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ट्रैफिक जाम से निपटना जरूरी, गांवों के लिए बननी चाहिए सड़कें

ट्रैफिक जाम से निपटना जरूरी, गांवों के लिए बननी चाहिए सड़कें

हमारे शहरों में ट्रैफिक जाम लगना अब आम हो गया है। गुरुग्राम में सुबह प्रवेश करना और शाम को यहां से बाहर निकलना पर्वत की चोटी चढ़ने जैसी बात हो गई है। सड़कों पर हजारों की तादाद में गाड़ियां उतरती हैं तो फिर एक के पीछे एक लगती जाती है। इस ...

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यह सड़क नहीं टूटेगी...

यह सड़क नहीं टूटेगी...

डॉ. राकेश कपूर एक 5वीं क्लास के बच्चे से क्या अपेक्षा करते हैं जोकि अपने स्कूल पहुंचने के लिए एक नदी को पार करके जाता है? पीछे मुड़ कर देखता हूं तो कितने ही साल गुजर चुके हैं। डॉ. राकेश कपूर के लिए ये बीते हुए साल काफी मायने रखते हैं। ...

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दिहाड़ी करके पढ़ाने वाले माता-पिता का बेटा बन गया गूगल का इंजीनियर

दिहाड़ी करके पढ़ाने वाले माता-पिता का बेटा बन गया गूगल का इंजीनियर

कई बार घर में खाने को नहीं होता। सिर पर अपनी छत नहीं थी। पति-पत्नी दोनों सब्जी बेच कर जैसे-तैसे गुजारा कर रहे थे। एक दिन पति ने कुछ और करने की सोची। इरादा यही था कि अपने 3 बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला सकें। पति ने एक फैक्टरी में काम ...

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तब बच्चों के लिए बुजुर्गों के सुनाए किस्से ही मनोरंजन का साधन थे

तब बच्चों के लिए बुजुर्गों के सुनाए किस्से ही मनोरंजन का साधन थे

गर्मियों में हमारी छत पर करीब 10 खाट आसपास डलतीं, इन पर पूरे परिवार के लोग सोते। इस दौरान खाना खाकर घर के बड़े-बुजुर्ग और बच्चे पहले ही पहुंच जाते। चांदनी रात होती, हल्की-हल्की हवा बह रही होती और हम बच्चे दादी से लिपट कर कहानी सुनाने की जिद कर ...

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युवाओं में अपार संभावनाएं, हमें उन्हें तलाशने की जरूरत है

युवाओं में अपार संभावनाएं, हमें उन्हें तलाशने की जरूरत है

तरक्की का पैमाना यह होता है कि आप एक-एक कदम समझ-बूझ कर रखते हैं, हर पल अपने सपने को जीते हैं और उसको सीने में संजाेए हर तकलीफ को उठाते हुए आगे बढ़ते जाते हैं। और एक दिन वह मंजिल आपकी होती है। पायलट विकास ज्याण्ाी यह बात कहते हैं। ...

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पहाड़ पर पेड़ बचाने की जुगत में डिजाइनर चूल्हा मुफ्त बांटता है यह शख्स

पहाड़ पर पेड़ बचाने की जुगत में डिजाइनर चूल्हा मुफ्त बांटता है यह शख्स

ऑस्ट्रेलिया के एिडलेड से एक व्यक्ित हिमालय के तराई के इलाकों में घूमने के लिए आया था। उसका मन इतना रमा कि हर साल आने लगा। धीरे-धीरे वह अपने साथ और लोगों को भी लाने लगा। इस दौरान वे लोग पहाड़ पर रहने वाले लोगों से बात करते और उनकी ...

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यहां दीवारें नहीं रोक पाती ज्ञान की रोशनी को

यहां दीवारें नहीं रोक पाती ज्ञान की रोशनी को

सोनीपत जिला जेल तो इसकी शुरुआत कैसे हुई जेलर साहब? यह सवाल सुनकर जेल सुपरिंटेंडेंट जयकिशन छिल्लर कुछ सोचने लगते हैं। जाहिर है कोई मुहिम महज एक-दो महीने या फिर साल में फलीभूत नहीं हो जाती है, उसके लिए निरंतर काम करना पड़ता है जोकि जेलर छिल्लर ने भी किया। वे बताने ...

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सिस्टम को ठेंगा दिखा काली बेईं पर ग्रामीणों ने खुद बना लिया पुल

Posted On April - 22 - 2016 Comments Off on सिस्टम को ठेंगा दिखा काली बेईं पर ग्रामीणों ने खुद बना लिया पुल
यह व्यवस्था पर सवाल है? अाखिर जनता अपनी जरूरत के लिए किसे जाकर कहे। सड़क, बिजली, पानी, स्कूल, अस्पताल, डिस्पेंसरी आदि। इन जरूरतों की पूर्ति के लिए लोग सरकार, मंत्रियों, विधायकों के समक्ष हाथ बांधें गिड़गिड़ाते रहते हैं, लेकिन ज्यादातर उदाहरणों में उन्हें निराशा ही हासिल होती है। हालांकि,पंजाब की बात कुछ और है। कपूरथला के गांव खेड़ा दोनां के लोगों ने व्यवस्था को ठेंगा दिखाते हुए 

एक किसान ने मेहनत के बीज बो कर संवार ली किस्मत की खेती

Posted On April - 15 - 2016 Comments Off on एक किसान ने मेहनत के बीज बो कर संवार ली किस्मत की खेती
इस कहानी को कहने का मकसद सिर्फ यह बताना है कि सोच बदलकर कैसे अपने हालात को भी बदला जा सकता है।  दो एकड़ जमीन के उस टुकड़े पर वे पुश्तैनी तरीके से खेती करते थे, सब्जी उगाना, देखभाल करना और फिर उसे बाजार में बेच देना। जो आय होती उससे परिवार की गुजर चलती। लेकिन एक दिन कुछ बदला। यह था खेती का तरीका। वे अब भी खेती कर रहे थे लेकिन यह खेती बिजनेसमैन वाली खेती थी। फैजाबाद के सोहवल ब्लॉक के भरथूपुर 

तब लस्सी के साथ खिचड़ी खाकर लगता, जैसे शाही भोज कर लिया

Posted On April - 15 - 2016 Comments Off on तब लस्सी के साथ खिचड़ी खाकर लगता, जैसे शाही भोज कर लिया
कहते हैं, जैसा खाए अन्न, वैसा हो मन। पहले के वक्त में  मोटा अनाज होता था लेकिन उसे खाकर जो तृप्ति मिलती थी वह आज कल के एसी रूम में बैठकर किसी शाही भोज से भी नहीं मिल सकती। तिगांव के जगत सिंह नंबरदार यह बात कहते हैं। जगत बताते हैं, कि आज स्वाद अहम है, किसी भी खाने-पीने की चीज का नाम ले लो, उसमें स्वाद पहले रहेगा। हालांकि बदले वक्त के मुताबिक यह जरूरी भी है लेकिन अब पहले जैसा खानपान नहीं रहा। जगत 

खेल के मैदान भी हैं जरूरी, ऊंची इमारतों के बीच रहे इनकी जगह

Posted On April - 15 - 2016 Comments Off on खेल के मैदान भी हैं जरूरी, ऊंची इमारतों के बीच रहे इनकी जगह
स्वस्थ शरीर मनुष्य के जीवन के लिए नियामत है। इसके लिए खेलकूद आवश्यक है। खेलों से न केवल शरीर बलिष्ठ होता है बल्कि मन भी स्वस्थ और प्रसन्न रहता है। परंतु आज के समय में बच्चों को खेलकूद करने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हो पा रहा। अम्बाला की निवासी स्वाति यह बात कहती हैं। उनके मुताबिक शहरों में अब खेल के ग्राउंड नहीं रहे। पार्कों में जो थोड़ी-बहुत जगह होती है, वहीं बच्चे उछल-कूद करके 

सार्थक प्रयास ने बदल दी हमारी जिंदगी

Posted On April - 15 - 2016 Comments Off on सार्थक प्रयास ने बदल दी हमारी जिंदगी
राष्ट्रपति भवन के सामने बैठकर फोटो खिंचवा रही हेमलता उन दिनों को नहीं भूलती जब गाजियाबाद में अपनी झुग्गी के अलावा उसे कुछ भी बड़ा दिखाई नहीं देता था। दुनिया इतनी बड़ी और रंगीन है, उसने आज जाना था। उसके जैसे और भी बच्चे हैं, जिन्हें जिंदगी के कैनवास पर अब भरपूर रंग नजर आ रहे हैं। ये बच्चे टीचर बनना चाहते हैं, किसी की चाहत साइंटिस्ट बनने की है और कोई चार्टर्ड अकाउंटेंट बनने की ख्वाहिश 

तब हाथ से गेहूं की फसल काटते, अब मशीनों ने यह काम छीन लिया

Posted On April - 8 - 2016 Comments Off on तब हाथ से गेहूं की फसल काटते, अब मशीनों ने यह काम छीन लिया
तब अलसुबह उठकर ही लोग खेतों में कटाई करने के लिए पहुंच जाते थे। दरांती लेकर हाथ से गेहूं की फसल काटते। दिन में गर्मी ज्यादा हो जाती इसलिए लोग सुबह जल्दी शुरुआत कर देते थे। हालांकि अब तो मशीनों से कटाई ज्यादा होने लगी है। अब पहले जैसी बात नहीं रही। कोटली गांव के 70 वर्षीय कंवर भान यह बात कहते हैं। उनके मुताबिक फसल कटाई से कई महीने पहले लोग नयी दरांती खरीद कर लाते या फिर पुरानी हो चुकी दरांतियों 

मैटल नगरी तोड़ रही दम, सरकार रियायतें देकर करे पुनर्जीवित

Posted On April - 8 - 2016 Comments Off on मैटल नगरी तोड़ रही दम, सरकार रियायतें देकर करे पुनर्जीवित
जगाधरी की मैटल नगरी की पहचान दशकों ही नहीं बल्कि सैकड़ों वर्षों से देश-विदेश में रही है। यहां का धातु उद्योग जहां सरकार को सालाना राजस्व दे रहा है, वहीं लाखों लोगों की रोजी-रोटी का जरिया भी बना हुआ है, लेकिन पिछले कुछ समय से इस उद्योग को पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल रही है। युवा उद्योगपति देवेंद्र सिंह का कहना है कि जगाधरी का स्माल-स्केल उद्योग दम तोड़ने के कगार पर है। यहां जनता के नुमाइंदों 

हम गलत नहीं बोलते और न गलत आचरण करते, साहब…घर चलाना है

Posted On April - 8 - 2016 Comments Off on हम गलत नहीं बोलते और न गलत आचरण करते, साहब…घर चलाना है
हमारा सफर चंडीगढ़ के पुराने एयरपोर्ट के पास से शुरू हुआ था। ठीक 10 मिनट ही लगे और टैक्सी सामने थी। ड्राइवर को बताया कि पंजाब यूनिवर्सिटी जाना है। इसके बाद गाड़ी आगे बढ़ गई। शहर में ट्रैफिक बहुत बढ़ गया है? मैं जैसे बात शुरू करने की कोशिश कर रहा था। लाल बत्ती पर रूकते हुए ड्राइवर ने भी हां भरी। कोई 8 साल पहले मैं जब यहां आया था, तो इतनी भीड़ नहीं थी। वैसे, गाड़ियों की यह भीड़ तो हर साल बढ़ रही 

हां….. हम टैक्सी चलाती हैं…

Posted On April - 8 - 2016 Comments Off on हां….. हम टैक्सी चलाती हैं…
यह वक्त धारणाएं बदलने का है,  टैक्सी सर्विस में अभी तक पुरुष ही ड्राइवर होते थे, लेकिन अब महिलाएं भी इस काम को अंजाम दे रही हैं। इससे टैक्सी सर्विस को लेकर  लोगों की धारणा बदल रही है वहीं इन महिला ड्राइवरों को रोजगार हासिल हो रहा है। दरअसल, कुछ महिलाओं ने इसे शौक के तौर पर अपनाया वहीं कुछ की मजबूरी रही। लेकिन इससे उनकी जिंदगियां बदल गई। डियर कस्टमर, 10 मिनट में टैक्सी आप तक पहुंच रही 

तब शायद ही कोई ऐसा घर रहा होगा जहां पशु न रखे जाते हों

Posted On April - 1 - 2016 Comments Off on तब शायद ही कोई ऐसा घर रहा होगा जहां पशु न रखे जाते हों
पशुओं का मनुष्य के साथ बहुत गहरा संबंध है। लोग पशुओं को अपने बच्चों की तरफ रखते थे। लेकिन मशीनी युग का प्रभाव कहें या बढ़ती महंगाई का लोग अधिक धन कमाने के चक्कर में पशुओं की बजाय मशीनों का इस्तेमाल करने लगे हैं।  यह बात 85 वर्षीय किसान बाबा जयकरण सैनी ने कही। बाबा ने कहा कि कुछ वर्ष पहले तक गांवों में तो शायद ही कोई ऐसा घर होगा, जिसमें पशु न हो। तब घरों में खाना बनाते समय पहली रोटी गाय के लिए 

कालका क्षेत्र में रोजगार के नये अवसर पैदा करना बेहद जरूरी

Posted On April - 1 - 2016 Comments Off on कालका क्षेत्र में रोजगार के नये अवसर पैदा करना बेहद जरूरी
करीब डेढ़ दशक पहले कालका शहर तहसील से सब-डिवीजन बना था। लेकिन  इसका कोई फायदा नहीं हुआ है। यहां बेशक गवर्नमेंट काॅलेज है, लेकिन डिग्री लेने के बाद युवा खुद को चौराहे पर खड़ा पाता है। किधर जाए‍? बीकाॅम की डिग्री हासिल कर चुके यशपाल शर्मा के मुताबक कालका का विकास होना जरूरी है। यहां उद्योग-धंधे लगें, औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों की स्थापना हो, इससे स्थानीय लोगों का जीवन स्तर बेहतर होगा। यशपाल 

‘स्ट्रीट चिल्ड्रन’ की खामोशी को आवाज देता है, दिल्ली का बालकनामा

Posted On April - 1 - 2016 Comments Off on ‘स्ट्रीट चिल्ड्रन’ की खामोशी को आवाज देता है, दिल्ली का बालकनामा
सड़कों के किनारे कूड़ा बीनना, रस्सी के ऊपर बांस की मदद से चलने और एक अखबार का संपादन करने में क्या समानता है? जाहिर है कोई समानता नहीं है। पहले काम ऐसे हैं जिन्हें मजबूरी में ही कोई करना पसंद करेगा लेकिन इसके बाद का काम जिम्मेदारी और साहस का है। एक बच्ची ने इसके बाद का काम ही पसंद किया। एक अखबार के संपादन का। यह कहानी यूं है कि साउथ दिल्ली में सड़कों पर रहकर गुजर करने वाले बच्चाें ने अपना 

टॉयलेट है आज की पहली जरूरत

Posted On April - 1 - 2016 Comments Off on टॉयलेट है आज की पहली जरूरत
यह विषय ऐसा है, जिसके बारे में बात करते हुए हम झिझकते हैं। लेकिन जब तक हम इसके बारे में बात नहीं करेंगे, संभव है ऐसे ही चलता जाएगा। गांव-देहात, कस्बों और शहरों में भी हम वर्षों से देखते आ रहे हैं, सुबह-शाम लोग घरों से निकलते हैं, खेत-खलिहान, कच्चे रास्ते, झाड़ियों, गड‍्ढों और सड़कों के किनारे खुले में शौच करके लौट आते हैं। इसकी परवाह बिल्कुल नहीं की जाती कि वह गंदगी कैसे निपटेगी? उसी गंदगी 

5 किसानों ने बदली खेतीबाड़ी की सोच

Posted On March - 25 - 2016 Comments Off on 5 किसानों ने बदली खेतीबाड़ी की सोच
सुरपुरा कलां के किसान पवन शर्मा 10 साल पहले प्राइवेट नौकरी करते थे। एकदिन पिता जी का एक्सीडेंट हो गया। जिम्मेदारी बढ़ी तो पवन ने नौकरी छोड़ दी और अपने खेतों में आ गए। अब वे फसलों की नयी वैरायटी पर रिसर्च करते हैं, कहते हैं- अब पहले से फायदा 3 गुणा बढ़ गया है। पहले की खेती घाटे का सौदा होती थी लेकिन अब विशेषज्ञों की सलाह से काम किया जाए तो खेती भी फायदे का व्यवसाय है। गेहूं की 6 वैरायटी 

तब त्योहार उल्लास का दूसरा नाम थे, अब लोग असली मतलब भूले

Posted On March - 25 - 2016 Comments Off on तब त्योहार उल्लास का दूसरा नाम थे, अब लोग असली मतलब भूले
समय के साथ रहन-सहन और संस्कारों में भी परिवर्तन आ गया है। हमारे जमाने में त्योहार परंपरा और विश्वास का ऐसा सुमेल होता था िक अपार खुशी मिलती थी लेकिन जमाने के साथ यह खुशी हल्की होती गई और अब ऐसा वक्त आ गया है कि लोग त्योहार का असली मतलब ही भूल गए हैं। पलवल के 80 वर्षीय बुजुर्ग हरीश्ाचंद्र पुराने वक्त की तुलना आज से कर रहे हैं। उनके मुताबिक अब इतना बदलाव आ गया है कि त्योहार मात्र परिवारों तक 

पानी आज की भी जरूरत और कल की भी, इसे बचाना बेहद जरूरी

Posted On March - 25 - 2016 Comments Off on पानी आज की भी जरूरत और कल की भी, इसे बचाना बेहद जरूरी
गर्मी का मौसम धीरे-धीरे कदम आगे बढ़ा रहा है। पानी का संकट अब गर्मी और सर्दी से जुड़ा नहीं रह गया है लेकिन फिर भी गर्मियों में पानी की दरकार बढ़ जाती है और ऐसे में पानी की किल्लत जो मुश्किल खड़ा करती है, उससे जीवन मानो ठहर जाता है। ऐसे में पानी को बचाना जरूरी है वहीं पानी के प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी आवश्यक है। इसराना निवासी और पानीपत के आर्य कॉलेज में पत्रकारिता विभाग के छात्र भूपेंद्र 

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