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वक्र रेखाओं का भावपक्ष

वक्र रेखाओं का भावपक्ष

केवल तिवारी कैरिकेचर की परंपरा है अनूठी। रेखाओं के जरिये कह देने की कला। कैरिकेचर का शाब्दिक अर्थ मूल से अधिक आयतन में किसी चीज का चित्रण है। रेखांकन या कैरिकेचर को इसी से हम खास मान सकते हैं कि आज तमाम हस्तियां इसे बनवाना चाहती हैं। कैरिकेचर की इस विधा ...

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भाव के सार्थक सूत्र थमाती कविता

भाव के सार्थक सूत्र थमाती कविता

कृष्णलता यादव समीक्ष्य कृति ‘मुश्किल है मुट्ठी भर सुख पाना’ मनोज तिवारी का 65 कविताओं का पहला काव्य संकलन है। इन कविताओं में कवि ने अलग-अलग छवियों में जीवन-जगत से जुड़े कई गंभीर पक्षों, मनोभावों व जीवन मूल्यों पर अपने एहसास बांटें हैं। ये कविताएं उन सूक्ष्म दुख, तकलीफों व संवेदनाओं ...

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शब्दों की किफायती से बड़ी बात

शब्दों की किफायती से बड़ी बात

पुस्तक समीक्षा सुभाष रस्तोगी वरिष्ठ साहित्यकार मधुदीप की सद्य: प्रकाशित संपादित कृत ‘कमल चोपड़ा की 66 लघुकथाएं और उनकी पड़ताल’ उनकी महत्वाकांक्षी योजना पड़ाव और पड़ताल का 20वां खंड है। समकालीन हिंदी लघुकथा के जाने-माने लघु कथाकार कमल चोपड़ा उन लघु कथाकारों में अग्रगण्य हैं जिन्होंने 1975 में हिन्दी लघुकथा में एक नई ...

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नरम-गरम सोच के बीच

नरम-गरम सोच के बीच

मनमोहन गुप्ता मोनी ‘गांधी और सावरकर’ पुस्तक के लेखक राकेश कुमार आर्य ने भारत की स्वाधीनता के क्रांतिकारी आंदोलन के दो ऐसे बड़े नायकों के बारे में लिखा है, जिनका अपना अपना अलग महत्व रहा है। जहां महात्मा गांधी मूल रूप से अहिंसा को आधार बनाकर सत्य और प्रेम से आजादी ...

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विरासत को लेकर साहित्यिक द्वंद्व

विरासत को लेकर साहित्यिक द्वंद्व

अनंत विजय हिंदी साहित्य में आमतौर पर यह माना जाता है कि दस साल में लेखकों की एक नई पीढ़ी सामने आ जाती है। लेखकों की जो नई पीढ़ी सामने आती है वो अपने से पुरानी पीढ़ी के लेखन का अपनी रचनात्मकता से विस्तार करती है। नई और पुरानी पीढ़ी का ...

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कश्मीरी पंडितों की सुध

कश्मीरी पंडितों की सुध

घर वापसी के अनुकूल माहौल भी बने कश्मीरी पंडितों के घाटी से पलायन के 27 साल बाद उनकी वापसी के लिए जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पारित प्रस्ताव का स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन इसकी सार्थकता तभी साबित होगी, जब उनकी घर वापसी के अनुकूल माहौल भी बनाया जाये। निर्दलीय विधायक इंजीनियर रशीद ...

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नये सिरे से परिभाषित करें नेतृत्व

नये सिरे से परिभाषित करें नेतृत्व

हरीश खरे बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति का पद खाली कर चुके हैं। वह पद जो दुनिया में सबसे ताकतवर और सबसे प्रभावशाली माना जाता है। उनके स्थान पर अमेरिकियों ने जिस व्यक्ति को चुना है, उन्होंने कभी किसी निर्वाचित पद को कभी नहीं संभाला और न ही जनसेवा का उनका ...

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  • विरासत को लेकर साहित्यिक द्वंद्व
     Posted On January - 21 - 2017
    हिंदी साहित्य में आमतौर पर यह माना जाता है कि दस साल में लेखकों की एक नई पीढ़ी सामने आ....
  • शब्दों की किफायती से बड़ी बात
     Posted On January - 21 - 2017
    वरिष्ठ साहित्यकार मधुदीप की सद्य: प्रकाशित संपादित कृत ‘कमल चोपड़ा की 66 लघुकथाएं और उनकी पड़ताल’ उनकी महत्वाकांक्षी योजना पड़ाव....
  • भाव के सार्थक सूत्र थमाती कविता
     Posted On January - 21 - 2017
    समीक्ष्य कृति ‘मुश्किल है मुट्ठी भर सुख पाना’ मनोज तिवारी का 65 कविताओं का पहला काव्य संकलन है। इन कविताओं....
  • वक्र रेखाओं का भावपक्ष
     Posted On January - 21 - 2017
    कैरिकेचर की परंपरा है अनूठी। रेखाओं के जरिये कह देने की कला। कैरिकेचर का शाब्दिक अर्थ मूल से अधिक आयतन....

तिरछी नज़र

Posted On January - 2 - 2017 Comments Off on तिरछी नज़र
नोटबंदी में बेचारा तंज पिसा जा रहा था। हिंदी साहित्य का इतिहास साक्षी है कि इस बेचारे व्यंग्य को दोयम दर्जे का लेखन माना जाता है। साहित्य में जो स्थान कहानी, काव्य, उपन्यास, संस्मरण, रिपोर्ताज और आलोचना का है वो इस तत्काल लिखे जाने वाले कटाक्ष का नहीं रहा। आलोचक तो इसे साहित्य की विधा भी नहीं मानते। एक खबर की तरह इसकी जिंदगी एक ....

साझा प्रयासों से दूर होगा गतिरोध

Posted On January - 2 - 2017 Comments Off on साझा प्रयासों से दूर होगा गतिरोध
उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्तियों के मामले में न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच विवाद 2016 में लगातार छाया रहा। ऐसा लगता है कि देश के 44वें प्रधान न्यायाधीश के रूप में चार जनवरी को पदग्रहण करने के बाद न्यायमूर्ति जगदीश सिंह खेहर को इस चुनौती से रूबरू ही नहीं होना पड़ेगा बल्कि पिछले पांच महीने से अधर में अटके नियुक्तियों संबंधी प्रक्रिया ज्ञापन को ....

घरेलू पूंजी के अनुकूल बनायें माहौल

Posted On January - 2 - 2017 Comments Off on घरेलू पूंजी के अनुकूल बनायें माहौल
अभी तक अमेरिका की अर्थव्यवस्था ‘खुली’ थी। यानी अमेरिकी सरकार द्वारा अमेरिकी कम्पनियों को विदेश में निवेश करने को प्रोत्साहन दिया जा रहा था। अमेरिका के केन्द्रीय बैंक ‘फेड’ ने ब्याज दरें शून्यप्राय बना रखी थीं। अमेरिकी कम्पनियों के लिये अमेरिका में ऋण लेकर भारत जैसे देशों में निवेश करना लाभप्रद था, चूंकि लिये गये ऋण पर उन्हें लगभग शून्य ब्याज देना होता था। ....

उम्मीदों की राह

Posted On January - 2 - 2017 Comments Off on उम्मीदों की राह
नोटबंदी के पचास दिन पूरे होने के बाद प्रधानमंत्री ने शुद्धि यज्ञ में जनता के योगदान व धैर्य की सराहना की। समाज के कुछ वर्गों के लिये रियायतों व योजनाओं की घोषणा की। कहीं न कहीं ये वर्ग नोटबंदी से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला तबका ही था। जिसके दर्द का सरकार को भी एहसास था। यह भी एक हकीकत है कि आज भी देश ....

एकदा

Posted On January - 1 - 2017 Comments Off on एकदा
गौतम बुद्ध ने जब ज्ञान प्राप्त किया तो उन्होंने इच्छाओं के शमन की बात कही। उन्होंने भोगवाद की निंदा की, संन्यासी जीवन को श्रेष्ठ माना। किन्तु अपने जीवन के हर पल परिपक्व होते अनुभवों से उन्हें गृहस्थ जीवन का महत्व समझ आया। अगर सब लोग संन्यासी हो गए तब तो इस समाज और तदुपरांत इस संसार का अस्तित्व ही मिट जाएगा। ....

तिरछी नज़र

Posted On January - 1 - 2017 Comments Off on तिरछी नज़र
कम से कम अब तो अच्छे दिन आ ही जाएंगे जी। प्रधानमंत्री ने देशवासियों से अपील की थी कि सिर्फ पचास दिन की इस मुश्किल को भुगत लो। उसके बाद आपके अच्छे दिन शुरू हो जाएंगे। तो आपका अच्छा समय शुरू होता है अब। अब तो अमित शाह भी यह नहीं कह पाएंगे कि अच्छे दिनों का यह वादा एक चुनावी जुमला था। हालांकि प्रधानमंत्री ....

काम नहीं तो दाम नहीं और सांसद

Posted On January - 1 - 2017 Comments Off on काम नहीं तो दाम नहीं और सांसद
यदि संसद में कोई काम नहीं होता तो ‘नो वर्क नो पे’ वाला फार्मूला लागू होना चाहिए तथा सांसदों को स्वयं ही इस पर अमल करना चाहिए। सांसदों का संवैधानिक कर्तव्य सदन में जनहित व देशहित के लिए कार्य करना होता है, परन्तु ऐसा न करके वे अपने तथा पार्टी के हित में मर्यादा की सभी सीमाएं लांघकर सदन को बंधक बना लेते हैं जिससे ....

संवेदना ही हो विकास का आधार

Posted On January - 1 - 2017 Comments Off on संवेदना ही हो विकास का आधार
विकास आज मनुष्‍य समाज का सर्वाधिक प्रिय और अपेक्षित शब्‍द है। वर्तमान में सभी मनुष्‍यों को अपने जीवन में आधुनिक जीवन-शैली के अनुरूप वे समस्‍त वस्‍तुएं व सुख-सुविधाएं चाहिए, जिन्‍हें आधुनिक-जीवन के परिचालकों द्वारा अपने व्‍यापारिक लाभों के लिए व्‍यक्तिगत उन्‍नति का आधार बना दिया गया है। विकास के भौतिक स्‍वरूप के आकर्षण के प्रति पूरी मनुष्‍य जाति आंदोलित हुई जा रही है। ....

मोदी के भारत में उपजे अंतर्विरोध

Posted On January - 1 - 2017 Comments Off on मोदी के भारत में उपजे अंतर्विरोध
अब जबकि वर्ष 2017 दस्तक दे चुका है, ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब बीते साल की अपनी रीति-नीतियों पर नजर डालते होंगे तो कुछ संतोष-सा महसूस करते होंगे। यह बात अलग है कि उनके द्वारा की गई नोटबंदी की वजह से बैंकों के बाहर जो लंबी-लंबी कतारें लगी हैं, उससे छोटे व्यापारियों और दिहाड़ीदार मजदूरों को बहुत कुछ सहना पड़ा है। ....

अरुणाचल में भाजपा

Posted On January - 1 - 2017 Comments Off on अरुणाचल में भाजपा
आखिरकार सुदूर पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल में कमल खिल ही गया। बीते वर्ष के आखिरी दिनों में तेजी से बदले राजनीतिक घटनाक्रम ने पूर्वोत्तर में हाशिये के राजनीतिक दल भाजपा को कम से कम एक राज्य में तो सत्ता के केंद्र में ला ही दिया। भाजपा के इस सपने को साकार किया अरुणाचल के मुख्यमंत्री पेमा खांडू द्वारा दलबदल ने। ....

कहानी से उम्मीदों का साल

Posted On December - 31 - 2016 Comments Off on कहानी से उम्मीदों का साल
आज नए साल का आगाज हो रहा है। आज उम्मीदों का दिन है। साहित्य में भी विधाओं के लोकप्रिय होने की अपेक्षाओं का दिन है। बीता साल कहानी विधा के लिए अच्छा नहीं रहा। फॉर्मूलाबद्ध कहानियों की बाढ़ रही। छोटी कहानियों के नाम पर रिपोर्ताज लिखे गए। कहानी की बुनियादी शर्त है कि उसमें पठनीयता हो और पाठकों का पढ़ने में मन लगे। ....

तिरछी नज़र

Posted On December - 31 - 2016 Comments Off on तिरछी नज़र
उम्र का सोलहवां साल बड़ा नाज़ुक होता है—एकदम मस्त-मस्त और स्वीट-स्वीट। सपने देखने का और दूसरों के सपनों में आने-जाने का। नखरे दिखाने का और नखरे दिखा-दिखाकर रिझाने का। पर इस उम्र के ख़तरे भी कम नहीं—एक क़दम ग़लत उठा और ज़िंदगीभर का कष्ट। हमारे एक ज्योतिषी मित्र हैं, सात जन्मों का लेखा-जोखा बता डालते हैं पर अपनी बेटी के मामले में गच्चा खा गए। ....

नये तेवर के व्यंग्य

Posted On December - 31 - 2016 Comments Off on नये तेवर के व्यंग्य
अशोक ‘अंजुम’ बहुमुखी प्रतिभा के धनी रचनाकार का नाम है। अब तक आपके 6 ग़ज़ल संग्रह, 6 हास्य व्यंग्य कविता संग्रह, 2 गीत संग्रह, 2 दोहा संग्रह, 2 नाटक संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। काव्य मंच हों या साहित्य सृजन, दोनों ही जगह आपने अपनी विशिष्ट पहचान बनायी है। ‘कट्टा निकाल के’ आपकी सद्य: प्रकाशित कृति है, जिसमें 13 व्यंग्य ग़ज़लें तथा 33 हास्य ....

आस्तिकता अौर देशभक्ति का जुनून

Posted On December - 31 - 2016 Comments Off on आस्तिकता अौर देशभक्ति का जुनून
शहीदे आजम भगत सिंह एक ऐसा नाम है जिससे बच्चा-बच्चा परिचित है। मात्र 23 साल के अपने जीवनकाल में उन्होंने वो इतिहास रच दिया, जिसकी मिसाल उपलब्ध नहीं है। उनमें देशभक्ति और जुनून भी ऐसा था कि अपना बचाव न करके फांसी के फंदे को चूमना बेहतर समझा। वह एक ऐसे जज्बाती लोगों में से एक थे जो देश के लिये मर मिटे। ....

प्रेम के धूप-छांही रंगों का रेखांकन

Posted On December - 31 - 2016 Comments Off on प्रेम के धूप-छांही रंगों का रेखांकन
बिशन सागर के पहले कविता-संग्रह ‘तुम्हारे लिए’ में कुल 57 कविताएं संगृहीत हैं जो मूलत: प्रेम कविताएं हैं। कैसा है यह प्रेम का रंग! वही जो एक बार चढ़ता है फिर उतरता नहीं। पांव धरती पर नहीं पड़ते और आसमान केवल बालिस्त भर की दूरी पर दिखाई देता है। एक छवि मन में बस गयी तो बस गयी। फिर हर तरफ उसका ही नजारा दिखाई ....

कहानियों में संवेदना के मुखर स्वर

Posted On December - 31 - 2016 Comments Off on कहानियों में संवेदना के मुखर स्वर
कथाकार अरुण प्रकाश आज कथा साहित्य में एक ऐसा नाम है, जिसे हम सरोकारों का सच्चा कथाकार कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। राष्ट्रीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली की प्रतिष्ठित पत्रिका समकालीन साहित्य के संपादक रहे कथाकार अरुण प्रकाश की कहानियों में कुछ ऐसा जरूर होता है, जो उन्हें सीधे पाठक से जोड़ देता है। ....
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