता से काम कर रहे हैं। कहा जाता है कि अपनी विरासत को समृद्ध करना जितना आवश्यक है, उतना ही अपनी विरासत को संभालना और उसको सहेजकर अगली पीढ़ी तक पहुंचाना है। विरासत को जब हम अगली पीढ़ी तक पहुंचाते हैं तो उसका एक संस्कार बनता है और वही संस्कार कालांतर ....

नई सदी में तेलुगु जीवन के चित्र

Posted On December - 20 - 2016 Comments Off on नई सदी में तेलुगु जीवन के चित्र
तेलुगु काव्य हिंदी भाषियों को कम ही पढ़ने को मिलता है। ठीक वैसे ही, जैसे मलयालम, कन्नड़, उड़िया जैसी भाषाओं से उत्तर भारतीय पाठक प्राय: कम परिचित हो पाते हैं। हिंदी में अनूदित कभी-कभार पत्रिकाओं से या संकलित पुस्तकों में उपलब्ध होती है, तो ज्ञात होता है कि दक्षिण भारतीय भाषा की कविता, हिंदी या हमारी इधर की सामान्य भाषाओं की कविता से कम नहीं ....

वह आयरिश लड़की…

Posted On December - 20 - 2016 Comments Off on वह आयरिश लड़की…
‘तुम्हें एक आयरिश युवती से अवश्य मिलवाना है। यार, उसके हौसले की दाद देनी पड़ेगी।’ सड़क पार करते हुए मोहन मुझसे कह रहा था। ‘गोरी महिलाओं की आवारगी, अय्याशी और बेवकूफी मशहूर है। ये अंगूठा दिखाकर किसी के साथ भी चल पड़ती हैं परंतु अगर अपनी पसंद पर अड़ जाए तो कमाल कर दिखाती हैं।’ ....

प्रामाणिक अनुभव की अभिव्यक्ति

Posted On December - 13 - 2016 Comments Off on प्रामाणिक अनुभव की अभिव्यक्ति
पंजाबी के चर्चित कवि, उपन्यासकार, आलोचक एवं भाषाविद् मनमोहन के आठ काव्य संग्रह पंजाबी में व दो हिंदी में प्रकाशित हुए हैं। भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी डॉ. मनमोहन अफगानिस्तान में चार साल भारतीय दूतावास में काउंसलर रह चुके हैं। इसके अलावा कई महत्वपूर्ण पदों पर जिम्मेदारी निभा चुके हैं। ....

छंद-लय बिना अधूरी कविता

Posted On December - 13 - 2016 Comments Off on छंद-लय बिना अधूरी कविता
अशोक मिज़ाज ग़ज़ल की दुनिया का जाना-माना नाम है। उर्दू और हिन्दी के अग्रणी शायर अशोक मिज़ाज के अब तक पांच ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें समन्दरो का मिज़ाज, ग़ज़लनामा, सिग्नेचर, आवाज़ आदि प्रमुख हैं। उनको कई पुरस्कार आदि भी मिल चुके हैं। ....

अपने-अपने स्वार्थ

Posted On December - 13 - 2016 Comments Off on अपने-अपने स्वार्थ
बीमार हरखू अपनी खोलीनुमा झोपड़ी में चारपाई पर अधलेटा-सा अपनी पत्नी को हाथ में दरांती लेकर बाहर जाते देख रहा था। उसके माथे पर चिंता की लकीरें स्पष्ट थीं। लेकिन देह में इतनी शक्ति न थी कि वह उसे रोकता। ....

बच्चों के स्वप्नलोक का मोहक चित्र

Posted On December - 13 - 2016 Comments Off on बच्चों के स्वप्नलोक का मोहक चित्र
अंग्रेजी लेखक रेवरेंड चार्ल्स लुटविग डॉजसन ने लुइस कैरल के छद्म नाम से बच्चों को ध्यान में रखकर एक ऐसा उपन्यास लिख डाला था जो न केवल बच्चों में लोकप्रिय हुआ बल्कि अपनी अज़ीबोग़रीब परिस्थितियों एवं घटनाओं के चलते बड़ों को भी बहुत भाया। ....

दिल की आवाज़

Posted On December - 13 - 2016 Comments Off on दिल की आवाज़
चौराहे के मोड़ पर खड़ी हुई मैं बस की प्रतीक्षा कर रही थी। चारों ओर भीड़ थी। धूप की तेजी भी बढ़ती जा रही थी। मैंने पर्स से सन ग्लास निकालकर आंखों पर लगाए कि तभी अचानक एक कार मेरे बिल्कुल समीप आकर रुकी। ड्राइविंग सीट का दरवाजा खोलकर एक आधुनिक महिला नीचे उतरी। चुस्त पोशाक, कंधे पर लहराते बाल और आंखों पर खूबसूरत काला ....

कविता

Posted On December - 6 - 2016 Comments Off on कविता
महकी फुलवारी मनु-स्मृति जल जाने के बाद ढीठ राख से फिर जग उठता है मनु का ककनूसी अक्स मनुबीज है रक्तबीज- अस्थि, मज्जा तंतु,कोशिका हर पल, हर थल फलता, फूलता अनुवांशिकी अंकुर, पादप दग्धकदग्ध आदिम संस्कृति का रसोई-घर से शयन-कक्ष तक झोपड़-पट्टी महल-अटारी पुरु-मन के उर्वर आंगन में महक रही मनु की फुलवारी – रश्मि बजाज  

भाव संवेदना ही सृजन आधार

Posted On December - 6 - 2016 Comments Off on भाव संवेदना ही सृजन आधार
डॉ. सुखनन्दन सिंह पेशे से शिक्षक हैं। देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग में प्राध्यापक एवं अध्यक्ष हैं। पिछले ढाई दशक से गायत्री तीर्थ शांतिकुंज के ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में शोध-अध्ययन से जुड़े रहे हैं। वे देव संस्कृति विश्वविद्यालय के पत्र संस्कृति संचार के कार्यकारी सम्पादक हैं। ....

नई पौध का आना सुखद

Posted On December - 6 - 2016 Comments Off on नई पौध का आना सुखद
पिछले साल बनारस को केंद्र में रखकर बनारस टॉकीज के नाम से एक उपन्यास प्रकाशित हुआ था तो उसकी साहित्य जगत में चर्चा हुई थी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय की पृष्ठभूमि पर लिखा गया ये उपन्यास बेस्टसेलर रहा। इस उपन्यास के लेखक हैं सत्य व्यास। सत्य व्यास ने मैनेजमेंट और कानून की पढ़ाई करने के बाद रेलवे की नौकरी की। ....

उजबक की कदमताल

Posted On December - 6 - 2016 Comments Off on उजबक की कदमताल
समय के चक्र को उल्टा नहीं घुमाया जा सकता। हां, बनवारी लाल आज पूरी शिद्दत के साथ यही महसूस कर रहा था। समय चालीस साल आगे बढ़ गया है मगर वह अभी भी वहीं खड़ा कदमताल कर रहा है। उसने भी कई बार समय के साथ आगे बढ़ने की बात सोची मगर परम्पराओं और दायित्वों में जकड़े पांवों ने हमेशा ही मना कर दिया तो ....

झंकार नहीं, आग-तेजाब की शायरी

Posted On December - 6 - 2016 Comments Off on झंकार नहीं, आग-तेजाब की शायरी
पाकिस्तानी शायरी में ‘सारा शगुफ्ता’ एक आग और तेजाब का नाम रहा है। सारा शगुफ्ता को महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों से अलग नहीं किया जा सकता। औरत के सम्मान, समाज में उनका स्थान, निजी आजादी के लिए जितना इस युवा शायरा को झेलना पड़ा, वैसी कोई दूसरी मिसाल शायद ही कहीं मिलती होगी। डॉ. शाहीना तबस्सुम के संपादन में इधर छपी इनकी कृति ‘शायरी झंकार नहीं’ खुद ....

अपने-अपने सुख

Posted On December - 6 - 2016 Comments Off on अपने-अपने सुख
मेरे मंथली पास दिखाते ही ‘टिकट... टिकट... टिकट...’ कहते हुए सिटी बस के परिचालक ने मेरे पास बैठे यात्री से टिकट मांगा। ‘एक टिकट राम मंदिर...’ सुनते ही मेरी नजरें अनायास उसकी तरफ उठ गईं। यह लगभग 18-19 साल का एक किशोर था। उसकी गोद में बुक्स और नोट्स से भरा हुआ बैग रखा था जिसे देखकर लग रहा था जैसे किसी कोचिंग इंस्टिच्यूट से ....
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