शादी समारोह से बच्चे ने चुराया 3 लाख का बैग !    फर्जी अंगूठा लगाकर मनरेगा के खाते से उड़ाये लाखों !    गुरु की तस्वीरों पर प्रकाश अाभा न दिखाने पर एतराज !    हरियाणा में 2006 के बाद के कर्मियों को भी ग्रेच्युटी !    पहले दिया समर्थन, अब झाड़ा पल्ला !    सप्ताह भर में न भरा टैक्स तो टावर होंगे सील !    पेंशन की दरकार, एसडीएम कार्यालय पर प्रदर्शन !    परियोजना वर्करों की देशव्यापी हड़ताल कल !    आईएस का हाथ था कानपुर रेल हादसे में !    आज फिर चल पड़ेगी नेताजी की कार !    

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फ़ीचर्ड न्यूज़
ट्रैफिक जाम से निपटना जरूरी, गांवों के लिए बननी चाहिए सड़कें

ट्रैफिक जाम से निपटना जरूरी, गांवों के लिए बननी चाहिए सड़कें

हमारे शहरों में ट्रैफिक जाम लगना अब आम हो गया है। गुरुग्राम में सुबह प्रवेश करना और शाम को यहां से बाहर निकलना पर्वत की चोटी चढ़ने जैसी बात हो गई है। सड़कों पर हजारों की तादाद में गाड़ियां उतरती हैं तो फिर एक के पीछे एक लगती जाती है। इस ...

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यह सड़क नहीं टूटेगी...

यह सड़क नहीं टूटेगी...

डॉ. राकेश कपूर एक 5वीं क्लास के बच्चे से क्या अपेक्षा करते हैं जोकि अपने स्कूल पहुंचने के लिए एक नदी को पार करके जाता है? पीछे मुड़ कर देखता हूं तो कितने ही साल गुजर चुके हैं। डॉ. राकेश कपूर के लिए ये बीते हुए साल काफी मायने रखते हैं। ...

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दिहाड़ी करके पढ़ाने वाले माता-पिता का बेटा बन गया गूगल का इंजीनियर

दिहाड़ी करके पढ़ाने वाले माता-पिता का बेटा बन गया गूगल का इंजीनियर

कई बार घर में खाने को नहीं होता। सिर पर अपनी छत नहीं थी। पति-पत्नी दोनों सब्जी बेच कर जैसे-तैसे गुजारा कर रहे थे। एक दिन पति ने कुछ और करने की सोची। इरादा यही था कि अपने 3 बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला सकें। पति ने एक फैक्टरी में काम ...

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तब बच्चों के लिए बुजुर्गों के सुनाए किस्से ही मनोरंजन का साधन थे

तब बच्चों के लिए बुजुर्गों के सुनाए किस्से ही मनोरंजन का साधन थे

गर्मियों में हमारी छत पर करीब 10 खाट आसपास डलतीं, इन पर पूरे परिवार के लोग सोते। इस दौरान खाना खाकर घर के बड़े-बुजुर्ग और बच्चे पहले ही पहुंच जाते। चांदनी रात होती, हल्की-हल्की हवा बह रही होती और हम बच्चे दादी से लिपट कर कहानी सुनाने की जिद कर ...

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युवाओं में अपार संभावनाएं, हमें उन्हें तलाशने की जरूरत है

युवाओं में अपार संभावनाएं, हमें उन्हें तलाशने की जरूरत है

तरक्की का पैमाना यह होता है कि आप एक-एक कदम समझ-बूझ कर रखते हैं, हर पल अपने सपने को जीते हैं और उसको सीने में संजाेए हर तकलीफ को उठाते हुए आगे बढ़ते जाते हैं। और एक दिन वह मंजिल आपकी होती है। पायलट विकास ज्याण्ाी यह बात कहते हैं। ...

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पहाड़ पर पेड़ बचाने की जुगत में डिजाइनर चूल्हा मुफ्त बांटता है यह शख्स

पहाड़ पर पेड़ बचाने की जुगत में डिजाइनर चूल्हा मुफ्त बांटता है यह शख्स

ऑस्ट्रेलिया के एिडलेड से एक व्यक्ित हिमालय के तराई के इलाकों में घूमने के लिए आया था। उसका मन इतना रमा कि हर साल आने लगा। धीरे-धीरे वह अपने साथ और लोगों को भी लाने लगा। इस दौरान वे लोग पहाड़ पर रहने वाले लोगों से बात करते और उनकी ...

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यहां दीवारें नहीं रोक पाती ज्ञान की रोशनी को

यहां दीवारें नहीं रोक पाती ज्ञान की रोशनी को

सोनीपत जिला जेल तो इसकी शुरुआत कैसे हुई जेलर साहब? यह सवाल सुनकर जेल सुपरिंटेंडेंट जयकिशन छिल्लर कुछ सोचने लगते हैं। जाहिर है कोई मुहिम महज एक-दो महीने या फिर साल में फलीभूत नहीं हो जाती है, उसके लिए निरंतर काम करना पड़ता है जोकि जेलर छिल्लर ने भी किया। वे बताने ...

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बाकरपुर में आकर जान जाएंगे पंचायत क्या होती है?

Posted On May - 20 - 2016 Comments Off on बाकरपुर में आकर जान जाएंगे पंचायत क्या होती है?
अगर आपके मन में गांव की तस्वीर गंदी नािलयां, कीचड़, कूड़े के ढेर, पीने का पानी नहीं, सड़क-गलियां कच्ची और ऐसी ही नाकामियों की है तो आपको एक बार जगाधरी के गांव बाकरपुर का दौरा कर आना चाहिए। यहां आकर आपको सहज ही अंदाजा हो जाएगा कि आखिर पंचायत चाहे तो क्या नहीं कर सकती? बस जरूरत होती है तो इच्छाशक्ित की। इस गांव की ....

सामाजिक बेहतरी के लिए संयुक्त परिवार हैं अाज की बड़ी जरूरत

Posted On May - 13 - 2016 Comments Off on सामाजिक बेहतरी के लिए संयुक्त परिवार हैं अाज की बड़ी जरूरत
संयुक्त परिवार बेशक अब बीते समय की बात हो गई है लेकिन आज के युवा भी मानते हैं, कि एक साथ रहना परिवार को जहां खुशहाल बनाता है वहीं मुश्िकलों को झेलने की ताकत भी देता है। कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे चीका के बब्बल कुमार गागट कहते हैं, अगर परिवार इकट‍्ठा न होता तो मैं शायद 10वीं के बाद पढ़ ही नहीं पाता। ....

तब घर के बाहर लगा पेड़ ही लोगों के लिए एसी, कूलर होता था

Posted On May - 13 - 2016 Comments Off on तब घर के बाहर लगा पेड़ ही लोगों के लिए एसी, कूलर होता था
बीते वक्त में लोग मोटा खाते थे मोटा पहनते थे और खूब मेहनत करते थे। बीमारियां कई कोस दूर रहती थीं। यह कहना है 70 वर्ष के हरेन्द्र सिंह का। पलवल निवासी हरेन्द्र पुरानी यादों को टटोलते हुए बताते हैं कि तब दूध, दही-दलिया व छाछ मनपसंद खाना होता था। लोग गौचनी (तिनाजा) की रोटियां बनाकर खाते थे। ....

मल्टीनेशनल कंपनियों की नौकरी छोड़ कपड़े के बैग बेच रहा दम्पति

Posted On May - 13 - 2016 Comments Off on मल्टीनेशनल कंपनियों की नौकरी छोड़ कपड़े के बैग बेच रहा दम्पति
शहर की मार्केट में घूमते अक्सर ऐसे लोग नजर आते हैं, जिनकी नजर नीचे होती है और आंखें कुछ ढूंढ़ रही होती हैं। वे झपट कर कुछ उठाते हैं और फिर जल्दी से उसे अपने बोरे में भरकर आगे निकल लेते हैं। हम लोग इन्हें रैगपिकर्स बुलाते हैं, मतलब कूड़ा बीनने वाले। जब देश और दुनिया के नेता पर्यावरण को बचाने के लिए चिंता से दुबले हुए ....

मैं साहस हूं , मैं ARMY हूंं…

Posted On May - 13 - 2016 Comments Off on मैं साहस हूं , मैं ARMY हूंं…
खाकी और जैतूनी हरा रंग अब लड़कियों पर भी छा चुका है। करियर के नये अवसर तलाश रही बेटियों को अब पुलिस और सेना की नौकरी खूब लुभा रही है। सेना में स्थायी कमीशन की घोषणा ने लड़कियों को प्रोत्साहित किया है कि वे इस चुनौतीपूर्ण कॅरियर को अपनाएं और आगे बढ़ें। उनके लिए यह अब सम्मान हासिल करने और कुछ कर दिखाने का अवसर ....

तब रेडियो या टीवी पूरे परिवार को जोड़ने का जरिया होते थे

Posted On May - 6 - 2016 Comments Off on तब रेडियो या टीवी पूरे परिवार को जोड़ने का जरिया होते थे
तब गांव-देहात में रेडियो ही सूचनाओं का एकमात्र जरिया होता था। किसी-किसी घर में रेडियाे होता था और आसपास के लोग उसे सुनने के लिए जुटते थे। रेडियो पर गूंजती आवाज ग्रामीणों को हैरान कर देती। ....

सिर्फ किताबी पढ़ाई ही अच्छी न हो बल्कि जीवन का सबक भी सुंदर हो

Posted On May - 6 - 2016 Comments Off on सिर्फ किताबी पढ़ाई ही अच्छी न हो बल्कि जीवन का सबक भी सुंदर हो
आज हम बेशक बच्चों को अच्छी शिक्षा देने पर जोर दे रहे हैं, लेकिन इसके साथ हमें उन्हें अच्छे संस्कार देने पर भी ध्यान देना चाहिए। इसकी जिम्मेदारी जहां माता-पिता और समाज की है वहीं स्कूल में शिक्षकों की भी बनती है। अच्छे विचार तरक्की में योगदान देते हैं। ग्रामीण इलाके में लड़कियों की शिक्षा को लेकर काम कर रहे शिक्षाविद‍् दीपक यादव यह बात ....

लातुर में गणित का मास्टर रोजाना बांट देता है 10 हजार लीटर पानी

Posted On May - 6 - 2016 Comments Off on लातुर में गणित का मास्टर रोजाना बांट देता है 10 हजार लीटर पानी
पानी क्या होता है, शायद कर्नाटक और महाराष्ट्र के लोग इसे बेहतर बता सकेंगे। सूखे की मार झेल रहे इन प्रदेशों में हाहाकार मचा है, देश के दूसरे हिस्सों से यहां पानी भेजा जा रहा है। हालात ऐसे हैं कि लोगों का सारा ध्यान इस पर केंद्रित हो गया है कि कैसे पानी को जुटाया जाए। गृहिणियों का पूरा-पूरा दिन पानी भरने में ही बीत ....

यहां दो काम जरूरी हैं…

Posted On May - 6 - 2016 Comments Off on यहां दो काम जरूरी हैं…
गांव की गली में लगी टूंटी से पानी बह रहा था। पास में खूंटे से भैंस बांधकर एक व्यक्ित उसे मसल-मसल कर नहला रहा था। मैंने उसे टोका तो उसका कहना था कि वह अपनी टूंटी के पानी से अपनी भैंस को नहला रहा है, इसमें क्या बुराई है? मैंने उसे समझाया कि जब पानी की इतनी किल्लत है और हर एक को उसकी जरूरत ....

बेटियों ने खुद कुदाल चला कर बना लिया घर में टाॅयलेट

Posted On April - 29 - 2016 Comments Off on बेटियों ने खुद कुदाल चला कर बना लिया घर में टाॅयलेट
यह अब कोई अनजानी बात नहीं है। बच्चा-बच्चा समझ गया है, खुले में शौच जाने का मतलब है, बीमारियां फैलाना और इसका उपाय है टॉयलेट बनाना। हर घर, हर सार्वजनिक स्थल, बस अड‍्डा, रेलवे स्टेशन सभी जगह सही से मेनटेन किए गए टॉयलेट होने चाहिए। ....

संसद और विधानसभाएं नवनिर्माण के लिए हैं, षड‍्यंत्र के लिए नहीं

Posted On April - 29 - 2016 Comments Off on संसद और विधानसभाएं नवनिर्माण के लिए हैं, षड‍्यंत्र के लिए नहीं
राजनीतिक उठा-पटक बेशक नेताओं के अहम को संतुष्ट करती हो लेकिन इसका नुकसान जनता को ही भुगतना पड़ता है। शिक्षक विकास श्याेराण यह बात कहते हैं। उनके अनुसार लोकतंत्र जनता के लिए वरदान है लेकिन जब-तब इस वरदान को चोट पहुंचती रही है। हालिया मामला उत्तराखंड का है। यहां केंद्र सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया, शासन कर रही कांग्रेस हाईकोर्ट में चली ....

तब चंडीगढ़ की सड़कों पर सुबह शाम साइकिलें ही नजर आती थीं

Posted On April - 29 - 2016 Comments Off on तब चंडीगढ़ की सड़कों पर सुबह शाम साइकिलें ही नजर आती थीं
तब चंडीगढ़ की सड़कों पर साइकिल ही साइिकल होते थे। इक्का-दुक्का गाड़ी दिखती थी। हालात ऐसे होते थे कि सुबह सरकारी कर्मचारी साइकिलों पर निकलते और शाम को फिर सड़कों पर साइकिलों का सैलाब नजर आता। हालांकि अब तो शहर की सड़कों से कोई साइकिल लेकर निकल भी नहीं सकता। पीजीआई चंडीगढ़ से रिटायर्ड और अब पंचकूला के सेक्टर-11 में रह रहे 75 वर्षीय देवीदयाल ....

10वीं पास ने बना दी एक मिनट में 300 ईंटें बनाने वाली मशीन

Posted On April - 29 - 2016 Comments Off on 10वीं पास ने बना दी एक मिनट में 300 ईंटें बनाने वाली मशीन
आविष्कार इसलिए हुए हैं क्योंकि वैसी चीजों की इंसान को जरूरत महसूस हुई। दरअसल, जरूरत ही इंसान को बड़ा काम करने के लिए प्रेरित करती है। सोनीपत के लडरावन गांव के छिक्कारा बंधुओं ने इसी जरूरत को समझ ईंट-भट‍्ठा व्यवसाय को नयी दिशा दिखाई है। ....

भाई, मैं घर भी संभाल ल्यूंगी अर गाड‍्डी भी…

Posted On April - 22 - 2016 Comments Off on भाई, मैं घर भी संभाल ल्यूंगी अर गाड‍्डी भी…
सिरसा के छोटे से गांव औढां में माता हरकी देवी कॉलेज फॉर वुमन की बड़े-बड़े शीशे वाली बिल्डिंग से एक सीन देख रहा हूं। कॉलेज के खेल के मैदान में एक कार लगातार घूम रही है। थोड़ी ही देर में कार रुकती है और ड्राइविंग सीट से एक लड़की उतर कर मुस्कराते हुये बाहर आ जाती है। इसके बाद उसकी जगह  दूसरी लड़की ड्राइवर सीट पर बैठती है। लड़की की साथ वाली सीट पर एक अन्य व्यक्ति बैठा है जो उसे हिदायतें 

निर्वाचित महिला पंच, सरपंच आगे आकर घूंघट प्रथा को भी खत्म करें

Posted On April - 22 - 2016 Comments Off on निर्वाचित महिला पंच, सरपंच आगे आकर घूंघट प्रथा को भी खत्म करें
हरियाणा में पिछले दिनों हुए पंचायती राज के चुनावों में महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। इससे जहां सामाजिक तस्वीर बदली है वहीं इसके भविष्य में इसके सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे। हालांकि एक बात है जोकि सही नहीं है, उसे बदले जाने की जरूरत है। यह बात है- चुनी गईं महिलाओं का अभी तक घूंघट में रहना। बीए के छात्र गौरव शर्मा यह बात कहते हैं। उनके मुताबिक एमए, एमफिल पास महिलाएं भी घूंघट 

तब घर में शादी-ब्याह की तारीख ही फसल आने के बाद तय होती थी

Posted On April - 22 - 2016 Comments Off on तब घर में शादी-ब्याह की तारीख ही फसल आने के बाद तय होती थी
वो जमाना कुछ और ही था भाई। तब एक-एक पैसे की कद्र थी। किसान हो या फिर कोई और रोजगार करने वाला, सभी के लिए पैसा बेहद कीमती था। अब तो मैंने सुना है कि पार्टियों के नाम पर थोड़ी देर के लिए लोग हजारों रुपये उड़ा देते हैं। गांव समचाना के निवासी बुजुर्ग रामकिशन यह बात कहते हैं। उनके मुताबिक पहले व्यावसायिकता नहीं थी। नौकरी-रोजगार के ज्यादा साधन भी नहीं थे। किसान का सारा बजट खेती पर ही निर्भर 
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